ISRO सैटेलाइट को मिला अल नीनो का सबसे खतरनाक संकेत, भारत समेत दुनिया पर होगा सीधा असर
ISRO के EOS-06 सैटेलाइट ने 741 किमी की ऊंचाई से 'गॉडजिला अल नीनो' के स्पष्ट और शुरुआती संकेत पकड़े हैं, ...और पढ़ें

ISRO के सैटेलाइट ने पकड़े गॉडजिला अल नीनो' के शुरुआती संकेत

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अंतरिक्ष में 741 किलोमीटर की ऊंचाई पर तैनात भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के सैटेलाइट EOS-06 ने महासागर में विकसित हो रहे 'गॉडजिला अल नीनो' के अब तक के सबसे स्पष्ट और शुरुआती संकेतों का पता लगाया है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की चेतावनियों का समर्थन करते हुए ISRO) के डेटा से खुलासा हुआ है कि उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में फाइटोप्लांकटन (क्लोरोफिल-ए) की मात्रा में भारी गिरावट आई है और समुद्री हवाओं का रुख बदल गया है।
पारंपरिक तापमान-आधारित मापदंडों से काफी पहले मिले संकेतों के अनुसार, आने वाले महीनों में यह अल नीनो और विकराल रूप ले सकता है, जिससे न केवल वैश्विक जलवायु पर असर पड़ेगा बल्कि भारतीय मानसून और कृषि क्षेत्र के सामने भी बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
आने वाले महीनों में दिख सकता विकराल रूप
अवलोकन से सप्ष्ट संकेत मिल रहे हैं कि वैश्विक जलवायु प्रणाली एक अत्यंत शक्तिशाली एल नीनो घटना की ओर बढ़ रही है। इसे लेकर वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि आने वाले महीनों में यह और अधिक तीव्र हो सकता है। अल नीनो और विकराल रूप न केवल वैश्विक जलवायु पर असर पड़ेगा बल्कि भारतीय मानसून और कृषि क्षेत्र के सामने भी बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
क्लोरोफिल-ए में तेजी से आई गिरावट
वैज्ञानिकों के अनुसार, सबसे चिंताजनक संकेत क्लोरोफिल-ए (सूक्ष्म समुद्री पौधों 'फाइटोप्लांकटन' में पाया जाने वाला वर्णक) के स्तर में आई भारी कमी है।

हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र (NRSC) के विश्लेषण के मुताबिक, 2024 और 2025 की तुलना में उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की सतह पर क्लोरोफिल की मात्रा में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। इसके एलावा, उपग्रह ने समुद्री हवाओं के रुख को पूर्वी से बदलकर पश्चिमी होते हुए भी पकड़ा है, यह एल नीनो के विकास का प्रमुख लक्षण है।
पारंपरिक तरीकों से पहले चेतावनी
इस डेटा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि क्लोरोफिल महासागर में होने वाले बदलावों पर तुरंत प्रतिक्रिया देता है। पारंपरिक तापमान-आधारित मापदंडों के मुकाबले यह तकनीक वैज्ञानिकों को अल नीनो की औपचारिक घोषणा से काफी पहले चेतावनी दे सकती है।
इसरो के वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि पूर्वानुमान के अनुसार अल नीनो और तीव्र होता है, तो आने वाले महीनों में प्रशांत महासागर में कम क्लोरोफिल वाला क्षेत्र और भी अधिक स्पष्ट हो सकता है।
भारत के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?
भारत के लिए अल नीनो विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से इसका संबंध दक्षिण-पश्चिम मानसून की कम वर्षा से रहा है। हर अल नीनो के कारण भारत में सूखा नहीं पड़ता, लेकिन गंभीर अल नीनो के दौरान अक्सर कम वर्षा, मिट्टी में नमी की कमी, कृषि पर दबाव और जल संसाधनों को लेकर चिंताएं देखी गई हैं।
अल नीनो से जुड़ी प्रशांत महासागर की हवाओं में परिवर्तनशीलता भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून की वर्षा को संचालित करने वाले व्यापक वायु परिसंचरण को प्रभावित कर सकती है।
क्या कहता है भारतीय मौसम विभाग?
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) का कहना है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में फिलहाल मध्यम अल नीनो की स्थिति बनी हुई है, जिसके चलते मध्य और पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि देखी जा रही है।
IMD के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून के शेष समय में इन स्थितियों के और मजबूत होने की संभावना है। मानसून मिशन युग्मित पूर्वानुमान प्रणाली के पूर्वानुमान भी इस दौरान अल नीनो की स्थिति के और मजबूत होने का संकेत दे रहे हैं।
इस प्रबलता के संकेत केवल भारत में ही नहीं देखे जा रहे हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने भी चेतावनी दी है कि एक अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो उभर रहा है और यह 2027 की शुरुआत तक बना रह सकता है, जिससे चरम मौसम, वैश्विक तापमान में वृद्धि और व्यापक जलवायु परिवर्तन की आशंका बढ़ रही है।
भारतीय मानसून पर असर
पृथ्वी से 741 किलोमीटर की ऊंचाई पर तैनात EOS-06 उपग्रह वैज्ञानिकों को हाल के वर्षों की सबसे शक्तिशाली अल नीनो घटनाओं में से एक की समय से पहले सटीक झलक दे रहा है। इसके संकेत बताते हैं कि आने वाले दिनों में वैश्विक मौसम चक्र के साथ-साथ भारतीय मानसून पर भी इसके बेहद गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
