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कोयले पर निर्भर आर्थिक विकास: भारत में बढ़ी बिजली की मांग, बाहरी प्रदूषण और शहरी मौतें

Published: Mon, 28 Sep 2026 11:42 PM (IST)

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन के अनुसार, 2000 से 2020 के बीच भारत की तीव्र आर्थिक वृद्धि ने बिजली की मांग को चार गुना बढ़ा दिया।

कोयले पर निर्भर आर्थिक विकास। (यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है)

कोयले पर निर्भर आर्थिक विकास। (यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है)

HighLights

  1. भारत की बिजली मांग 2000-2020 के बीच चार गुना बढ़ी।

  2. कोयले से पूरी हुई 75% से अधिक बिजली की मांग।

  3. पीएम2.5 प्रदूषण और शहरी मौतों में खतरनाक वृद्धि दर्ज।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। विकास और पर्यावरण के बीच के संघर्ष को गहराई से बयां करते ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक नए अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2000 से 2020 के बीच भारत की तेज आर्थिक वृद्धि ने देश में बिजली की मांग को लगभग चार गुना बढ़ा दिया।

इस बढ़ी हुई मांग का तीन-चौथाई से अधिक हिस्सा कोयले के उपयोग से पूरा किया गया, जिसके परिणामस्वरूप हवा में जहरीले पीएम2.5 प्रदूषण का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ गया और शहरी क्षेत्रों में होने वाली मौतें भी तेजी से बढ़ीं।

प्रसिद्ध शोध पत्रिका 'नेचर सिटीज' में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, भारत की इस ऊर्जा और आर्थिक परिवर्तन प्रक्रिया ने सार्वजनिक स्वास्थ्य पर मिले-जुले प्रभाव डाले हैं। एक तरफ जहां घरों के भीतर प्रदूषण का खतरा कम हुआ है, वहीं दूसरी तरफ बाहरी हवा के लगातार जहरीले होने से लोगों का जोखिम कई गुना बढ़ गया।

अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के भौतिकी विभाग के वासुदेव स्वाइन ने कहा, "असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि जिन ऊर्जा स्रोतों के सहारे ये आर्थिक लाभ मिल रहे हैं, उन्हें स्वयं अधिक स्वच्छ तरीके से उत्पादित किया जाए।"

बिजली संयंत्रों की संख्या में वृद्धि

आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2000 और 2020 के बीच भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी लगभग 600-700 डालर (लगभग 57-67 हजार रुपये) से बढ़कर दो हजार डालर से अधिक हो गई।

इसी अवधि में बिजली की मांग लगभग 450 टेरावाट-घंटे से उछलकर लगभग दो हजार टेरावाट-घंटे तक पहुंच गई - प्रति व्यक्ति जीडीपी में एक प्रतिशत की बढ़ोतरी बिजली की मांग में लगभग 1.14 प्रतिशत की वृद्धि से जुड़ी थी।

इस मांग को पूरा करने के लिए कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों की संख्या में भारी इजाफा हुआ। जहां 2000 से पहले 71 संयंत्र चालू किए गए थे, वहीं 2001 से 2024 के बीच 182 नए संयंत्र स्थापित किए गए।

मैदानी इलाकों पर बुरा असर

इस कोयला-आधारित विस्तार का सबसे बुरा असर उत्तर और पूर्वी भारत के साथ-साथ गंगा के मैदानी इलाकों पर पड़ा है, जहां घनी आबादी वाले इलाकों में कोयले से चलने वाले बड़े पावर प्लांट और उनसे जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है।

अध्ययन के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2000 में पीएम2.5 के संपर्क में आने से शहरी क्षेत्रों में लगभग छह लाख 70 हजार मौतें हुईं, जो 2020 में बढ़कर लगभग आठ लाख 70 हजार हो गईं - यानी इसमें लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

केवल बिजली क्षेत्र के उत्सर्जन से होने वाली शहरी मौतें वर्ष 2000 के लगभग 15 हजार से बढ़कर 2020 तक लगभग तीन लाख के डरावने आंकड़े पर पहुंच गईं।

(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)