ISRO का 'स्मार्ट ब्वॉय' रॉकेट आज लॉन्च करेगा स्वदेशी GPS सैटेलाइट NVS-03, जानिए यह क्यों है इतना खास
ISRO का स्मार्ट ब्वॉय रॉकेट GSLV आज NVS-03 सैटेलाइट लॉन्च करेगा। श्रीहरिकोटा से होने वाला यह मिशन स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली NavIC को और अधिक मजबूत और आत्मनिर्भर बनाएगा।

ISRO का 'स्मार्ट ब्वॉय' रॉकेट लॉन्च करेगा स्वदेशी सैटेलाइट NVS-03 तस्वीर- एक्स @isro
HighLights
NVS-03 ने NavIC सिस्टम को और मजबूत किया।
स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक से आत्मनिर्भरता बढ़ी।
GSLV रॉकेट अब 'स्मार्ट ब्वॉय' के रूप में।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) आज भारत के अगले जनरेशन के नेविगेशन सैटेलाइट NVS-03 को लॉन्च करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
इस मिशन के लिए जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (GSLV) रॉकेट का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसे पहले 'नॉटी ब्वॉय' यानी नटखट लड़का कहा जाता था, लेकिन अब इसे 'स्मार्ट ब्वॉय' के रूप में नई पहचान मिली है।
क्या है इस मिशन का मुख्य उद्देश्य?
बता दें कि यह लॉन्च आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC-SHAR) के दूसरे लॉन्च पैड से निर्धारित समय पर किया जाएगा। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य भारत के स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम यानी NavIC को और अधिक मजबूत बनाना है।
क्या है NavIC और यह क्यों जरूरी है?
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि NavIC का पूरा नाम नेविगेशन विद इंडियन कांस्टेलेशन है। यह एक तरह का 'स्वदेशी जीपीएस' है, जो भारत और उसके आसपास की सटीक लोकेशन, नेविगेशन और समय की जानकारी देता है।
करगिल युद्ध से जुड़ी शुरुआत
खास बात यह है कि इस स्वदेशी प्रणाली की नींव 1999 के करगिल युद्ध के दौरान पड़ी थी। उस समय भारत को यह अहसास हुआ कि सैन्य और रणनीतिक मामलों के लिए पूरी तरह से विदेशी नेविगेशन प्रणालियों पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है, क्योंकि जरूरत पड़ने पर सटीक डेटा मिलने में दिक्कतें आ सकती हैं।
देखा जाए तो समय बीतने के साथ यह जरूरत और बढ़ गई। इसकी वजह को ऐसे समझिए कि हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी यह बात सामने आई कि देश की सुरक्षा और सामरिक संचालन के लिए एक मजबूत और आत्मनिर्भर नेविगेशन नेटवर्क होना कितना जरूरी है।
NVS-03 सैटेलाइट की क्या है खासियत?
यह सैटेलाइट भारत की अंतरिक्ष और सुरक्षा क्षमताओं के लिहाज से कई मायनों में बेहद खास है। इस बात को ऐसे समझिए कि नेविगेशन सिस्टम में सटीक समय का बहुत बड़ा महत्व होता है। इसकी वजह है कि जरा सी भी चूक जमीन पर बड़ी दूरी की गलती पैदा कर सकती है।

ऐसे में यह समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि पहले के कुछ सैटेलाइट्स में विदेशी रुबिडियम एटॉमिक क्लॉक में खराबी आने से दिक्कतें आई थीं। लेकिन NVS-03 में भारत की अपनी स्वदेशी तकनीक से बनी एटॉमिक क्लॉक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो देश की आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है।
बेहतर कमर्शियल इस्तेमाल के भी मायने समझिए
NVS-03 अपने साथ मौजूदा L5 और S-बैंड सिग्नलों के अलावा नया L1 सिग्नल भी लेकर आ रहा है। L1 सिग्नल का इस्तेमाल दुनिया भर के आम नागरिक उपकरणों, स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच और नेविगेशन डिवाइस में बड़े पैमाने पर होता है। इससे आम जनता के लिए इस स्वदेशी तकनीक का दायरा और बढ़ जाएगा।
दूसरी ओर यह सिस्टम भारत की मुख्य भूमि के अलावा उसके चारों ओर लगभग 1500 किलोमीटर के दायरे तक सटीक सेवाएं प्रदान करेगा। इसमें हिंद महासागर का क्षेत्र भी शामिल है, जो नौवहन, विमानन, आपदा प्रबंधन और सैन्य अभियानों के लिए बेहद उपयोगी है।
'नॉटी ब्वॉय' से 'स्मार्ट ब्वॉय' तक...कैसा रहा रॉकेट का सफर?
गौरतलब है कि जिस GSLV-F18 रॉकेट से यह लॉन्चिंग हो रही है, वह GSLV कार्यक्रम की 20वीं उड़ान है। शुरुआत में क्रायोजेनिक इंजन तकनीक को साधने में इस रॉकेट को कई असफलताओं का सामना करना पड़ा था, जिसके कारण वैज्ञानिक इसे मजाकिया लहजे में 'नॉटी ब्वॉय' कहते थे।
लेकिन इसरो के वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत के बाद यह रॉकेट भारत के सबसे भरोसेमंद और भारी-भरकम लॉन्चर्स में से एक बन गया है। लगभग 50 मीटर लंबा और 420 टन वजनी यह तीन चरणों वाला रॉकेट सैटेलाइट को सीधे जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित करेगा।
आत्मनिर्भर भारत की राह में मील का पत्थर
इस बात को ऐसे समझिए कि पिछले कुछ वर्षों में कुछ नेविगेशन सैटेलाइट्स और उनके पेलोड में आई तकनीकी खराबी के कारण NavIC नेटवर्क अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहा था। दूसरी अहम बात यह है कि भारत को इस क्षेत्रीय सेवा को निर्बाध रूप से चलाने के लिए कम से कम सात सक्रिय उपग्रहों की जरूरत होती है।
ऐसे में NVS-03 के अंतरिक्ष में स्थापित होने के बाद इस अंतर को खत्म करने में मदद मिलेगी। इसके बाद आने वाले समय में NVS-04 और NVS-05 जैसे उपग्रह भी कतार में हैं, जो देश के नेविगेशन नेटवर्क को और अधिक सुरक्षित, विश्वसनीय और मजबूत बनाएंगे। कुल मिलाकर यह लॉन्च भारत को भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच अंतरिक्ष के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होगा।
