प्रत्युष प्रशांत

विकास एक निरंतर चलने वाली वह प्रक्रिया है जो सकारात्मक बदलाव की तरफ समाज को ले जाती है। इसमें मानव संसाधन, प्राकृतिक संसाधन, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और ढांचागत विकास शामिल है। ‘विकास’ की यह परिभाषा स्कूल की नौवीं जमात में पढ़ाई गई थी। जाहिर है विकास की यह परिभाषा गरीबी, उपेक्षित और पिछड़े समाज के उन्नयन के संदर्भ में गढ़ी गई है। यह परिभाषा अपने साथ कई पहलुओं की तस्वीरों का कोलाज तैयार करती है।

बहरहाल, जब सामाजिक जीवन में विकास के संदर्भो की पड़ताल शुरू की तो वह किताबों की बातों से अलग दिखी जो दो फाड़ में बंटा हुआ है। पहला मानवीय विकास और दूसरा ढांचागत विकास। मानवीय विकास की जद्दोजहद में तमाम नागरिक स्वयं को मरा खपा दे रहे हैं। फिर भी मानवीय विकास के लक्ष्य को हासिल करना मुमकिन नहीं हो पा रहा है। वहीं ढांचागत विकास के लिए सरकारें रोज-ब-रोज नई घोषणाओं और योजनाओं में अपनी पूरी ताकत झोंक दे रही हैं। फिर भी ढांचागत विकास हर बरसाती मौसम के बाद अपना दम तोड़ देता है और अगली किसी योजना की बांट जोहने लगता है। इस ढांचागत सुविधा का नाम है सड़क है। ढांचागत विकास में सड़क पहली मूलभूत आवश्यकता है जो मानवीय समुदायों, संस्कृतियों और मानवीय अर्थव्यवस्था को चलयमान बनाए रखती है। इसलिए सड़क को किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा कहा जाता है। आसानी से संचालन में लचीलापन, घर-घर तक सेवा और विश्वसनीयता को जरूरी बताया गया है, लेकिन सड़कों के ढांचागत विकास की बातें मुझे अधिक परेशान करती हैं।

यह परेशानी और बेचैनी इसलिए भी अधिक है क्योंकि देश के जिस सूबे से मैं आता हूं वहां की सड़कें कभी किसी फिल्म अभिनेत्री तो कभी किसी चरित्र अभिनेता के गालों की तरह बताई जाती रही हैं। बिहार के गया जिले में दशरथ मांझी ने पहाड़ काटकर सड़क बना दिया, जिनसे मिलना हम जैसे लोगों में उत्साह भर देता था। पहाड़ के चलते दशरथ मांझी को अपनी बीमार पत्नी को काफी दूरी तय कर अस्पताल ले जाना पड़ा। सड़क के अभाव में यह दूरी इतनी लंबी हुई कि पत्नी को अस्पताल पहुंचाने में काफी दे हो गई और अंतत: वही पत्नी को बचा नहीं सके। क्या बेबसी रही होगी कि सड़क के अभाव में एक शख्स अपनी पत्नी का समय पर इलाज नहीं करा पाया। दशरथ मांझी ने तय किया कि वह पहाड़ का सीना चीरकर सड़क बनाएंगे और आखिरकार वह अपने लक्ष्य को हासिल करने में सफल रहे।

असल में, सरकारों ने सड़कों के निर्माण को ही विकास का पैमाना मान लिया है। ढांचागत विकास का भूत इतना अधिक हावी है कि किसी राज्य का मुख्यमंत्री अपने प्रदेश की सड़कों की तुलना अमेरिका की सड़कों से करने से गुरेज नहीं करता। अभी हमने देखा कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की राज्य के सड़कों की तुलना अमेरिका की सड़कों से करने पर कितनी किरकिरी हुई। पहले सड़क का जाल बिछाने के लिए प्रधानमंत्री सड़क विकास योजना, स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, टू लेन, सिक्स लेन आदि का नाम सुना करता था। फिर इनसे जुड़े कुछ घोटाले भी सामने आए। विकास की राजनीति का खुमार इतना ज्यादा था कि हाल के दिनों में कई राज्यों के मुख्यमंत्री अपनी महत्वाकांक्षी सड़क योजनाओं की तस्वीर के साथ नजर आए। इसमें उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का नाम लिया जा सकता है। अब केंद्र सरकार भारतमाला योजना पर काम करने जा रही है। इसमें आर्थिक कॉरिडोर, राज्यों के सीमावर्ती शहरों और तटीय इलाकों को सड़कों के जरिये जोड़ने की योजना है। इस बात से कोई गुरेज नहीं है कि सड़कों की बेहतरी से राज्य और देश की अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई है।

मगर हैरानी तब अधिक होती है जब देश के सकल घरेलू उत्पाद को सड़क हादसों के आंकड़े प्रभावित नहीं करते है, क्योंकि देश में सड़क हादसा एक गंभीर चुनौती है। हर मिनट में एक शख्स की जान सड़क हादसों में ही जाती है जो किसी महामारी और युद्ध से ज्यादा है। जिस युवा शक्ति पर देश को दंभ है वह इन सड़क हादसों का सबसे अधिक शिकार है। सड़क हादसों के चलते अधिक मौतें इसलिए हो रही हैं क्योंकि घायलों को समय से इलाज नहीं मुहैया हो पा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं अपने नियमित कार्यक्रम ‘मन की बात’ में इस समस्या को लेकर चिंता जाहिर कर चुके हैं और व्यापक सुरक्षा नीति अख्तियार किए जाने की दरकार बता चुके हैं। हादसों की संख्या या दूरदराज के क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव को लेकर कहा जा सकता है कि परिवहन व्यवस्था को लेकर सरकारों ने उस तरह से काम नहीं किया जिसकी जरूरत थी।

सड़क सुरक्षा पर निवेश को लेकर संजीदा प्रयास की कमी दिखती है। सड़क सुरक्षा को लेकर ऐसी कई खामियां नजर आती हैं जिसमें हादसों की आशंका बनी रहती है। दूसरे सामान्य सड़कों, राजमार्गो पर हादसों के दौरान इलाज को लेकर मुक्कमल इंतजाम का अभाव दिखता है। यह एक तरह की नाकामी की तस्वीर है। सड़कों हादसों को कम करने के लिए यूरोप की सड़कें पतली हो रही हैं, दक्षिण कोरिया में सभी फ्लाईओवर गिराए जा रहे हैं। पश्चिमी देशों में हरेक गाड़ियों में स्पीड गवर्नर लगाना अनिवार्य हो गया है। भारत में इस दिशा में अभी तक कोई मूलभूत फैसला सामने नहीं आया है। इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के कुछ फैसलों का उल्लेख जरूर किया जा सकता है, लेकिन उन पर अमल नहीं के बराबर होता है। पूरा जोर सड़कों के निर्माण और सुरक्षित ड्राइव के लिए जागरूकता अभियान पर रहता है, जिसके पीछे एक व्यावसायिक अर्थशास्त्र भी काम करता है। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है।

वास्तव में, विकास को मानवीय विकास से जोड़ना है तो हमें ढांचागत निर्माण के विभिन्न पहलुओं को देखना जरूरी है। मानवीय क्षमताओं के अभाव में विकास के मायने खोखले ही सिद्ध होंगे। मानवीय सुरक्षा सवरेपरि होनी चाहिए। सड़कों के लिए बड़ी परियोजना की घोषणा और सड़कों के नाम भर बदल देने से न ही हम मानवीय विकास कर सकते है न ही ढांचागत विकास को मजबूत बना सकते हैं।

(लेखक जेएनयू में रिसर्च स्कॉलर हैं)

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Posted By: Lalit Rai

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