'विवादों में उलझना भारत के स्वभाव में नहीं', नागपुर में बोले RSS प्रमुख मोहन भागवत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में कहा कि विवादों में उलझना भारत के स्वभाव में नहीं है। उन्होंने राष्ट्रीय पुस्तक महोत्सव में बोलते हुए कहा कि भारत की परंपरा हमेशा से भाईचारे और सद्भाव पर जोर देती रही है। भागवत ने राष्ट्रवाद की भारतीय अवधारणा को पश्चिमी विचारों से अलग बताया और कहा कि भारत प्राचीन काल से एक राष्ट्र रहा है। उन्होंने एआई के उपयोग को मानव जाति के लाभ के लिए बताया।

नागपुर में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत।
राज्य ब्यूरो, मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (रा.स्व.संघ) के प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को कहा कि विवादों में उलझना भारत के स्वभाव में नहीं है। देश की परंपरा ने हमेशा भाईचारे और सामूहिक सद्भाव पर जोर दिया है। भागवत ने यह बात नागपुर में राष्ट्रीय पुस्तक महोत्सव में बोलते हुए कही।
नागपुर के रेशिम बाग में 22 नवंबर से चल रहे राष्ट्रीय पुस्तक महोत्सव में शनिवार को बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि भारत की राष्ट्रवाद की अवधारणा पश्चिमी व्याख्याओं से मौलिक रूप से भिन्न है। उन्होंने कहा कि हमारा किसी से कोई विवाद नहीं है। हम विवादों से दूर रहते हैं। विवाद करना हमारे देश की प्रकृति में नहीं है। एकजुट रहना और भाईचारा बढ़ाना हमारी परंपरा है।
मोहन भागवत ने और क्या कहा?
उन्होंने कहा कि दुनिया के अन्य हिस्से संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में विकसित हुए हैं। उनके यहां एक बार कोई राय बन जाने के बाद, उस विचार के अलावा कुछ भी अस्वीकार्य हो जाता है। वे अन्य विचारों के लिए दरवाजे बंद कर देते हैं और उसे 'वाद' कहना शुरू कर देते हैं। जबकि भारत की 'राष्ट्र' की अवधारणा पश्चिमी राष्ट्र की अवधारणा से अलग है। हमारे बीच इस बात पर कोई मतभेद नहीं है कि यह राष्ट्र है या नहीं। यह प्राचीन काल से राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में है। हम राष्ट्रीयता शब्द का प्रयोग करते हैं, राष्ट्रवाद का नहीं। भागवत ने राष्ट्र के प्रति विदेशी अवधारणा की ओर संकेत करते हुए कहा 'राष्ट्र' के प्रति अत्यधिक गर्व के कारण दो विश्व युद्ध हुए, यही कारण है कि कुछ लोग राष्ट्रवाद शब्द से डरते हैं।
'भारत हमेशा से एक राष्ट्र रहा है'
भागवत ने कहा कि अगर हम पश्चिमी संदर्भ में राष्ट्र की परिभाषा पर विचार करें, तो इसमें आमतौर पर एक राष्ट्र-राज्य शामिल होता है, जिसकी एक केंद्रीय सरकार पूरे क्षेत्र का प्रबंधन करती है। जबकि भारत हमेशा से एक 'राष्ट्र' रहा है। यहां तक कि विभिन्न शासनों और विदेशी शासन के दौर में भी।
संघ प्रमुख ने कहा कि भारत की राष्ट्रीयता अहंकार या गर्व से पैदा नहीं हुई है, बल्कि लोगों के बीच गहरे अंतर्संबंध और प्रकृति के साथ उनके सह-अस्तित्व से पैदा हुई है। हम सब भाई हैं, क्योंकि हम भारत माता की संतान हैं। धर्म, भाषा, खान-पान, परंपराएं या राज्य जैसे मानव-निर्मित कोई अन्य आधार नहीं हैं। विविधता के बावजूद, हम एक हैं क्योंकि यही हमारी मातृभूमि की संस्कृति है।
'एआई के आगमन को रोका नहीं जा सकता'
उन्होंने कार्यक्रम में युवा लेखकों के साथ बातचीत करते हुए कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसी प्रौद्योगिकी के आगमन को रोका नहीं जा सकता, लेकिन हमें इसकe स्वामी बने रहना चाहिए और इससे निपटते समय अपनी गरिमा बनाए रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि एआई का उपयोग मानव जाति के लाभ के लिए तथा मनुष्य को बेहतर बनाने के लिए किया जाना चाहिए।
भाषा और संस्कृति पर वैश्वीकरण की चुनौती के बारे में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में संघ प्रमुख ने कहा कि यह फिलहाल एक भ्रम है। वैश्वीकरण का वास्तविक युग अभी आना बाकी है और भारत इसे लाएगा। उन्होंने कहा कि भारत में शुरू से ही वैश्वीकरण की अवधारणा रही है और इसे 'वसुधैव कुटुम्बकम' कहा जाता है। हम वैश्विक बाज़ार नहीं बनाते, बल्कि एक परिवार बनाते हैं, जो वैश्वीकरण का असली सार होगा, और वह युग अभी आना बाकी है। इसलिए, वैश्वीकरण के बारे में अपने दिलों से डर या ग़लतफ़हमी निकाल दीजिए।

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