ईरान-इजरायल जंग: भारत के पास कितने दिनों का कोयला भंडार; क्या कहते हैं आंकड़े?
पश्चिम एशिया में तनाव और गर्मी की संभावनाओं के बीच भारत के लिए राहत की खबर है। देश का कुल ...और पढ़ें
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(यह तस्वीर AI से बनाई गई है)

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जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ी चिंताओं और इस साल सामान्य से अधिक गर्मी पड़ने की संभावनाओं के बीच भारत के लिए राहत की खबर है।
देश में कोयले का कुल भंडार बढ़कर करीब 21 करोड़ टन तक पहुंच गया है, जो मौजूदा खपत दर के हिसाब से लगभग 88 दिनों की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है।

कितने दिन का कोयला शेष?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में कोयले का उत्पादन और आपूर्ति, दोनों ही खपत से अधिक बने हुए हैं। इसी कारण तापीय बिजलीघरों और खदानों में कोयले का रिकॉर्ड स्तर का भंडार जमा हो गया है।
कोयला मंत्रालय के मुताबिक खदानों पर स्थित पिटहेड स्टॉक में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। 1 अप्रैल 2025 को कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) की खदानों पर कोयले का भंडार 10.68 करोड़ टन था, जो 9 मार्च 2026 तक बढ़कर 12.14 करोड़ टन हो गया था।

क्या कहते हैं आंकड़े?
इसके अलावा सिंगरेनी कोलियरीज कंपनी लि. की खदानों में लगभग 61 लाख टन. कैप्टिव और वाणिज्यिक खदानों में 1.51 करोड़ टन तथा करीब 1.4 करोड़ टन कोयला परिवहन के दौरान मौजूद है।
इस तरह खदानों के स्तर पर कुल कोयला भंडार पहली बार 156.58 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया है। यह भंडार बिजलीघरों में उपलब्ध कोयले के अतिरिक्त है।
9 मार्च 2026 तक देश के तापीय बिजलीघरों में लगभग 5.41 करोड़ टन कोयला मौजूद था, जो मौजूदा खपत दर के अनुसार करीब 24 दिनों की बिजली उत्पादन जरूरतों के लिए पर्याप्त है।
कोयला मंत्रालय ने क्या कहा?
कोयला मंत्रालय के अनुसार देश में उत्पादन का मौजूदा स्तर बनाए रखा गया है ताकि उपभोक्ताओं की मांग के अनुसार आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। इस प्रक्रिया में रेल मंत्रालय के सहयोग से कोयले की ढुलाई भी लगातार जारी है।
मंत्रालय का कहना है कि नीतिगत सहयोग, नियमित निगरानी और विभिन्न हितधारकों के साथ समन्वय के माध्यम से एक स्थिर और प्रदर्शन आधारित व्यवस्था तैयार की जा रही है, जिससे ऊर्जा क्षेत्र के प्रमुख उपभोक्ताओं को निर्बाध आपूर्ति मिल सके और देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सके।
