अमेरिकी टैरिफ को टक्कर देना है तो लॉजिस्टिक लागत घटानी होगी: प्रो. मनोज तिवारी
बेशक बीते कुछ सालों में परिवहन लागत को 16 से घटाकर 7.8 प्रतिशत पर लाना बड़ी उपलब्धि है, लेकिन सिर्फ ...और पढ़ें

अमेरिकी टैरिफ को टक्कर देना है तो लॉजिस्टिक लागत घटानी होगी।
HighLights
भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा हेतु परिवहन लागत 6% तक घटानी होगी।
डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, मल्टी-मॉडल पार्क लॉजिस्टिक्स सुधारेंगे।
परिवहन क्षेत्र में 2035 तक 1.5 करोड़ नए रोजगार सृजित होंगे।
ओमप्रकाश तिवारी। टैरिफ को लेकर आए दिन अमेरिका की धमकी का जवाब तो भारत ने इस बार खुलकर दिया है, लेकिन जुबानी जंग से यह मोर्चा फतह नहीं हो सकता है। इसके लिए जो मैदानी तैयारियां जरूरी हैं, उनमें सबसे अहम है परिवहन लागत को कम करना। इस दिशा में चल रही कोशिशों की एक बड़ी झलक तब दिखाई दी जब सितंबर के पहले हफ्ते में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वडोदरा में दिल्ली से मुंबई को जोड़ने वाले डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (माल ढुलाई गलियारा) के तीन महत्वपूर्ण खंडों का लोकार्पण किया और भारत में परिवहन (लॉजिस्टिक) क्षेत्र में आ रहे बदलाव को मील का पत्थर बताया।
यह देश में मल्टी-मॉडल कनेक्टिविटी (सड़क, रेल, विमानन और जलमार्ग) को एकीकृत करके लागत कम करने और विकास कार्यों को गति देने का काम कर रही गतिशक्ति परियोजना का हिस्सा है। परियोजना की 'गति' पर नजर रखने व आने वाले समय में इसकी उपयोगिता के आकलन, प्रबंधन और निगरानी की जिम्मेदारी भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) मुंबई की है। नोडल एजेंसी के संयोजक के रूप में आईआईएम मुंबई के संस्थापक निदेशक प्रो. मनोज कुमार तिवारी ने हाल ही में इस पर रिपोर्ट ‘फ्यूचर टैलेंट रिक्वायरमेंट्स इन लाजिस्टिक्स–ए-विजन 2047’ तैयार की है। वह कहते हैं कि अमेरिका के टैरिफ को टक्कर देने और सभी विकसित देशों की बराबरी करने के लिए हमें परिवहन लागत छह प्रतिशत तक घटानी ही होगी।
बेशक बीते कुछ सालों में परिवहन लागत को 16 से घटाकर 7.8 प्रतिशत पर लाना बड़ी उपलब्धि है, लेकिन सिर्फ इससे बात नहीं बनेगी। इसके लिए 35 मल्टी मॉडल पार्क पर तेजी से काम करना होगा। प्रो. तिवारी ‘विकसित भारत@2047’ विजन के लिए पश्चिम क्षेत्रीय समिति के अध्यक्ष भी हैं। मैन्युफैक्चरिंग सिस्टम (विनिर्माण प्रणालियों) और सप्लाई चेन (आपूर्ति शृंखला) का लंबा अनुभव रखने वाले प्रोफेसर तिवारी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी), खड़गपुर में प्रोफेसर एवं बोर्ड आफ गवर्नर्स के रूप में रहे हैं। प्रस्तुत है भारत की बदलती परिवहन व्यवस्था पर दैनिक जागरण के महाराष्ट्र ब्यूरो प्रमुख ओमप्रकाश तिवारी की प्रो. मनोज कुमार तिवारी से हुई बातचीत के प्रमुख अंशः
देश में 2800 किमी. लंबा डेडिकेटेड फ्रेट कारिडोर पूरी तरह चालू हो गया। भारतीय अर्थव्यवस्था पर कितना असरकारक होगा?
- देखिए, इन दो डेडीकेटेड फ्रेट कारिडोर (डीएफसी) का तो असर होगा ही। ऐसे सात डीएफसी तैयार होंगे, जिनके माध्यम से माल ढुलाई के लिए पूरे देश का एक छोर दूसरे छोर से जुड़ जाएगा। तब भारत की अर्थव्यवस्था में असली गति आएगी। इस व्यवस्था को और सुदृढ़ करने के लिए ही सरकार ने 35 ‘मल्टी मॉडल पार्क’ बनाने की योजना भी बनाई है।
परिवहन के क्षेत्र में हमारी समस्या क्या है? हम कहां पर पिछड़ रहे हैं?
- भारत की समस्या अभी यह है कि हमारा करीब 65 प्रतिशत ट्रैफिक सड़क मार्ग पर निर्भर है। उससे बहुत कम, यानी 25-30 प्रतिशत ही रेल पर निर्भर है। उससे भी बहुत कम है शिपिंग (जलमार्ग) पर। ... और हवाई मार्ग से तो ना के बराबर ही हैं अभी, जबकि सड़क मार्ग से परिवहन व्यय बहुत महंगा, यानी 3.9 रुपए प्रति टन प्रति किमी. पड़ता है। रेलमार्ग से परिवहन व्यय इसका आधा हो जाता है। जलमार्ग से तो इससे भी कम हो जाता है, जबकि हवाई मार्ग से तो 18 रुपए प्रति टन प्रति किमी. पड़ता है। इसी व्यय को कम करने के लिए देश में डेडिकेटेड फ्रेट कारिडोर बनाए जा रहे हैं। इंटीग्रेटेड फ्रेट कारिडोर बनाए जा रहे हैं। ये कारिडोर सीधे माल लेकर भागने के लिए ही होंगे। इससे माल ढुलाई सस्ती भी होगी और माल कम समय में अपने गंतव्य तक पहुंच भी सकेगा।
माल ढुलाई की कीमत का कितना असर होता है अर्थव्यवस्था पर?
- बहुत असर होता है। खासतौर से अन्य देशों के साथ प्रतियोगी बने रहने में और अपने माल की कीमत को उनके समान रखने में यह कीमत बहुत बड़ी भूमिका निभाती है। कुछ वर्ष पहले तक देश की परिवहन लागत हमारी जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) के 14 प्रतिशत तक हुआ करती थी, जो अन्य देशों के मुकाबले बहुत ज्यादा थी। सरकार इसे घटाकर 7.8 प्रतिशत तक लाने में सफल रही है। जिस दिन यह छह प्रतिशत के आसपास आ जाएगी, हम लोग दुनिया के अन्य देशों के बराबर आ जाएंगे। तब हमारे लिए अन्य देशों से प्रतियोगिता करना आसान हो जाएगा। हमारा घरेलू खर्च कम होगा और हम निर्यात में अन्य देशों की बराबरी कर सकेंगे। इससे हमारी अर्थव्यवस्था को बड़ा लाभ होगा और एक अनुमान के मुताबिक करीब तीन लाख करोड़ की बचत की जा सकती है।
आपने मल्टी मॉडल पार्क की बात कही थी, यह क्या है?
- हां, यह मल्टी मॉडल पार्क एक गेम-चेंजिंग आइडिया है। हम इसके कारण ही अपनी परिवहन लागत छह से सात प्रतिशत तक लाने में कामयाब हो सकते हैं। सरकार ऐसे 35 मल्टी मॉडल पार्क बनाने जा रही है, जहां सड़क मार्ग और रेलमार्गों को आपस में जोड़ने की व्यवस्था होगी। इससे अधिक से अधिक माल ढुलाई रेलमार्ग से करने का रास्ता साफ होगा। छोटे कस्बों एवं छोटे नगरों से सड़क मार्ग से आने वाला माल आसानी से कम समय में रेलमार्ग पर स्थानांतरित किया जा सकेगा। फिर रेलमार्ग से उन्हें जलमार्ग या एयरपोर्ट्स तक भी भेजा जा सकेगा। इससे देश में माल ढुलाई की कीमत और समय दोनों कम होंगे। इस पूरी व्यवस्था की देखरेख डिजिटल माध्यम से करने की योजना है, ताकि एक स्थान से चलने वाले माल की निगरानी भी की जा सके और उसके लिए आगे के परिवहन का इंतजाम भी कम से कम समय में किया जा सके। देश में अभी ऐसे 35 मल्टी मॉडल पार्क बनाने की योजना है। भविष्य में और डेडिकेटेड फ्रेट कारिडोर बनने पर इनकी संख्या बढ़ाई भी जा सकती है।
इन 35 मल्टीमॉडल पार्कों एवं सात डेडिकेटेड फ्रेट कारिडोरों को कैसे जोड़ा जाएगा?
- सरकार इस कार्य में अपने इलेक्ट्रानिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत काम करने वाले एक राष्ट्रीय संस्थान भास्कराचार्य नेशनल इंस्टीट्यूट फार स्पेस एप्लीकेशंस एंड जियो-इंफार्मेटिक्स (बीआइएसएजी-एन) की मदद ले रही है। अहमदाबाद स्थित यह संस्थान मुख्य रूप से सैटेलाइट कम्युनिकेशन (उपग्रह संचार), जियो-इंफार्मेटिक्स और अंतरिक्ष आधारित मानचित्र प्रणालियों (जीआइएस) पर काम करता है। इसका उपयोग सरकार की विभिन्न योजनाओं, डिजिटल मैपिंग और ई-गवर्नेंस सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है। इसके द्वारा पूरे देश का अच्छा मैपिंग कर लिया गया है कि अगर यहां से रास्ता बनाना है तो आपको कितना टाइम लगेगा, कहां पहाड़ है, कहां नदी है, कहां अंडरग्राउंड बनाना है, कहां मूल मार्ग से हटकर बगल से ले जाना है। इससे सरकार को अपनी परिवहन जरूरतों के हिसाब से योजनाएं बनाने में काफी मदद मिल रही है।
करीब डेढ़-दो दशक पहले कोंकण रेलवे ने परिवहन के लिए रोल आन–रोल आफ (रो-रो सर्विस) शुरू की थी। इसमें भरे हुए ट्रकों को रेल की खुली बोगियों पर चढ़ा दिया जाता है। इसमें ट्रक से सामान उतारने-चढ़ाने का खर्च और समय दोनों बचता है। क्या ये व्यवस्था देश में दूसरे स्थानों पर लाई जा सकती है?
- हां, इस प्रकार की व्यवस्था भी काफी मददगार सिद्ध हो सकती है। गुजरात में इसी प्रकार रो-रो सर्विस का इस्तेमाल समुद्री मार्ग से किया जा रहा है। यह सेवा सौराष्ट्र के भावनगर जिले में स्थित घोघा टर्मिनल और सूरत के हजीरा टर्मिनल के बीच संचालित होती है। सड़क मार्ग से सूरत से भावनगर की दूरी लगभग 360 से 370 किलोमीटर है, जिसे तय करने में 10 से 12 घंटे का समय लगता है। इस समुद्री मार्ग (लगभग 60-90 किमी) के जरिए यह सफर महज चार घंटे में पूरा हो जाता है। इस मार्ग पर मुख्य रूप से 'वायेज एक्सप्रेस' जैसे आधुनिक जहाजों का संचालन किया जाता है। इस फेरी सेवा में यात्रियों के साथ-साथ कार, बाइक, बस और बड़े ट्रक जैसे वाहनों को भी एक छोर से दूसरे छोर तक ले जाया जाता है।
प्रधानमंत्री अक्सर जलमार्ग से परिवहन को बढ़ावा देने की बात करते रहे हैं। इस लक्ष्य में कितनी प्रगति हो रही है ?
- जी। प्रधानमंत्री का फोकस रहा है ‘भारतमाला’ और ‘सागरमाला’ योजना पर। अभी मैंने भावनगर और सूरत का एक उदाहरण दिया। इसी प्रकार एक समय चेन्नई तक कोयला पहुंचाने के लिए सिर्फ रेलमार्ग ही एक सहारा हुआ करता था। अब ओडिशा के पारादीप बंदरगाह से पानी के जहाजों पर लदकर कोयला चेन्नई जा रहा है। पश्चिम-बंगाल के हल्दिया से बनारस तक तो साल के कुछ माह गंगा नदी के जरिए भी माल ढुलाई हो रही है। बीते 12 वर्षों में देश में बंदरगाहों की संख्या ढाई गुना बढ़ गई है। इन सभी का इस्तेमाल धीरे-धीरे जलमार्ग से परिवहन को बढ़ावा देने के लिए किया जाएगा।
परिवहन क्षेत्र में हो रहे इन कामों से कितना रोजगार पैदा होने की संभावना बन रही है ?
- इस संबंध में हमारे संस्थान ने एक रिपोर्ट तैयार करके सरकार को दी है। 'फ्यूचर टैलेंट रिक्वायरमेंट इन लाजिस्टिक्स सेक्टर' शीर्षक से तैयार इस रिपोर्ट के अनुसार 2035 तक कम से कम 1.5 करोड़ के आसपास रोजगार पैदा होगा। अभी भी इस क्षेत्र में करीब दो करोड़ लोग काम करते हैं। नए कारिडोर, रो-रो सर्विसेज, मल्टीमॉडल पार्क बन रहे हैं, इन्हें नई टेक्नोलाजीज से जोड़ा जा रहा है, हर जगह रोबोटाइजेशन हो रहा है। तो इसमें मेहनत-मजदूरी से लेकर तकनीकी, एआइ, मशीन लर्निंग, रोबोटिक्स, वेयर हाउसेज जैसे सभी क्षेत्रों में रोजगार पैदा हो रहे हैं।
भारत की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है। इस क्षेत्र पर परिवहन व्यवस्था के आधुनिकीकरण का क्या प्रभाव पड़ता देख रहे हैं?
- बिल्कुल दिखाई दे रहा है। क्या कभी हम कल्पना कर सकते थे कि कश्मीर का सेब कन्याकुमारी तक या देश के दूसरे हिस्सों में रेल के द्वारा बिना खराब हुए पहुंचाया जा सकेगा। आज वह जा रहा है। नासिक से प्याज के कंटेनर्स देश के दूसरे हिस्सों में पहले से ज्यादा तेज गति से बिना खराब हुए पहुंच रहे हैं। डेडिकेटेड फ्रेट कारिडोरों के पूरी गति से चालू हो जाने के बाद वातानुकूलित कंटेनर्स की भी व्यवस्था की जा सकती है, जिनमें पांच से छह डिग्री सेल्सियस में रखकर जल्दी खराब होने वाले फल या सब्जियां भी दूर-दराज के शहरों तक भेजी जा सकेंगी। इसका सीधा लाभ किसानों और हमारी कृषि व्यवस्था को होगा। यह लाभ दिखना शुरू भी हो गया है। हमारे ग्रीन प्रोडक्ट्स, जैसे फलों और सब्जियों का निर्यात पिछले 10 वर्षों में खाड़ी के देशो में काफी बढ़ा है। महाराष्ट्र के अच्छी गुणवत्ता वाले अल्फांसो, उत्तर प्रदेश के लंगड़ा-दशहरी आम सब निर्यात हो रहे हैं। किसानों को इसके अच्छे दाम मिल रहे हैं।
इस व्यवस्था में और क्या सुधार हो रहे हैं ?
- लाजिस्टिक्स क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ), मशीन लर्निंग का उपयोग किस तरह से बढ़ाया जा सकता है, इस पर बहुत काम हो रहा है। उदाहरण के लिए आप रोजाना खाद्य सामग्रियों के सप्लायर हैं, यानी, दाल, चावल, कोल्ड ड्रिंक्स, मसाले आदि। आपके बल्क में सामान मंगवाते हैं और उसे वेयर हाउस में रखते हैं। अब आपके पास अगर पांच साल का डाटा है, तो उससे आप यह पता लगा सकते हैं कि किस महीने में किस सामग्री की कितनी खपत है? आने वाले समय में कितनी खपत होगी? उसके आधार पर आप आसानी से प्लान कर लेंगे कि हम वेयर हाउस में कहां रखवाएं, कितना रखवाएं, कितनी गाड़ी लगवाएं। बड़ी गाड़ी लगवाएं या छोटी गाड़ी लगवाएं। इतनी प्लानिंग होने पर चीजों की बर्बादी तो रोकी ही जा सकती है, उनकी कीमतों पर भी नियंत्रण रखा जा सकता है। बंदरगाहों पर इस तरह का नियंत्रण बहुत मायने रखता है। इससे जहाजों का टर्न-अराउंड टाइम बचता है और बंदरगाहों पर ट्रकों की भीड़भाड़ भी कम होती है। बस इसमें कस्टम और बंदरगाहों पर काम करने वाली अन्य सरकारी एजेंसियों को भी नई व्यवस्था के अनुसार अपने को ढालना होगा।
इन दिनों जेन-जी की बहुत चर्चा हो रही है। इस नई पीढ़ी को कितना लाभ होगा ये नई व्यवस्था लागू होने से?
- मैंने पहले ही बताया आपको कि देश की लाजिस्टिक्स में सुधार होने से करीब डेढ़ करोड़ नए रोजगार पैदा होने की संभावना है। मैं एक उदाहरण देता हूं आपको। मेरा एक शिष्य है बेंगलुरू में। उसके पास ना तो ट्रक है ना ही एक ड्राइवर, लेकिन वह पूरे देश में डेढ़ लाख से ज्यादा ट्रकों का संचालन करके लाखों लोगों को रोजगार दे रहा है। इनमें पढ़े-लिखे बच्चों से लेकर ट्रक ड्राइवर्स तक शामिल हैं
