रूस-सऊदी पर हमलों से तेल आपूर्ति चालू रखने की चुनौती, महंगे क्रूड से साथ ढुलाई की लागत भी बढ़ी
रूस और सऊदी अरब पर हुए हालिया हमलों से भारत की कच्चे तेल आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है, जिससे उपलब्धता और ढुलाई लागत दोनों में वृद्धि हुई है।

रूस-सऊदी पर हमलों से तेल आपूर्ति चालू रखने की चुनौती।
HighLights
रूस-सऊदी हमलों से भारत की कच्चे तेल आपूर्ति बाधित हुई।
ढुलाई लागत और बीमा प्रीमियम में भारी वृद्धि हुई।
भारत का तेल आयात बिल 48% बढ़कर 74.8 अरब डॉलर।
जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन और रूस की प्रमुख रिफाइनरियों पर हाल के हमलों ने भारत की कच्चे तेल आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है। हाल के महीनों में दोनों देशों से संयुक्त तौर पर भारत अपनी कुल तेल आयात का 45-50 फीसद या इससे भी ज्यादा आयात करता रहा है।
सऊदी अरब में 10-11 सितंबर को इराक से आए ड्रोन हमलों में पाइपलाइन के पंपिंग स्टेशनों को नुकसान पहुंचा, जिसके बाद सऊदी ने पाइपलाइन एहतियातन बंद कर दी। जबकि यूक्रेन ने 19-20 सितंबर को एक साथ हजारों ड्रोन से हमला करके रूस की मॉस्को रिफाइनरी में प्रोसेसिंग यूनिट्स को नुकसान पहुंचाया है।
इसके बाद रूस ने अपने सभी तेल प्रतिष्ठानों व बंदरगाहों की समीक्षा शुरू की है जिससे माना जा रहा है कि तात्कालिक तौर पर उसका तेल कारोबार सीमिति होगा। अमेरिकी प्रतिबंधों की तलवार वैसे ही रूस से भारत के तेल सौदे पर लटकी हुई है, यूक्रेनी हमले के बाद अनिश्चितता और गहरी हो गई है।
तेल उद्योग के जानकारों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के बाधित होने के बाद सऊदी अरब पाइपलाइन के जरिए ही पुराने सौदों के मुताबिक तेल की बिक्री कर रहा था। ताजी घटना यह है कि सऊदी अरामको ने भारतीय रिफाइनरियों को टर्म सप्लाई फिलहाल रोक दी है। युद्ध शुरू होने के बाद सऊदी भारत की कुल जरूरत का करीब नौ प्रतिशत तेल दे रहा था।
भारत को तेल आपूर्ति पर जारी अनिश्चितता के साफ होने में कुछ हफ्तों का समय लग सकता है क्योंकि सऊदी अरब के क्षतिग्रस्त प्रतिष्ठानों को ठीक करने में चार से छह हफ्ते लग सकते हैं।
सऊदी अरब की तरफ ही रूस की रिफाइनिंग क्षमता घटी है और निर्यात उपलब्धता कम हुई है। सितंबर में भारत का रूसी तेल आयात अगस्त के मुकाबले कम रहने का अनुमान है। रूस अभी भी सबसे बड़ा सप्लायर है, लेकिन लोडिंग घटी है।
रिफाइनर अब उपलब्धता को कीमत से ज्यादा चिंता का विषय बता रहे हैं। वैकल्पिक सप्लाई यूएई, इराक, पश्चिम अफ्रीका और वेनेजुएला जैसे स्रोतों से उपलब्ध है, लेकिन महंगी पड़ रही है। पश्चिम एशिया हालात के फिर से बिगड़ने की संभावना को देखते हुए तेल आयातक कंपनियों को ढुलाई के लिए जहाज मिलने में दिक्कत हो रही है, जो जहाज उपलब्ध हैं, उनके भाड़ा व बीमा प्रीमियम बढ़ गए हैं।
अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल टैंकरों का भारत आने वाले रूटों पर भाड़ा पश्चिम एशिया के तनाव के बहुत बढ़ चुका है। अरब खाड़ी से कच्चे तेल की ढुलाई करने वाले विशालकाय जहाजों (वीएलसीसी-एक बार में 20 लाख बैरल ढुलाई की क्षमता) का किराया 14 सितंबर को 61-62 डॉलर प्रति टन पहुंच गया था जो पिछले महीने अगस्त (34.6 डॉलर) के मुकाबले करीब दो गुना और फरवरी (10.6 डॉलर) के मुकाबले छह गुणा ज्यादा हो चुका है।
सऊदी के रास तनुरा पोर्ट से फ्रेट अगस्त में 4.34 डालर प्रति बैरल रही जबकि फरवरी में 0.85 डॉलर था। इसी तरह से रूस से तेल ढुलाई का किराया भी हाल के महीनों में 10-15 फीसद तक बढ़ी है। उद्योग सूत्रों के मुताबिक, फरवरी, 2026 में यह एक डॉलर प्रति बैरल से भी कम था जो अब 4.50 डॉलर प्रति बैरल तक जा चुका है।
फिलहाल भारतीय रिफाइनरियों के पास पर्याप्त स्टाक है और हाल के महीनों में कई स्रोतों से तेल खरीदने की भारत की नीति भी मददगार साबित हो रही है लेकिन लगातार बढ़ती लागत और प्रमुख आपूर्तिकर्ता देशों की क्षमता प्रभावित होने से नये विक्रेताओं से आपूर्ति बढ़ानी होगी।
सरकारी डाटा के मुताबिक, मार्च-अगस्त अवधि में ही 31 देशों से तेल व गैस की खरीद की गई। भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत जून में औसतन 83.22 डॉलर प्रति बैरल, जुलाई में 82.04 डॉलर और अगस्त में 90.19 डॉलर रही। सितंबर में यह तेजी से बढ़कर कई दिनों 111 डॉलर से ऊपर और कुछ समय 131 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।
अप्रैल-अगस्त में भारत ने 10.07 करोड़ टन कच्चा तेल आयात किया, जो पिछले साल की समान अवधि के 10.1 करोड़ टन के लगभग बराबर है। मात्रा में बड़ा अंतर नहीं है, लेकिन आयात बिल इस दौरान 48 प्रतिशत बढ़कर 74.8 अरब डॉलर हो गया है।
स्थितियां इसी तरह गंभीर होती रही तो देर सबेर इसका असर उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है। हालांकि अगले पांच छह महीनों में उत्तर प्रदेश समेत कुछ राज्यों में होने वाले चुनावों को देखते हुए तत्काल इसकी संभावना कम है।
