नई दिल्‍ली, जेएनएन। भारत और रूस के बीच सोमवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री डा. एस जयशंकर ने अपने रूसी समकक्षों क्रमश: जनरल सर्गेइ शोइगु और सर्गी लेवरोव से मुलाकात की। इस दौरान दोनों देशों के बीच कई रक्षा समझौतों पर भी हस्ताक्षर किए गए, जिसमें एके-203 को लेकर भी करार हुआ। यह कहा जा रहा है कि पांच हजार करोड़ के इस समझौते के तहत यूपी के अमेठी में अगले दस वर्षों तक करीब छह लाख एके-203 असाल्‍ट राइफल का निर्माण होगा। आखिर इस रायफल की क्‍या खूबियां हैं ? सैनिकों को यह रायफल मिलने के बाद आखिर भारतीय सेना कितनी मजबूत होगी ?

एके-203 असाल्ट की खूबियां

1- इस राइफल को एके-200 सीरीज में रखा जाता है। वर्ष 2013 में इसे एके-203 में कुछ बदलवा करके इसे एके-103.3 नाम दिया गया। वर्ष 2019 में एके-300 और एके-100 एम राइफल्‍स का नाम दिया गया। वर्ष 2019 में इसको एके-203 नाम दिया गया।

2- राइफल इंसास अन्‍य राइफल की तुलना में छोटी और हल्की है। इसकी मारक क्षमता बेहद घातक है। असाल्‍ट की तुलना में इंसास राइफल बिना मैगजीन और बेयोनेट के भी 4.15 किलोग्राम वजन की है। एक-203 का वजन 3.8 किलोग्राम है। इंसास राइफल की लंबाई 960 मिलीमीटर है, जबकि, एके-203 मात्र 705 मिलिमीटर की है। वजन और लंबाई कम होने के कारण यह युद्ध के समय यह सैनिकों के लिए काफी सुविधाजनक है। इससे भारतीय सैनिकों को थकान कम लगेगी। सैनिक इस बंदूक को आसानी से और लंबे समय तक ढो सकते हैं। लंबाई कम होने से इसकी हैंडलिंग आसान हो जाती है।

3- ऐसा कहा जाता है कि इंसास राइफल सिंगल शाट और तीन-राउंड का बर्स्ट फायर कर सकता है, जबकि असाल्‍ट सेमी-आटोमैटिक या आटोमैटिक मोड में चलाई जा सकती है। एके-203 राइफल एक मिनट में 650 बुलेट दाग सकती है। निशाने में यह एकदम सटीक है।

4- इंसास में 20 से 30 राउंड की मैगजीन लगती है, जबकि असाल्‍ट में 30 राउंड की बाक्स मैगजीन लगती है। इंसास की मजल वेलोसिटी 915 मीटर प्रति सेकेंड है, असाल्‍ट की मजल वेलोसिटी 715 मीटर प्रति सेकेंड है। असाल्‍ट गैस आपरेटेड, रोटेटिंग बोल्ट तकनीक पर काम करती है, यही तकनीक इंसास में भी लगी है।

5- इंसास राइफल पर इन-बिल्ट आयरन साइट, माउंट प्वाइंट लगाया जा सकता है, ताकि दूरबीन से दुश्मन को देखा जा सके। इस मामले में असाल्‍ट ज्यादा बेहतर है, क्योंकि इस पर एडजस्टबल आयरन साइट है। इसके अलावा पिकैटिनी रेल लगी है, यानी आप दुनिया के किसी भी तरह के दूरबीन को इस बंदूक पर लगा सकते हैं यानी जितनी ताकतवर दूरबीन उतना घातक हमला।

भारतीय सेना को रूसी राइफल की जरूरत

यह एके सीरीज की अत्‍याधुनिक और खतरनाक राइफल है। यह राइफल भारतीय सेना द्वारा कई दशकों से उपयोग में लाई जा रही राइफल्‍स की जगह लेगी। इस राइफल को भारत और रूस संयुक्‍त रूप से निर्मित करेंगे। भारतीय सेना को 7.50 लाख एके-203 असाल्ट राइफल की आवश्‍यकता है। भारत और रूस के बीच इस रायफल को लेकर जो सौदा हुआ है, इसके तहत 70 हजार से एक लाख राइफल रूस से मंगाई जाएगी, शेष 6.50 लाख राइफल्‍स उत्‍तर प्रदेश के जिले अमेठी में बनाई जाएंगी। इस राइफल का पहला प्रोटोटाइप साल 2007 में एके-200 के नाम से आया था। इस राइफल को एके-200 सीरीज में रखा जाता है।

Edited By: Ramesh Mishra