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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 26, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

नए बाजारों की तलाश, लागत में कमी और वर्कफोर्स की अपस्किलिंग से दूर हो सकती है आईटी सेक्टर की चिंता

Published: Wed, 26 Mar 2025 06:10 PM (IST)

भारतीय आईटी क्षेत्र में 2025 तक मंदी की आशंका जताई जा रही है जिसका कारण वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं भू-राजनीतिक तनाव ...और पढ़ें

अमेरिका द्वारा लगाए गए नए टैरिफ और वैश्विक व्यापार तनाव ने अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है।
अमेरिका द्वारा लगाए गए नए टैरिफ और वैश्विक व्यापार तनाव ने अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है।

 नई दिल्ली, अनुराग मिश्र।

वैश्विक आईटी सेवा कंपनी एक्सेंचर की रिपोर्ट ने आईटी बाजार में भूचाल ला दिया। एक्सेंचर की सीईओ जूली स्पेलमैन स्वीट ने अमेरिकी प्रशासन की नीतियों का हवाला देते हुए कहा कि नई सरकार संघीय खर्च को अधिक कुशल बनाने के प्रयास में है, जिसके कारण कई नई खरीद प्रक्रियाएं धीमी हो गई हैं, जिससे हमारी बिक्री और राजस्व पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। ​ "डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी" (DOGE) द्वारा की गई लागत कटौती से भारतीय आईटी कंपनियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है। विश्लेषकों का मानना है कि इन कटौतियों के कारण इन कंपनियों की वृद्धि और राजस्व प्रभावित हो सकते हैं, विशेषकर जब वैश्विक स्तर पर पहले से ही मंदी और अनिश्चितता का माहौल है। ​कुछ अर्थशास्त्रियों के अनुसार, अमेरिकी सरकार द्वारा लगाए गए टैरिफ और खर्च में कटौती के कारण यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था धीमी होती है, तो इसका भारतीय आईटी कंपनियों पर और भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि भारतीय आईटी कंपनियां अपनी आधे से अधिक कमाई अमेरिका को निर्यात से करती हैं।

भारतीय आईटी इंडेक्स में इस वर्ष अब तक 15.3% की गिरावट दर्ज की गई है, जो जून 2022 के बाद सबसे खराब तिमाही की ओर इशारा करता है। इस दौरान TCS, विप्रो, इंफोसिस और HCL टेक जैसी प्रमुख कंपनियों के शेयरों में 11.2% से 18.1% तक की गिरावट आई है। ​ हाल ही में अमेरिका द्वारा लगाए गए नए टैरिफ और वैश्विक व्यापार तनाव ने अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है। वहीं भू-राजनीतिक तनाव, मुद्रा अवमूल्यन, एआई का तेजी से बढ़ना, सेवाओं और बाजारों के विविधीकरण से आईटी बाजार में हड़कंप मचा हुआ है। आईटी उद्योग लंबे समय से नवाचार, नौकरी सृजन और वैश्विक डिजिटल परिवर्तन का केंद्र रहा है। हालांकि, हालिया आंकड़े बताते हैं कि यह तेज़ विकास अब धीमा पड़ सकता है। क्या यह केवल अस्थायी ठहराव है, या किसी बड़े परिवर्तन का संकेत? हाल के महीनों में वेंचर कैपिटल फंडिंग और आईटी बजट में कटौती देखी गई है। कंपनियां विस्तार के बजाय लागत में कमी को प्राथमिकता दे रही हैं।

एलटीआईमाइंडट्री के पार्टनर और हेड स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप दीपक शर्मा कहते हैं कि भारतीय आईटी क्षेत्र में 2025 तक मंदी की आशंका जताई जा रही है, जिसका कारण वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनाव और एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) तथा ऑटोमेशन हैं। ये सभी कारक मिलकर उस पारंपरिक विकास मॉडल को चुनौती दे रहे हैं, जिस पर भारतीय आईटी उद्योग अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को लागत-कुशल आईटी सेवाएं प्रदान करने के लिए निर्भर रहा है। 2025 की मंदी भारतीय आईटी क्षेत्र में विशेष रूप से पारंपरिक आईटी सेवाओं, डिजिटल परिवर्तन पहल, बीपीओ और लेगेसी सिस्टम मेंटेनेंस को सबसे अधिक प्रभावित करेगी।

हालांकि, सेवाओं और बाजारों में विविधीकरण, लागत प्रबंधन, कार्यबल का अपस्किलिंग, नवाचार में निवेश, रणनीतिक साझेदारी, ग्राहक-केंद्रित दृष्टिकोण, सरकारी समर्थन की वकालत और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स का लाभ उठाकर, कंपनियां इन चुनौतियों का समाधान कर सकती हैं। ये रणनीतियां न केवल मंदी से उबरने में मदद करेंगी, बल्कि बाजार में पुनरुत्थान के दौरान कंपनियों को विकास के लिए तैयार करेंगी।

टैगलैब्स के संस्थापक हरिओम सेठ कहते हैं कि भारतीय आईटी कंपनियों को कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। इसके लिए शैक्षणिक संस्थानों के साथ सहयोग सबसे अहम है। उनके साथ मिलकर काम करना इस प्रक्रिया को अधिक लाभकारी बना सकता है। एआई तकनीकी कंपनियों के साथ साझेदारी करने से उन्नत उपकरणों और विशेषज्ञता तक पहुंच मिलती है। कंपनियों को बड़े पैमाने पर अपनाने से पहले कुछ क्षेत्रों में एआई एप्लिकेशन की जांच के लिए पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने चाहिए।

वेब और यूएक्स डिजाइन कंपनी के येलो स्लाइस के संस्थापक किशोर फोगला कहते है कि भारतीय आईटी कंपनियां आउटसोर्सिंग सेवाओं में उत्कृष्ट रही हैं। हालांकि, आर्थिक मंदी के दौरान ग्राहक अपनी खर्च करने की क्षमता को कम कर सकते हैं या लागत बचाने के लिए काम को इन-हाउस ले जा सकते हैं। कंपनियों द्वारा दक्षता और लागत कटौती पर ध्यान केंद्रित करने के कारण यह क्षेत्र दबाव में आ सकता है।

वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएं

दीपक शर्मा कहते हैं कि मंदी का एक प्रमुख कारण वैश्विक आर्थिक गिरावट है, विशेष रूप से अमेरिका और यूरोप जैसे प्रमुख बाजारों में, जो भारतीय आईटी सेवाओं के सबसे बड़े उपभोक्ता हैं। इन क्षेत्रों में महंगाई, बढ़ती ब्याज दरें और भू-राजनीतिक संघर्ष के कारण आईटी खर्च में कमी आई है। कारोबार अब नई परियोजनाओं की बजाय लागत में कटौती को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसे में वह डिजिटल परिवर्तन की पहलों में देरी कर रहे हैं या उन्हें सीमित कर रहे हैं। चूंकि भारतीय आईटी कंपनियां इन विदेशी बाजारों से मिलने वाले आउटसोर्सिंग अनुबंधों पर बहुत अधिक निर्भर हैं, इसलिए विदेशी बाजारों में आर्थिक मंदी सीधे उनके राजस्व और विकास को प्रभावित करती है। वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की पारस्परिकता इन प्रभावों को और अधिक बढ़ा देती है, जिससे आईटी क्षेत्र को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

भू-राजनीतिक तनाव

दीपक शर्मा मानते हैं कि भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं भारतीय आईटी क्षेत्र के लिए स्थिति को और जटिल बना रही हैं। व्यापार नीतियां, वीजा प्रतिबंध और विशेष रूप से अमेरिका में प्रवासन सुधार कुशल श्रमिकों की आवाजाही को सीमित कर सकते हैं। यह बाजार पहुंच को बाधित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, कठोर वर्क वीजा नीतियां भारत की वैश्विक आउटसोर्सिंग हब की भूमिका को कमजोर कर सकती हैं। इसके अतिरिक्त, रेड सी (लाल सागर) जैसे क्षेत्रों में संघर्ष के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और व्यापार मार्गों में व्यवधान ने निर्यात पर दबाव बढ़ा दिया है। ये भू-राजनीतिक जोखिम भारतीय आईटी कंपनियों के लिए एक अनिश्चित वातावरण बनाते हैं।

टैरिफ और मुद्रा अवमूल्यन

विशेष रूप से अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ (शुल्क) भारतीय आईटी क्षेत्र के लिए एक गंभीर खतरा हैं। दीपक शर्मा का मानना है कि आईटी सेवाओं पर लगाए गए टैरिफ भारतीय कंपनियों के लिए लागत बढ़ा सकते हैं, जिससे उनकी सेवाएं वैश्विक स्तर पर कम प्रतिस्पर्धी हो जाती हैं। इससे आउटसोर्सिंग अनुबंधों में कमी और राजस्व वृद्धि की गति धीमी हो सकती है। इसके अलावा, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का अवमूल्यन निर्यातकों के लिए राजस्व में वृद्धि करता है, लेकिन आयात और परिचालन खर्चों की लागत भी बढ़ाता है। टैरिफ और कमजोर मुद्रा का यह दोहरा प्रभाव भारतीय आईटी कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव डालता है।

प्रतिस्पर्धा: भारतीय आईटी कंपनियों को वियतनाम, फिलीपींस और पूर्वी यूरोप जैसे अन्य देशों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। ये देश कम लागत वाली आईटी सेवाएं प्रदान करते हैं, जिससे वे भारतीय आईटी कंपनियों के लिए एक आकर्षक विकल्प बन जाते हैं।

एआई और ऑटोमेशन का बदलता परिदृश्य

एआई और ऑटोमेशन की तीव्र प्रगति आईटी उद्योग को प्रभावित कर रही है। हालांकि ये तकनीकें नवाचार के अवसर प्रदान करती हैं, लेकिन वे पारंपरिक आईटी सेवाओं के लिए खतरा भी उत्पन्न करती हैं। भारतीय आईटी कंपनियां, जो ऐतिहासिक रूप से ऐसे कार्यों के लिए किफायती श्रम प्रदान करने में उत्कृष्ट रही हैं, अब नौकरी की कटौती और अपने कार्यबल को नए कौशल में प्रशिक्षित करने की आवश्यकता का सामना कर रही हैं।

एआई और क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी उच्च-मूल्य वाली सेवाओं की ओर स्थानांतरण हो रहा है, लेकिन यह बदलाव चुनौतीपूर्ण और महंगा है। इसके अलावा, वैश्विक ग्राहक एआई और स्वचालन को अपनाते हुए कुछ कार्यों को इन-हाउस (आंतरिक रूप से) पूरा करने लगे हैं, जिससे आउटसोर्सिंग की मांग कम हो रही है। दीपक कहते हैं कि इन चुनौतियों के बावजूद, एआई और स्वचालन भारतीय आईटी क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण अवसर भी प्रदान करते हैं। LTIMindtree जैसी कंपनियां अपनी "AI for Everyone | AI in Everything | Everything in AI" रणनीति के साथ इस दिशा में अग्रसर हैं। यह रणनीति व्यवसायों के लिए एआई को सुलभ और क्रियान्वित करने, संचालन में एआई को एकीकृत करने और नवाचार को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।

LTIMindtree के माइक्रोसॉफ्ट कोपायलट के साथ की गई पहल दर्शाती है कि कैसे एआई मानव क्षमताओं को बढ़ा सकता है, कार्यप्रवाह को सुव्यवस्थित कर सकता है और इनोवेशन को प्रोत्साहित कर सकता है। भारतीय आईटी कंपनियां यदि एआई को अपनाने में सक्रिय रुख अपनाती हैं, तो वे इन चुनौतियों से निपट सकती हैं और नए बाजारों तक पहुंच बना सकती हैं।

क्लाउड कंप्यूटिंग: किशोर फोगला कहते हैं कि अधिकांश क्लाउड सेवाएं तीव्र गति से विकास कर रही हैं, लेकिन मंदी के दौरान कंपनियां माइग्रेशन प्रोजेक्ट को धीमा कर सकती हैं या क्लाउड से संबंधित खर्चों में कटौती कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में कंपनियां नई संरचना बनाने के बजाय मौजूदा संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने की कोशिश कर सकती हैं। आर्थिक अनिश्चितता की स्थिति में कई व्यवसाय नए सॉफ्टवेयर कार्यान्वयन और अपग्रेड को टाल सकते हैं।

मंदी से सबसे अधिक प्रभावित तकनीकी क्षेत्र

1. पारंपरिक आईटी सेवाएं (जैसे- एप्लिकेशन डेवलपमेंट, मेंटेनेंस और सपोर्ट)

दीपक शर्मा कहते हैं कि पारंपरिक आईटी सेवाएं भारतीय आईटी उद्योग की रीढ़ रही हैं, जो मुख्य रूप से अमेरिका और यूरोप जैसे बाजारों से मिलने वाले आउटसोर्सिंग अनुबंधों पर निर्भर हैं। हालांकि, वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण इन क्षेत्रों में आईटी बजट में कटौती की जा रही है। व्यवसाय अब नई परियोजनाओं की बजाय लागत में कटौती को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके अलावा, एआई और स्वचालन की बढ़ती उपयोगिता ने उन श्रम-गहन, दोहराव वाले कार्यों की मांग को कम कर दिया है, जिनमें भारतीय कंपनियां पारंपरिक रूप से विशेषज्ञ रही हैं। इस बदलाव से राजस्व वृद्धि को खतरा है, क्योंकि ग्राहक विशेष रूप से एप्लिकेशन मेंटेनेंस और सपोर्ट अनुबंधों में देरी कर रहे हैं या उन्हें सीमित कर रहे हैं।

2. डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन पहल

क्लाउड माइग्रेशन, एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर अपग्रेड और प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण जैसी डिजिटल परिवर्तन परियोजनाएं कई आईटी कंपनियों के लिए प्रमुख राजस्व स्रोत हैं। हालांकि, आर्थिक अनिश्चितता के कारण कंपनियां इन दीर्घकालिक परियोजनाओं को टाल रही हैं या इन पर खर्च में कटौती कर रही हैं और अल्पकालिक लागत बचत को प्राथमिकता दे रही हैं। इस हिचकिचाहट के कारण बड़े पैमाने की ट्रांसफॉर्मेशन डील की प्रक्रिया धीमी हो रही है, जिससे उन कंपनियों के विकास पर असर पड़ रहा है जो ऐसी परियोजनाओं पर निर्भर हैं।

3. बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (बीपीओ) और कम-कौशल सेवाएं

बीपीओ सेवाएं, जिनमें आमतौर पर ग्राहक सहायता या डेटा एंट्री जैसे दोहराव वाले कार्य शामिल होते हैं, तेजी से एआई और रोबोटिक प्रोसेस ऑटोमेशन (RPA) द्वारा प्रतिस्थापित किए जा रहे हैं। यह तकनीकी बदलाव मानव श्रम की आवश्यकता को कम कर रहा है, जो भारत के बीपीओ उद्योग की मुख्य विशेषता रही है।

4. लेगेसी सिस्टम मेंटेनेंस

लेगेसी सिस्टम (पुरानी तकनीकों) का रखरखाव भारतीय आईटी कंपनियों के लिए एक स्थिर राजस्व स्रोत रहा है। हालांकि, जैसे-जैसे व्यवसाय अपनी आईटी संरचना को लागत में कटौती और दक्षता सुधार के लिए आधुनिक बना रहे हैं, लेगेसी समर्थन की मांग घट रही है। आर्थिक मंदी इस बदलाव को तेज कर सकती है, जिससे इस क्षेत्र में और अधिक गिरावट आ सकती है। वे कंपनियां जो लेगेसी मेंटेनेंस अनुबंधों पर अत्यधिक निर्भर हैं, उन्हें अवसरों में कमी का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि ग्राहक आधुनिक और स्केलेबल सिस्टम की ओर बढ़ रहे हैं।

तत्काल चुनौतियों का समाधान करने के लिए बनानी होगी रणनीति

भारतीय आईटी कंपनियां 2025 की मंदी के प्रभावों को कम करने के लिए निम्नलिखित रणनीतियां अपना सकती हैं, जो न केवल तत्काल चुनौतियों का समाधान करती हैं बल्कि दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता को भी मजबूत बनाती हैं।

सेवाओं और बाजारों का विविधीकरण

नई तकनीकी क्षेत्रों (जैसे एआई-आधारित एनालिटिक्स, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा) और नए भौगोलिक क्षेत्रों में विस्तार करने से पारंपरिक आईटी सेवाओं और अमेरिका तथा यूरोप जैसे अस्थिर बाजारों पर निर्भरता कम होती है। दीपक शर्मा कहते हैं कि एआई, मशीन लर्निंग और डेटा एनालिटिक्स जैसे उच्च-विकास वाले क्षेत्रों में विशेषज्ञता विकसित करने की आवश्यकता है। वही एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे उभरते बाजारों पर अधिक फोकस करने की जरूरत है।

नैतिक मुद्दों का ध्यान रख पारदर्शिता सुनिश्चित करना

एआई के उपयोग से जुड़े नैतिक चिंताओं जैसे एल्गोरिदम में पूर्वाग्रह या डेटा गोपनीयता पर विचार करना आवश्यक है। हरिओम कहते हैं कि सभी हितधारकों का विश्वास बनाए रखने के लिए कंपनियों को अपने एआई सिस्टम में पारदर्शिता और निष्पक्षता लागू करनी चाहिए।

डेटा प्रबंधन को मजबूत बनाना और इनोवेशन को बेहतर करना

हरिओम सेठ कहते हैं कि एआई डेटा-केंद्रित होता है, इसलिए प्रभावी एआई प्राप्त करने के लिए मजबूत डेटा प्रबंधन की प्रक्रियाओं को अपनाना पहला महत्वपूर्ण कदम है। एआई तकनीक में नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए अनुसंधान को बढ़ावा देना, स्टार्टअप्स का समर्थन करना और इस क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहित करना चाहिए।

लागत प्रबंधन और परिचालन दक्षता

बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की छंटनी किए बिना लागत में सुधार करना कठिन समय में कर्मचारियों के मनोबल को बनाए रखता है। ऑटोमेशन से संचालन को और अधिक सुचारू बनाया जा सकता है। दीपक सुझाव देते हैं कि आंतरिक परिचालन लागत को कम करने के लिए एआई और स्वचालन का उपयोग करें। ग्राहक अनुबंधों को फिर से नेगोशिएट करें और लचीले, किफायती मूल्य मॉडल पेश करें।

कार्यबल की अपस्किलिंग और रिस्किलिंग

कर्मचारियों को नई तकनीकों में प्रशिक्षित करना उन्हें बाजार की बदलती मांगों के अनुरूप बनाता है। दीपक कहते हैं कि एआई, मशीन लर्निंग और डेटा साइंस में प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए शैक्षिक प्लेटफार्मों के साथ साझेदारी करें। कर्मचारियों को लेगेसी या बीपीओ भूमिकाओं से विशेषज्ञ तकनीकी पदों में स्थानांतरित करें।

नवाचार और अनुसंधान एवं विकास

स्वामित्व वाले टूल, प्लेटफॉर्म या एआई-आधारित उत्पाद विकसित करना कंपनियों को प्रतिस्पर्धियों से अलग करता है और उन्हें सामान्यीकृत सेवाओं से आगे बढ़ने में सहायता करता है। एआई, ऑटोमेशन और साइबर सुरक्षा में अनुसंधान एवं विकास के लिए बजट आवंटित करने की आवश्यकता है।

रणनीतिक साझेदारी और सहयोग

स्टार्टअप्स या वैश्विक कंपनियों के साथ साझेदारी करने से नवीनतम तकनीकों, प्रतिभाओं और बाजारों तक पहुंच मिलती है। सेवा प्रस्तावों को बढ़ाने के लिए एआई या साइबर सुरक्षा स्टार्टअप्स के साथ सहयोग करें।

ग्राहक-केंद्रित दृष्टिकोण

दीपक शर्मा कहते हैं कि ग्राहकों की आवश्यकताओं के अनुसार समाधान तैयार करना सबसे अहम होता है। यह मंदी के दौरान कारोबार को मजबूत बनाए रखने में मददगार होता है।

सरकारी नीतियों की वकालत

सरकारी समर्थन जैसे टैक्स में छूट, फंडिंग या डिजिटल पहल से परिचालन के लिए अधिक अनुकूल वातावरण तैयार होता है। दीपक शर्मा मानते हैं कि इसके लिए जरूरी है कि डिजिटल अवसंरचना या साइबर सुरक्षा को बढ़ावा देने वाले सरकारी कार्यक्रमों के साथ संरेखित करें।