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अमेरिका में स्थानीय भर्ती बढ़ाएंगी भारतीय आईटी कंपनियां, पर्म कार्यक्रम से बाहर होने के बाद बड़ा दांव

Published: Fri, 09 Oct 2026 08:57 PM (GMT+05:30)

भारतीय आईटी कंपनियां अमेरिकी नियमों के अनुपालन और स्थानीय भर्ती बढ़ाने पर जोर दे रही हैं। ट्रंप प्रशासन की नीतियों ...और पढ़ें

भारतीय आईटी कंपनियां अमेरिका में स्थानीय भर्ती बढ़ाएंगी। (फोटो-रॉयटर्स)

भारतीय आईटी कंपनियां अमेरिका में स्थानीय भर्ती बढ़ाएंगी। (फोटो-रॉयटर्स)

HighLights

  1. भारतीय आईटी कंपनियां अमेरिका में स्थानीय भर्ती बढ़ाएंगी।

  2. एच-1बी वीजा पर निर्भरता कम कर रही हैं कंपनियां।

  3. भारत से ऑफशोर डिलीवरी मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। ट्रंप प्रशासन द्वारा टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल समेत आठ बड़ी टेक कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (पर्म) कार्यक्रम से अस्थायी रूप से बाहर करने के बाद भारतीय आईटी उद्योग टकराव की बजाय वहां के नियमों के अनुपालन की राह चुनती नजर आ रही है।

आइटी उद्योग संगठन नासकाम ने साफ कहा है कि अमेरिकी बाजार भारतीय कंपनियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, वे वहां के कानून का पालन करने को तैयार हैं और स्थानीय अमेरिकियों को और ज्यादा अवसर देंगी। अन्य कंपनियों ने भी यहीं कहा है कि जिन मुद्दों को ट्रंप प्रशासन ने उठाया है, उसको लेकर वह पहले से सचेत हैं।

नासकाम का कहना है कि आव्रजन और कुशल प्रतिभाओं की आवाजाही दो अलग मुद्दे हैं। एच-1बी वीजा ने अमेरिका में अल्पकालिक कौशल की कमी दूर करने में भूमिका निभाई है, लेकिन पिछले कई वर्षों में भारतीय टेक कंपनियों ने इस वीजा पर निर्भरता काफी घटा दी है। उन्होंने अमेरिका में स्थानीय भर्ती बढ़ाई है और मजबूत घरेलू कार्यक्षमता तैयार किया है।

ये कंपनियां अमेरिका की अधिकांश फार्च्यून 500 कंपनियों के साथ काम करती हैं, अन्वेषण व विकास में मदद करती हैं तथा स्थानीय रोजगार भी पैदा करती हैं। नासकाम ने कहा है कि एच-1बी वीजा के जरिए स्थायी निवास पाने वाले कर्मचारियों की संख्या अपेक्षाकृत सीमित है।

भारतीय कंपनियां 80 से अधिक देशों में काम करती हैं, स्थानीय नियमों का पालन करती रही हैं और उन्हें भरोसा है कि अमेरिका में भी यही सिलसिला जारी रहेगा।सबसे बड़ी भारतीय आईटी निर्यातक टीसीएस ने शुक्रवार को शेयर बाजार को बताया कि वह अमेरिकी श्रम विभाग के हर निर्देश का पालन करेगी।

कंपनी का कहना है कि उसकी अमेरिकी कार्यबल रणनीति स्थानीय प्रतिभा की भर्ती और मजबूत कैंपस भर्ती माडल पर टिकी है। देश भर में 31 दफ्तरों और डिलीवरी केंद्रों में उसकी बड़ी स्थानीय टीम है। टीसीएस ने दोहराया कि अगले पांच वर्षों में वह अमेरिका में अतिरिक्त 15,000 लोगों की भर्ती करेगी।

साथ ही कंपनी का कहना है कि पिछले दो वर्षों में उसके पर्म आवेदन सिंगल डिजिट में थे, लिहाजा कार्यक्रम से बाहर होने से भी उसकी कार्यबल रणनीति प्रभावित नहीं होगी। टीसीएस ने परोक्ष तौर पर ट्रंप प्रशासन के श्रम विभाग व उपराष्ट्रपति के इस दावे को खारिज कर दिया है कि एच-1बी वीजा से बड़ी संख्या में बाहरी देशों के नागरिक अमरेिकी नागरिकता ले रहे हैं।

अन्य विश्लेषकों का आकलन भी यही है कि निकट अवधि में भारतीय आईटी पर बड़ा झटका नहीं दिख रहा। हालांकि कंपनियों की लाभप्रदता निश्चित तौर पर प्रभावित होगी। अक्टूबर 2024 से सितंबर 2025 के बीच कुल पर्म आवेदनों में भारतीय आईटी कंपनियों की हिस्सेदारी दो फीसदी से भी कम रही है।

आनसाइट माडल और ग्रीन कार्ड मार्ग पर निर्भरता को घटाते हुए अमेरिका में स्थानीय भर्ती और डिलीवरी केंद्र बढ़ाने के साथ ही आइटी कंपनियां यह भी कहा रही हैं कि वो भारत से आफशोर डिलीवरी मजबूत करेगी। यानी अमेरिकी कंपनियों को भारत से ही सर्विस देना।

यह काम पहले से ही कुछ कंपनियों ने बढ़ाना शुरू कर दिया है। इससे रोजगार के अवसर भारत के भीतर ही बेहतर होंगे। आरबीआइ के आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में भारत का साफ्टवेयर सेवा निर्यात 221.4 अरब डालर रहा था, जिसमें से 119.7 अरब डालर (54 फीसद) सिर्फ अमेरिका का था।

यह उद्योग प्रत्यक्ष रूप से 50 लाख से अधिक लोगों को रोजगार देता है और राजस्व का बड़ा हिस्सा अमेरिकी ग्राहकों से जुड़ा है। यह बड़ा कारण है कि भारतीय आइटी कंपनियां ट्रंप प्रशासन के तल्ख तेवर के बावजूद अमेरिकी बाजार को खोने का जोखिम नहीं उठाना चाहती।

देश की आइआइटी के पूर्व छात्रों के संगठन पैन आइआइटी एल्यूमिनी इंडिया ने एक बयान जारी कर कहा है कि दशकों तक अमेरिका जाने को उपलब्धि माना जाता रहा है, लेकिन अब पूछने का समय आ गया है कि इस प्रक्रिया में हमने क्या खोया, क्या पाया। इन्होंने यह कहा है कि अब सिलिकन वैली की जगह सिंधु घाटी को बनाने और बढ़ाने व इसमे योगदान देने का समय है।