अमित दीक्षित, आगरा। हिमालय की चोटी हो या फिर देश का अन्य कोई भी दुर्गम स्थान, अब भारतीय जवानों को पैराशूट से इन जगहों पर कूदने में कोई परेशानी नहीं होगी। दरअसल, तीनों सेनाओं के लिए तीसरी पीढ़ी का पैराशूट तैयार किया गया है, जिससे अधिक ऊंचाई से कूदना आसान हो सकेगा। हवाई वितरण अनुसंधान एवं विकास संस्थापन (एडीआरडीई) छह साल से पैराशूट टैक्टिकल असाल्ट (पीटीए)-जी टू पर काम कर रहा था।

अब (एडीआरडीई) ने ये पैराशूट विकसित कर लिया है। यह तीसरी पीढ़ी का पैराशूट है। वर्तमान में जल, थल और वायु सेना के जवान दूसरी पीढ़ी (पीटीए-एम व आर) के पैराशूट प्रयोग करते हैं। सेनाओं को इस पैराशूट का प्रयोग करते हुए डेढ़ दशक हो चुके हैं। नए पीटीए-जीटू पैराशूट से सामान्य तौर पर 1250 फीट ऊंचाई से आसानी से छलांग लगाई जा सकती है, जबकि आवश्यकता पड़ने पर यह 4000 फीट ऊंचाई के लिए भी मुफीद होगा।

इसका इस्तेमाल दुर्गम स्थानों पर आसानी से किया जा सकेगा। एडीआरडीई ने नए पैराशूट की हर तरीके से जांच की है। मलपुरा ड्रॉपिंग जोन में एक साल तक डमी ट्रायल किए गए। फिर लाइव ट्रायल शुरू हुए। हर टेस्ट में यह पैराशूट सफल रहा। अब सेना ने भी यूजर ट्रायल शुरू कर दिया है। माना जा रहा है कि ट्रायल सफल रहने पर सेना, जल्द ही इसे अपना लेगी। एडीआरडीई को इन नए पैराशूट के लिए डिमांड भेजी गई है। जरूरत के हिसाब से इन्हें मंगाया जाएगा।

उन्नत किस्म के नायलॉन का इस्तेमाल 

तीसरी पीढ़ी के पैराशूट को तैयार करने में उन्नत किस्म के नायलॉन सहित कई अन्य मैटेरियल का प्रयोग किया गया है। इससे पैराशूट की लाइफ बढ़ जाती है। पैराशूट 20 साल तक चलेगा।

यह है खासियत 

तीसरी पीढ़ी के पैराशूट से किसी भी विमान से छलांग लगाई जा सकेगी। भले ही विमान की रफ्तार 265 किमी प्रति घंटा हो, जबकि पूर्व में इतनी रफ्तार से छलांग लगाने पर खतरा रहता था।

14 किग्रा है वजन

पीटीए-जीटू पैराशूट का वजन 14 किग्रा है, जबकि अन्य पैराशूट का वजन 16 किग्रा होता है।

एक मिनट के आसपास लगेगा समय 

पीटीए-जीटू से 1250 फुट की ऊंचाई से किसी विमान से कूदने पर जमीन पर आने में करीब एक मिनट का समय लगेगा।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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