सुशील कुमार सिंह

कश्मीर में आतंकियों के सफाये के लिए शुरू किए गए की कामयाबी से तो यही लगता है कि वर्षो से हिंसा का शिकार कश्मीर घाटी अमन की ओर जा रही है। हालांकि ऐसा दावा करना अभी पूरी तरह सही नहीं है फिर भी जिस तरह टेरर फंडिंग पर शिकंजा कसा गया है और जिस तरह लोगों को भड़काने से हुर्रियत नेता अब बाज आ रहे हैं साथ ही जिस भांति पत्थरबाजों की संख्या में कमी आई है उसे देखते हुए तो यही लगता है। सेना द्वारा दो माह पहले शुरू किया गया लगभग आधा रास्ता तय कर चुका है। चिन्हित 258 दुर्दात आतंकियों में से 120 का सफाया फिलहाल किया जा चुका है।

बीते एक अगस्त को सुरक्षा बलों को 12 से अधिक बार चकमा दे चुका लश्कर का शीर्ष कमांडर अबु दुजाना भी मुठभेड़ में मारा गया। जाहिर है भारतीय सेना के हाथ एक बड़ी कामयाबी लगी है और पाकिस्तान के आतंकियों को बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका लगा है। हालांकि आतंकी नेटवर्क इतना बड़ा है कि इकाई-दहाई की सफलता से बात नहीं बनेगी, बल्कि सैकड़ों-हजारों की तादाद में आतंकियों के सफाये की जरूरत है। 15 लाख का इनामी यह मोस्ट वांटेड पाकिस्तानी आतंकी भारत के लिए बरसों से सिरदर्द बना हुआ था। सोचने वाली बात यह भी है कि कश्मीर के अमन-चैन के साथ जिस तरह से अलगाववादियों ने बेईमानी की है उसे पचाना फिलहाल बहुत मुश्किल है। आधा दर्जन से ज्यादा हुर्रियत नेता हवालात में ठूसे जा चुके हैं। जाहिर है इनके मनोबल पर दोहरी मार तो पड़ी है।

इसी वर्ष 20 जनवरी से अमेरिका में सत्ता परिवर्तन हुआ। बराक ओबामा की जगह डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने जिन्होंने शपथ के एक हफ्ते की भीतर ही सात मुस्लिम देशों पर अमेरिका में प्रवेश पर बैन लगा दिया। अमेरिका के इस कदम से पाकिस्तान भी सकपका गया और उसके भी खूब पसीने छूटे। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाफिज सईद को 31 जनवरी से नजरबंद करने का फरमान पाकिस्तान ने जारी किया गया जिसकी अवधि अब बढ़ा दी गई है। अमेरिका की पाकिस्तान पर आतंक को लेकर टेड़ी हुई नजर भारत को बल प्रदान करने में सहायक तो है, पर पाकिस्तान की बढ़ते करतूतों से तो यही लगता है कि उसे कोई बड़ा भय शायद ही सता रहा हो। इसके पीछे एक बड़ी वजह चीन का उसे प्राप्त हो रहा समर्थन है।

 पाकिस्तान जानता है कि चीन की सरपरस्ती में भारत के साथ छद्म युद्ध बरसों तक बनाए रखा जा सकता है। जिस तरह सिल्क मार्ग व वन बेल्ट वन रोड के माध्यम से चीन पाकिस्तान को अपना उपनिवेश बना रहा है और जिस तरह का लोभ पाकिस्तान को दिखा रहा है उस चकाचौंध में पाकिस्तान अपनी गुलामी को न्यौता दे बैठा है। पाकिस्तान यह नहीं जानता कि तिब्बत से लेकर ताईवान और अब भूटान पर कुदृष्टि रखने वाला चीन कब आर्थिक प्रभाव दिखा कर बीजिंग और इस्लामाबाद के फासले को खत्म कर देगा इसका उसे पता ही नहीं चलेगा। पाक अधिकृत कश्मीर में चीन का वन बेल्ट वन रोड परियोजना का भारत विरोधी है। हैरत इस बात की है कि भारत और चीन के बीच सिक्किम सैक्टर में जारी सैन्य तनाव के बीच 25 जुलाई को दो सौ चीनी सैनिक उत्तराखंड की सीमा में एक किमी अंदर घुसपैठ किए।

वैसे देखा जाय तो वैश्विक परिप्रेक्ष्य में आतंक को लेकर बड़े-बड़े मंचों से बड़ी-बड़ी बातें कही जा रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से लेकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तक दुनिया से आतंक के सफाये को लेकर एकजुटता की बात कर रहे हैं, पर शायद वे अभी भी पूरी तरह भिज्ञ नहीं हैं कि इसकी शुरुआत पहले पाकिस्तान से ही होनी चाहिए और आतंकियों को समर्थन देने वाले चीन को भी कुछ सद्बुद्धि देनी चाहिए। सभी जानते हैं कि कश्मीर घाटी में पसरा आतंकवाद पाकिस्तान की सरपरस्ती में फलता-फूलता है और घाटी में रहने वाले अलगाववादी नेता मसलन हुर्रियत जैसे इसे खाद-पानी देने में कभी भी पीछे नहीं रहे।

कश्मीर में आतंकवाद का जो प्रभाव बीते तीन दशकों से है और जिस तरह इसकी पैदावार प्रतिवर्ष की दर से बढ़ी है उसे देखते हुए तुरंत निपट पाना तो संभव नहीं है, पर सेना जिस तर्ज पर के माध्यम से इनके सफाये में जुटी है उससे बड़ी उम्मीद बंधती है। निर्धारित रणनीति के अंतर्गत इसे लेकर मीलों का सफर तय भी किया गया और नतीजे बेहतरी की ओर हैं। गौरतलब है कि जब इस प्रकार की गतिविधियों को सेना द्वारा अंजाम दिया जा रहा था तो इसी बीच टेरर फंडिंग पर कसा गया शिकंजा कार्रवाई में मददगार सिद्ध हुआ है। दो टूक यह भी है कि घाटी में अलगाववादियों ने आतंकियों के हिंसक मन में खूब पेट्रोल छिड़कने का काम किया है। स्पष्ट है कि कई महीनों से कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी का परिदृश्य बना रहा जिसकी चपेट में सेना भी रही। तांडव इस प्रकार का फैला था कि मानो घाटी में फैलती आग पर काबू पाना संभव ही नहीं है, पर के माध्यम से अमन का रास्ता थोड़ा चौड़ा होता दिखाई दे रहा है।

 घाटी में दो काम करना है एक आतंकियों के खात्मे को लेकर ऑपरेशन जारी रखना तो दूसरा राजनीतिक बिसात पर पारदर्शिता को प्रतिस्थापित करके कश्मीरियों का दिल भारत के लिए धड़काना। मुख्यत: यह बात उन पर लागू है जो अलगाववादियों की चपेट में हैं। पाकिस्तान की जमीन पर भारत को नष्ट करने का जो खाका खींचा जाता है उससे पूरी तरह निजात तभी मिलेगी जब गुलाम कश्मीर से भी आतंकी और उनके लांचिंग पैड को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जाय। सितंबर 2016 में उड़ी घटना के 10 दिन के भीतर जब भारतीय सेना के जवान गुलाम कश्मीर में 10 किमी अंदर प्रवेश कर 40 से अधिक आतंकियों को मार गिराए और कई लांचिंग पैड नष्ट कर दिए तो दुनिया ने भारत के साहस की तारीफ ही की थी और यह उम्मीद जगी थी कि गुलाम कश्मीर के रास्ते घाटी में अमन को निगलने वाले आतंकियों को सबक सिखाया जा सकता है।

भारतीय सेना जिस कदर अपने मिशन में आगे बढ़ रही है उससे यह बल तो मिलता ही है कि आतंकियों समेत घाटी के भीतर के अलगाववादियों का मनोबल टूटेगा, पर इस चिंता से पूरी तरह कैसे मुक्त हुआ जाएगा कि जम्मू-कश्मीर जो भारतीय संविधान की पहली सूची में वर्णित 15वां राज्य है वहां आम राज्यों की तरह शांति और अमन का वातावरण कायम होगा। फिलहाल इन दिनों आतंकियों पर भारी पड़ रहा है और घाटी इनके बोझ से मुक्त हो रही है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) 

Posted By: Lalit Rai

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