इंदौर/मंदसौर [किशोर ग्वाला]। गिल्ली-डंडा को भारतीय परंपरागत ग्रामीण खेल माना जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में बनने वाले गिल्ली-डंडा में कुछ ऐसी खास बात है कि अब यह भारत की सीमाएं लांघकर दुबई व सऊदी अरब तक जा पहुंचा है। दरअसल, दुबई में रह रहे भारतीय, जिन्होंने बचपन में गिल्ली-डंडा खेल का स्वाभाविक आनंद लिया होगा, वे अब अपनी नई पीढ़ी को इस खेल से परिचित करवाना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने मंदसौर के कलाकार को ऑर्डर देकर 100 जोड़ी गिल्ली-डंडा दुबई मंगवाए हैं। दिलचस्प बात यह है कि दुबई के स्थानीय लोग भी इस खेल को कौतुहलपूर्वक पसंद कर रहे हैं।

गिल्ली-डंडा बनाने वाले कलाकार प्रेमचंद नोगिया ने बताया कि नौकरी या कारोबार के सिलसिले में दुबई व सऊदी अरब में बस गए मंदसौर क्षेत्र के कुछ परिवार बीते वर्ष मंदसौर का 11 जोड़ी गिल्ली-डंडा दुबई ले गए थे। वहां उन्होंने खाली समय में इसे खेलना शुरू किया और अपने बचपन की यादें ताजा कीं। इसी दौरान उन्हें लगा कि दुबई व सऊदी अरब के रंग-ढंग में पल रही नई पीढ़ी को भी भारतीय जनजीवन की जड़ों से जोड़ने के लिए गिल्ली-डंडा का खेल सिखाना चाहिए। इस पर 100 जोड़ गिल्ली-डंडों का ऑर्डर कर दिया। अब मंदसौर के गिल्ली-डंडा वहां पहुंचेंगे और दुबई व सऊदी अरब में खेले जाएंगे। नोगिया कहते हैं, ऑर्डर तो 1000 जोड़ी का मिलने वाला था, लेकिन कोरोना के कारण लोग सहम गए हैं, इसलिए अभी 100 जोड़ ही भेजना है।

देशभर में है मंदसौर के गिल्ली-डंडा की मांग

कलाकार राजेश नोगिया बताते हैं, मंदसौर में बबूल की मजबूत लकड़ी को करीने से तराशकर गिल्ली को ऐसा नुकीला और डंडे को इतना गोल व आकर्षक बनाया जाता है कि इन्हें देशभर में पसंद किया जाता है। कलाकार इन डंडों पर डिजाइन डालकर सुंदर भी बना देते हैं। ये दाम भी बहुत कम यानी एक जोड़ी का 25 से लेकर 50 रपये ही रखते हैं। आम या सागौन की लकड़ी के गिल्ली-डंडा 400 रपये जोड़ी तक में भी बिकते हैं। मंदसौर के कालाखेत क्षेत्र में निवासरत नोगिया परिवार सहित लगभग 15 परिवार गिल्ली-डंडा बनाने का कारोबार करते हैं। यहां के गिल्ली-डंडा महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान सहित दिल्ली व छत्तीसगढ़ के कई शहरों में भेजे जाते हैं।

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