इसरो ने बनाई अंतरिक्ष के लिए रेडिएशन रोधी बीमफार्मर चिप, गगनयान में होगा इस्तेमाल
इसरो ने अंतरिक्ष में रेडिएशन से बचाव के लिए एस बैंड पर आधारित रेडिएशन रोधी बीमफार्मर चिप विकसित की है। ...और पढ़ें

इसरो अंतरिक्ष में भेजेगा भारत में बनी रेडिएशन रोधी बीमफार्मर चिप।
HighLights
इसरो ने अंतरिक्ष के लिए रेडिएशन रोधी बीमफार्मर चिप बनाई।
गगनयान मिशन-2 में अंतरिक्ष यात्री निर्बाध संवाद के लिए उपयोग करेंगे।
भविष्य में ऑप्टिकल कम्युनिकेशन के लिए लेजर ड्राइवर चिप भी बनेगी।
डिजिटल डेस्क, इंदौर। रेडिएशन माइक्रोचिप का दुश्मन माना जाता है। अंतरिक्ष में रेडिएशन के कारण चिप काम करना बंद कर देती है, या फेल हो जाती है। ऐसी स्थिति में सिस्टम को शट-डाउन करना पड़ता है। इसरो ने अब इस मुश्किल का समाधान खोज लिया है।
इसके तहत इसरो ने एस बैंड पर आधारित रेडिएशन रोधी बीमफार्मर चिप तैयार की है। अगस्त 2027 में प्रस्तावित गगनयान मिशन-2 परियोजना में इसका इस्तेमाल किया जाएगा।
अब आसानी से होगा संवाद
मिशन पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्री इस चिप की मदद से अंतरिक्ष में एक-दूसरे से निर्बाध संवाद कर सकेंगे। इसके अलावा, भविष्य में सुरक्षित कम्युनिकेशन के लिए इसरो आप्टिकल कम्युनिकेशन सेटेलाइट में रेडिएशन रोधी ‘लेजर ड्राइवर चिप’ का इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है। इस तरह की चिप अब तक दुनिया में किसी ने तैयार नहीं की है।
यह जानकारी इंदौर में आयोजित एमपी सेमीकंडक्टर समिट में शामिल होने आए इसरो अहमदाबाद के विज्ञानी डा. हरिशंकर गुप्ता ने नईदुनिया से विशेष चर्चा में दी। डॉ. गुप्ता ने बताया कि चिप को पहले डिजाइन किया जाता है, और फिर फैब्रिकेशन के जरिए तैयार किया जाता है। मोहाली में चिप फैब्रिकेशन की सीमित सुविधा उपलब्ध है।
इसके अलावा धुलेरा में टाटा और नोएडा में चिप फैब्रिकेशन यूनिट का निर्माण हो रहा है। फिलहाल भारत की ज्यादातर चिप इजराइल, यूएस और ताइवान में बनती हैं। वहां चिप तैयार होने के बाद भारत में उसकी इलेक्ट्रिकल और तापमान संबंधी जांच की जाती है। साथ ही, 20 साल तक चलने की क्षमता के लिए विश्वसनीयता परीक्षण भी होता है।
दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी परिसर स्थित इंटर यूनिवर्सिटी एक्सीलरेटर सेंटर (आइयूएसी) की लैब में चिप का रेडिएशन टेस्ट किया जाता है। रेडिएशन रोधी परीक्षण में सफल होने के बाद ही चिप का अंतरिक्ष मिशन में इस्तेमाल होता है। अंतरिक्ष मिशन में उपयोग की जाने वाली चिप की जांच में ही तीन साल लगते हैं।
