नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क] ।  हिंद महासागर में जिस तरह से हाल के दिनों में चीन का दखल बढ़ा है। वो भारत के लिए चिंता का विषय है। भारत सरकार का हमेशा से मत रहा है कि महासागरों के संसाधनों पर दुनिया के सभी मुल्कों का अधिकार है। लेकिन बदनीयती के साथ अगर कोई देश अपने मकसद को हासिल करने की कोशिश करेगा उसे भारत स्वीकार नहीं कर सकता है। हिंद महासागर पर नजर बनाए रखने के लिए भारत लगातार तैयारी करता रहा है। अब अमेरिका के साथ गार्डियन सर्विलांस ड्रोन्स पर समझौते के बाद भारत को ताकत मिली है। हालांकि भारत सरकार अब अमेरिका से मानव रहित युद्ध ड्रोन हासिल करने की योजना पर काम कर रही है।  

 गार्डियन सर्विलांस ड्रोन्स पर बनी सहमति

अमेरिका में निर्मित गार्डियन सर्विलांस ड्रोन्स एमक्यू-9 बी काफी ऊंचाई से और बिना रुके करीब 27 घंटों तक निगरानी और खुफिया जानकारी मुहैया करा सकता है। पीएम मोदी के अमेरिकी दौरे से पहले ट्रंप प्रशासन ने 22 एमक्यू-9 बी ड्रोन्स को बेचने पर हरी झंडी दिखा दी थी। 22 एमक्यू-9 बी ड्रोन्स और उनके स्पेयर पार्ट्स की खरीद के लिए करीब 2-3 बिलियन डॉलर के सौदे पर भारत और अमेरिका के बीच सहमति बनी है। इस सौदे में रखरखाव और प्रशिक्षण की सुविधा शामिल है। नाटो देशों के बाहर भारत इकलौता देश है जिसे एमक्यू-9 बी ड्रोन्स मिलेंगे। लेकिन अमेरिका अभी भी भारत को कंबाट या आर्म्ड ड्रोन्स को बेचे जाने के खिलाफ है। अमेरिका को ये डर सता रहा है कि ऐसा करने पर दक्षिण एशिया में सैन्य संतुलन पर असर पड़ेगा। लेकिन इजरायल से भारत 400 मिलियन डॉलर में 10 हेरोन टीपी मिसाइल की खरीदारी की दिशा में आगे बढ़ चुका है।

भारतीय वायु सेना के पास पहले से ही इजरायल निर्मित हेरोप किलर ड्रोन्स हैं। ये ड्रोन्स क्रूज मिसाइल की तरह दुश्मन के ठिकानों की पहचान करते हैं और फिर आत्मघाती बनकर दुश्मन के ठिकानों और रडारों को विस्फोट कर उड़ा देते हैं। इजरायली हेरोन और सर्चर-दो को अपग्रेड किया गया है ताकि वो न केवल दुश्मन के ठिकानों की निगहबानी कर सकें बल्कि कंबाट ड्रोन की तरह हमला भी कर सकें।

मानव रहित युद्ध ड्रोन पर नजर

गार्डियन सर्विलांस ड्रोन पर अमेरिका के साथ समझौते के बाद अब भारत की निगाह मानव रहित युद्ध ड्रोन पर टिक गई है। हजारों मील दूर दुश्मन के ठिकाने पर कंबाट ड्रोन्स के जरिए निगाह रखा जाता है। इनके जरिए दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमला किया जा सकता है। अपने निशानों को भेदने के बाद इन ड्रोन्स को रिमोट के जरिए अपने बेस पर लाया जा सकता है। और हथियारों से लैस होकर ये किसी और दुश्मन के ठिकानों को निशाना बना सकते हैं। आधुनिक तरीकों से लड़ी जाने वाली लड़ाइयों में ये कंबाट ड्रोन्स गेम चेंजर साबित हो रहे हैं। अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका ने बड़े पैमाने पर प्रीडेटर और रीपर ड्रोन्स का इस्तेमाल किया था। तालिबान ठिकानों पर अमेरिका ने हेलफायर मिसाइल तालिबान के ठिकानों पर निशाना बनाकर उन्हें तबाह कर दिया था।

क्या है घातक प्रोजेक्ट ?

डीआरडीओ-एरोनॉटिकल डेवेलपमेंट एजेंसी मिलकर 2650 करोड़ वाले घातक प्रोजेक्ट पर काम रही हैं। भारत सरकार ने डिजाइन के लिए मई 2016 में 231 करोड़ मुहैया कराए थे। लेकिन बताया जा रहा है कि स्वदेशी तकनीक से निर्मित मानव रहित लड़ाकू ड्रोन्स को बनाने में करीब एक दशक लगेंगे। फाइटर प्लेन की तुलना में ये प्लेन हल्के होंगे। भारतीय वायु सेना ने ड्रोन्स विमानों के संचालन के लिए अलग से कैडर बनाने की सरकार से मांग की है।
 

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Posted By: Lalit Rai

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