'RSS में जाति या रुतबे का भेद नहीं, मेहनत से ही अवसर', इजरायली रिसर्चर ने साझा किया अपना नजरिया
इजरायली शोधकर्ता येशाया रोसेनमैन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ अपने अनुभव को 'सकारात्मक' बताते हुए संगठन की मेहनत, समर्पण और समाजसेवा की सराहना की।

संघ में जाति या रुतबे का भेद नहीं, मेहनत से ही अवसर।
HighLights
इजरायली शोधकर्ता ने आरएसएस के समर्पण और समाजसेवा की सराहना की।
संगठन में तरक्की का आधार मेहनत, योग्यता होनी चाहिए: रोसेनमैन।
प्रधानमंत्री मोदी को मेहनत और उपलब्धियों का प्रमुख उदाहरण बताया।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। इजरायली शोधकर्ता येशाया रोसेनमैन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ अपने अनुभव को ‘सकारात्मक’ बताते हुए संगठन में मेहनत, समर्पण और समाजसेवा पर दिए जाने वाले जोर की सराहना की।
उन्होंने आरएसएस को लेकर अपना नजरिया साझा किया और कहा कि तरक्की का आधार जाति या आर्थिक विशेषाधिकार के बजाय मेहनत होनी चाहिए। रोसेनमैन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस सिद्धांत का प्रमुख उदाहरण बताया।
रोसेनमैन उन 18 युवा प्रतिभाशाली लोगों में शामिल हैं, जिन्हें संगठन के शताब्दी वर्ष के मौके पर प्रकाशित पुस्तक ‘हंड्रेड इयर्स यंग: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ में शामिल किया गया है। संघ से अपने जुड़ाव के बारे में बताते हुए इजरायली शोधकर्ता ने कहा, वहां के लोग दोस्ताना हैं और खुले दिल से आपका स्वागत करते हैं। संगठन में मेरे कुछ दोस्त हैं, जिनसे मैं अब भी मिलता हूं। उनके सदस्यों का अपने उद्देश्य के प्रति समर्पण मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।
रोसेनमैन के मुताबिक, संगठन के सदस्य भौतिक लाभ या निजी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य के प्रति ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ काम करते हैं। आरएसएस में व्यक्ति की तरक्की मेहनत और योग्यता के आधार पर होनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी इसका उदाहरण हैं। वह अपनी कार्यशैली और उपलब्धियों के दम पर आगे बढ़े हैं।”
रोसेनमैन ने कहा कि पश्चिमी देशों में भारत के बारे में सीमित जानकारी होने के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के रूप में उभरे हैं।
उन्होंने कहा, “आमतौर पर पश्चिम के लोग भारत के बारे में बहुत कम जानते हैं; वे सिर्फ ताजमहल, महात्मा गांधी और नरेंद्र मोदी को जानते हैं। इसलिए वे यह पहचानते हैं कि वह (प्रधानमंत्री मोदी) एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड हैं और यह बात अपने आप में बहुत कुछ कहती है। इसके साथ सम्मान भी आता है। प्रधानमंत्री की वैश्विक पहचान के साथ भारत का गौरव भी बढ़ा है।”
'आरएसएस पीढ़ियों तक चलने वाला काम करता है'
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर संगठन की पड़ताल करने वाली पुस्तक ‘हंड्रेड इयर्स यंग: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की लेखिका रश्मि सामंत ने कहा कि आरएसएस को किसी एक नजरिये से या कम समय में नहीं समझा जा सकता।
सामंत ने आरएसएस को पीढ़ियों तक चलने वाला काम” करने वाला संगठन बताया। उन्होंने कहा कि उसका मूल ध्येय व्यक्ति निर्माण है। उन्होंने कहा कि आरएसएस कोई सामान्य संगठन नहीं है। संघ पीढ़ियों तक चलने वाला काम करता है। उसका मूल ध्येय व्यक्ति निर्माण है और यह ऐसा काम नहीं है जो एक या दो दिन में हो जाए; यह पीढ़ियों में होता है।
अभी केवल चार पीढ़ियां हुई हैं, इसलिए संघ का लक्ष्य बहुत बड़ा है और उसका कामकाज बहुत व्यापक है। मेरा मानना है कि संगठन अभी सिर्फ 100 साल पुराना है।
(समाचार एजेंसी आईएएनएस के इनपुट के साथ)
