इजरायलियों की जान बचाने में पहले भी आगे रहे हैं भारतीय, मुंबई में आतंकियों से हुआ था सामना
भारत और इजरायल के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में भले ही मजबूत हुए हों, लेकिन दोनों देशों के बीच संबंधों ...और पढ़ें

भारत और इजरायल के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में हुए मजबूत (फोटो- पीटीआई)
HighLights
हाइफा की लड़ाई से 26/11 तक सामने आई भारतीय बहादुरी की मिसाल
मुंबई में सांद्रा सैमुअल ने आतंकियों के बीच दो साल के मोशे की बचाई थी जान
जागरण न्यूज नेटवर्क, नई दिल्ली। दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान में को-पायलट से भिड़कर 174 यात्रियों की जान बचाने वाले भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मछार की बहादुरी की दुनियाभर में चर्चा है।
भारत और इजरायल के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में भले ही मजबूत हुए हों, लेकिन दोनों देशों के बीच संबंधों में ऐसे कई प्रसंग भी रहे हैं, जब भारतीयों ने इजरायली नागरिकों की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली।
इतिहास में ऐसे दो प्रमुख मौके खास तौर पर उल्लेखनीय हैं। पहला 1918 में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान हाइफा की लड़ाई का है और दूसरा 2008 के मुंबई आतंकी हमले का।
हाइफा में भारतीय सैनिकों की वीरता
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 23 सितंबर 1918 को हाइफा की लड़ाई में भारतीय सैनिकों ने ओटोमन साम्राज्य की सेना के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की थी।
इस अभियान में भारतीय रियासतों की लांसर रेजिमेंटों, खासकर जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद लांसर्स, की अहम भूमिका थी। 15वीं इंपीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड के भारतीय घुड़सवारों ने मशीनगनों से लैस ओटोमन और जर्मन ठिकानों पर भाले, तलवार और बरछियों के साथ हमला किया।
इस कार्रवाई का नेतृत्व मेजर दलपत सिंह ने किया, जो लड़ाई में शहीद हो गए। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत सैन्य सम्मान दिया गया। इस लड़ाई को सैन्य इतिहास के आखिरी बड़े सफल घुड़सवार हमलों में से एक माना जाता है।
भारतीय सैनिकों की कार्रवाई से हाइफा और एकर पर कब्जा करने में मदद मिली और ओटोमन की महत्वपूर्ण आपूर्ति लाइनों को नुकसान पहुंचा।
भारतीय सेना हर साल 23 सितंबर को हाइफा दिवस मनाकर इस लड़ाई में शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि देती है। हाइफा की लड़ाई प्रथम विश्वयुद्ध के सिनाई और फलस्तीन अभियान के अंतिम चरण में 19 से 25 सितंबर के बीच हुए मेगिडो अभियान का हिस्सा थी।
26/11 में आतंकियों के बीच बचाया मोशे कोइसके करीब 90 साल बाद मुंबई में एक भारतीय महिला ने आतंकियों के बीच एक इजरायली बच्चे की जान बचाकर बहादुरी की मिसाल पेश की।
26 नवंबर 2008 को लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने मुंबई में हमला किया था। दक्षिण मुंबई के कोलाबा स्थित चाबाड हाउस भी आतंकियों के निशाने पर था।
चाबाड हाउस में दो साल के मोशे होल्त्जबर्ग की देखभाल भारतीय महिला सांद्रा सैमुअल कर रही थीं। आतंकियों ने मोशे के माता-पिता रब्बी गेवेरियल होल्त्जबर्ग और रिवका होल्त्जबर्ग समेत छह लोगों की हत्या कर दी थी।
गोलीबारी के बीच सांद्रा मोशे को गोद में लेकर चाबाड हाउस से बाहर निकल आईं और उसकी जान बचाई।
सांद्रा सैमुअल की बहादुरी के सम्मान में इजरायल ने उन्हें अपने देश की नागरिकता भी प्रदान की। वहीं, चाबाड हाउस इजरायल और दुनिया भर से आने वाले यहूदी यात्रियों के बीच खासा लोकप्रिय था। इनमें सैन्य सेवा पूरी करने के बाद भारत आने वाले युवा इजरायली भी शामिल थे।
