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नई दिल्ली, [गौरव कुमार]। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अन्य देशों में मृत्युदंड के तौर-तरीकों को लेकर जानकारी मांगी है। यह जानकारी वकील ऋषि मल्होत्र की याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली पीठ ने मांगी। याचिकाकर्ता ने एक जनहित याचिका दाखिल कर मृत्यु की सजा देने का फांसी के अलावा कोई दूसरा तरीका अपनाने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि फांसी बहुत क्रूर तरीका है। इसे बदलकर कोई सामान्य तरीका अपनाया जाना चाहिए।

ताकि मृत्युदंड पाने वाले शांति से मरे

याचिका में हैंग टिल डेथ का प्रावधान करने वाली सीआरपीसी की धारा 354(5) को रद करने की मांग की गई है। इसमें अमेरिका में मौत की सजा के तरीकों का उदाहरण दिया गया है, जहां 35 राज्यों में मृत्युदंड के लिए फांसी खत्म कर उसकी जगह गोली मारने या इलेक्ट्रिक चेयर को अपनाया गया है। याचिका में विधि आयोग की 2003 की 187वीं रिपोर्ट को आधार बनाया गया है। इसमें विधि आयोग ने फांसी के साथ इंजेक्शन के जरिये मौत दिए जाने के वैकल्पिक तरीके भी अपनाने की सिफारिश की थी और इसके लिए सीआरपीसी की धारा 354(5) में जरूरी संशोधन की संस्तुति की थी। याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि हमारा संविधान करुणापूर्ण और चैतन्य दस्तावेज है। विधायिका कानून बनाने पर विचार कर सकती है ताकि मृत्युदंड पाने वाला शांति से मरे न कि दर्द में।

क्या मौत की सजा एकमात्र विकल्प?

न्यायालय में इस याचिका की सुनवाई के बाद यह बहस भी तीव्र हुई है कि क्या आखिर मौत की सजा ही एकमात्र विकल्प है? क्या इसके अलावा सजा का कोई और विकल्प नहीं हो सकता? भारतीय कानून की विशेषता है कि प्रत्येक मामले में मौत की सजा देने का प्रावधान नहीं है। भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और 201 (देश के विरुद्ध युद्ध छेड़ने) जैसे अपराधों के लिए ही मौत की सजा दी जा सकती है। किन्तु इसके बावजूद भी मौत की सजा पर हमेशा प्रश्न चिन्ह लगते रहते हैं। वैश्विक स्तर पर और देश के अंदर भी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को इस बात के लिए चिंता प्रकट करते देखा गया है कि मौत की सजा मानवाधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है। मानव अधिकार घोषणा के अनुच्छेद 5 के तहत यातना, क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार और दंड अभियुक्तों के लिए प्रतिषेध किया गया है। साथ ही सिविल व राजनीतिक अधिकार प्रसंविदा के अनुच्छेद 10 के परिच्छेद 1 में भी यह प्रावधान किया गया है कि अपनी स्वतंत्रता से वंचित किए गए सभी व्यक्तियों के साथ मानवता पूर्वक तथा मानव की अंतर्निहित गरिमा के सम्मान के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए।

मानव जीवन सरकार, शासन और कानून से ऊपर

मानवाधिकार का हवाला देते हुए 2003 से विश्व भर में मौत की सजा के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाने लगा था। इसमें दुनियाभर के अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन, बार एसोसिएशन, मजदूर संगठन, संघों, स्थानीय निकायों को एकजुट करने के प्रयास किए जा रहे हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि मानव जीवन किसी भी सरकार, शासन व कानून से ऊपर है। यह सामाजिक, धार्मिक, कानूनी, सामाजिक प्रत्येक दृष्टिकोण से गलत है। मगर सवाल है कि जघन्य, अमानवीय और गंभीर आरोपों में अपराधियों पर मानवाधिकार कहां तक लागू होता है? गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार घोषणा के बाद से मानव को जन्म लेने के साथ ही बिना किसी भौगोलिक सीमा के भेदभाव के उसे कुछ अधिकार दिए गए हैं।

हालांकि यह अधिकार कुछ कर्तव्यों की मांग भी करते हैं। इस अधिकार को केवल वही प्राप्त कर सकता है जो कि मानव स्वभाव के अनुकूल व्यवहार करता है और मानव की परिभाषा के दायरे में आता है। पशुओं को यह अधिकार नहीं है। ऐसे अपराधी का व्यवहार मानव होने का प्रमाण नहीं देते। फिर उनके प्रति मानवाधिकार की मांग क्यों की जाती है?

मौत की सजा पर प्रसिद्ध दार्शनिक वोल्टायर का मत कुछ अलग है। उनका कहना है कि मौत की सजा पाने वाले दोबारा अपील नहीं कर सकते। यदि मान लें कि गलती से किसी निदरेष को फांसी दे दी गई, तब क्या किया जा सकता है? इस स्थिति से बचने के लिए उनका सुझाव था कि निदरेष को बचाने के लिए दोषी के दंड के साथ थोड़ा समझौता किया जाना चाहिए।

हालांकि यह सिद्ध दोषी के मामले में लागू नहीं किया जा सकता। वोल्टायर का यह विचार वैसे समाजों या कानून व्यवस्था के संदर्भ में सही है, जहां एकल न्यायिक प्रणाली है। परन्तु भारत में तीन चरणों वाली न्यायपालिका और उससे ऊपर राष्ट्रपति के पास क्षमा दान की याचिका का विकल्प है। अत: ऐसी स्थिति में निदरेष साबित करने का विकल्प अधिक है।

अपराध रोकने के लिए मौत की सजा भय पैदा नहीं करती

वैसे केवल सजा ही अपराध रोकने का भय पैदा नहीं करता। नार्वे में मौत की सजा का प्रावधान नहीं है, फिर भी वहां अपराध की दर काफी कम है। दूसरी ओर अमेरिका जैसे देश जहां मौत की सजा का प्रावधान है, वहां अपराध की दर काफी अधिक है। एक अन्य तथ्य पर गौर किया जाए तो स्पष्ट होगा कि विश्व भर में मौत की सजा के प्रति नागरिक और सरकार दोनों की रूचि खत्म हो रही है। एमनेस्टी इंटरनेश्नल की एक रिपोर्ट में बताया गया था की 2011 में फांसी की सजा बरकरार रखने वाले देशों की संख्या घटकर 20 रह गई है जो की 2010 में 23 थी।

हालांकि रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भले ही फांसी की सजा कई देशों में खत्म हो रही है परन्तु जिन देशों में यह अब भी बरकरार है वहां इस तरह की सजा देने की आवृत्ति में भी तेजी आई है। विभिन्न देशों में मौत की सजा के मामले 2011 में बढ़ कर 676 हो गए है जो कि 2010 में 527 थे। दूसरी तरफ पश्चिमी एशियाई देशों में मौत की सजा देने के मामले में बढ़ोतरी हुई है। 99 प्रतिशत मौत की सजा केवल चार देशों इरान में 360, ईराक में 68, सउदी अरब में 82 और यमन में 41 दी गई। मौत की सजा के प्रति वैश्विक रुझान इसे खत्म करने के प्रति बढ़ रहा है। यह एक अच्छा संकेत है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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Posted By: Abhishek Pratap Singh

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