विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

50 साल पीछे पहुंची भारत की बर्थ रेट, 2023 में पैदा हुए 2.32 करोड़ बच्चे; UP-बिहार को छोड़ TFR यूरोप जैसा

Published: Mon, 21 Sep 2026 11:36 PM (IST)

भारत में जन्म दर 50 साल पहले के स्तर पर पहुंच गई है, 2023 में 2.32 करोड़ बच्चे पैदा हुए, जो 2001 से 20% कम है।

50 साल पीछे पहुंची भारत की बर्थ रेट।

50 साल पीछे पहुंची भारत की बर्थ रेट।

HighLights

  1. भारत में जन्म दर 50 साल पहले के स्तर पर पहुंच गई।

  2. 2023 में 2.32 करोड़ बच्चे पैदा हुए, 2001 से 20% कम।

  3. यूपी-बिहार को छोड़कर TFR उत्तरी यूरोप और अमेरिका के समान।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत की आबादी से जुड़ी तस्वीर तेजी से बदल रही है। देश में हर साल जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या अब करीब 50 साल पहले के स्तर पर पहुंच गई है।

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के हालिया पेपर के मुताबिक 2001 में देश में सालाना करीब 2.93 करोड़ बच्चों का जन्म हुआ था। 2023 में यह संख्या घटकर करीब 2.32 करोड़ रह गई, यानी करीब 20 प्रतिशत तक एक-पांचवां हिस्सा कम हो गया। यह संख्या लगभग उतनी ही है, जितनी 1974 में थी।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि देश की कुल आबादी घटने लगी है। भारत की अपेक्षाकृत युवा आबादी के कारण जनसंख्या में अभी जनसंख्या जड़त्व बना हुआ है। लेकिन कम प्रजनन दर का असर आने वाले वर्षों में कामकाजी आबादी, बुजुर्गों की संख्या और देखभाल की जरूरतों पर दिखाई देगा।

यूपी-बिहार को छोड़ तस्वीर काफी बदली

आर्थिक सलाहकार परिषद के पेपर के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) 1.9 है। बिहार और उत्तर प्रदेश को अलग कर दें तो यह 1.6 रह जाती है, जो उत्तरी यूरोप के 1.5 और अमेरिका के 1.6 के करीब है। दक्षिण के कई राज्यों में स्थिति और नीचे है। केरल और तमिलनाडु की टीएफआर 1.3, आंध्र प्रदेश की 1.4, तेलंगाना और कर्नाटक की 1.5 है। पश्चिम बंगाल में भी यह 1.3 है। दिल्ली में यह 1.2 है।

इन राज्यों में प्रजनन दर दो दशक से अधिक समय से प्रतिस्थापन स्तर से नीचे बनी हुई है। आर्थिक सलाहकार परिषद के मुताबिक ऐसे राज्यों में अब बढ़ती उम्र, घटती युवा आबादी, कामगारों की उपलब्धता, पलायन और बुजुर्गों की देखभाल जैसी चुनौतियां ज्यादा महत्वपूर्ण होती जा रही हैं।

हालांकि, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 में देश की टीएफआर 2.0 बताई गई है। यह भी 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है।

पापुलेशन फाउंडेशन आफ इंडिया (पीएफआइ) ने बदलती स्थिति को देखते हुए जनसंख्या नियंत्रण की पुरानी सोच से आगे बढ़ने की सलाह दी है। संगठन का कहना है कि परिवार नियोजन को आबादी घटाने के उपाय के बजाय प्रजनन संबंधी आजादी, बच्चों के जन्म में अंतर, मातृ-शिशु स्वास्थ्य और गुणवत्तापूर्ण सेवाओं से जोड़ना चाहिए।

पीएफआइ की कार्यकारी निदेशक पूनम मुतरेजा के अनुसार राष्ट्रीय औसत के पीछे राज्यों, जिलों, ग्रामीण-शहरी आबादी और आय व शिक्षा के स्तर में मौजूद बड़े अंतर छिप जाते हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य व पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों की युवा आबादी की जरूरतें केरल, तमिलनाडु, पंजाब, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश से अलग हैं।

आर्थिक सलाहकार परिषद ने कम प्रजनन दर वाले राज्यों में नसबंदी से जुड़े प्रोत्साहन भुगतान खत्म करने और 'दो-बच्चे के नियम' से जुड़े अयोग्यता प्रविधानों की समीक्षा की सिफारिश की है।

(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)