IAF की नीव और हवाई सिपाही, भारतीय वायु सेना का गौरवशाली इतिहास
भारतीय वायु सेना की नींव 1920 के दशक में रखी गई, जहां कुशल भारतीय मैकेनिक्स तैयार करना एक बड़ी चुनौती ...और पढ़ें

भारतीय वायु सेना की नींव 1920 के दशक में रखी गई। (फोटो-IAF)
HighLights
भारतीय वायु सेना की नींव 1920 के दशक में रखी गई।
कुशल भारतीय मैकेनिक्स तैयार करना प्रारंभिक चुनौती थी।
'हवाई सिपाही' रैंक 1932 में बना, 1933 में पहली उड़ान।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। 1920 के दशक के अंतिम सालों में जब भारतीय वायु सेना के गठन की नींव रखी जा रही थी, तब ब्रिटिश प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी लड़ाकू विमानों के रखरखाव और सर्विसिंग के लिए कुशल भारतीय मैकेनिक्स तैयार करना।
उस समय 6 भारतीय कैडेट्स को पायलट ट्रेनिंग के लिए इंग्लैंड के क्रैनवेल स्थित रॉयल एयर फोर्स कॉलेज भेजा गया था। लेकिन नई फोर्स को अपने एयरक्राफ्ट की देखरेख और सर्विसिंग के लिए भारतीय मैकेनिक्स की भी जरूरत थी।
5 साल की ट्रेनिंग के लिए 2 साल की सीमा
2023 में भारतीय वायु सेना द्वारा X पर शेयर की गई एक ऐतिहासिक जानकारी के मुताबिक उस समय के ब्रिटिश सिस्टम के तहत एक काबिल एयरक्राफ्ट मैकेनिक को ट्रेन करने में पांच साल लगते थे। लेकिन नए रिक्रूट्स के पास पायलटों के लौटने से पहले मुश्किल से दो-तीन साल का समय था।
समय की कमी से निपटने के लिए RAF ने बदली रणनीति
RAF ने शुरू में ट्रेन्ड मैकेनिक्स के लिए ईशापुर राइफल फैक्टरी की ओर देखा और फिर भारतीय रेलवे के अनुभवी तकनीकी कर्मचारियों को भी इस पहल में शामिल किया गया।
सभी कर्मचारियों को कराची स्थित RAF एयरक्राफ्ट डिपो में भेजा गया, जहां अनुभवी ब्रिटिश कर्मियों के मार्गदर्शन में उन्होंने विमानों की देखभाल और तकनीकी बारिकियों को सीखा।
कैसे अस्तित्व में आया हवाई सिपाही रैंक
तकनीकी कर्मचारियों की भर्ती के बाद उनके पद को लेकर लंबी चर्चा हुई। ब्रिटिश अधिकारियों का मानना था कि थलसेना के सिपाही शब्द का इस्तेमाल करने से दोनों सेनाओं के बीच भ्रम पैदा हो सकता है।
इस भ्रम को दूर करने और नई वायु सेना के कर्मचारियों को एक विशिष्ट पहचान देने के लिए साल 1932 में रैंक का नाम बदलकर हवाई सिपाही रखा गया।
अप्रैल 1933 को पहली ऐतिहासिक उड़ान
1 अप्रैल, 1933 को कराची से भारतीय वायु सेना की पहली आधिकारिक ऑपरेशनल फ्लाइट शुरू हुई। इस शुरुआती और ऐतिहासिक यूनिट में कुल 19 हवाई सिपाही शामिल थे, साथ ही 6 RAF-प्रशिक्षित भारतीय अधिकारी और 4 वेस्टलैंड वापिटी बाइप्लेन भी थे।
हरजिंदर सिंह का बेमिसाल सफर
IAF के शुरुआती हवाई सिपाहियों में सबसे चर्चित नाम हरजिंदर सिंह का है। उनका सफर भारतीय वायु सेना के समर्पण का प्रतीक बन गया।
हरजिंदर सिंह 1942 में ऑफिसर बने, 1950 में उन्होंने अपने पायलट विंग्स हासिल किए और आखिरकार एक एयर वाइस मार्शल के तौर पर रिटायर हुए।
IAF की जानकारी के अनुसार, उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापानी फोर्स के खिलाफ ऑपरेशन के लिए वेस्टलैंड लाइजेंडर एयरक्राफ्ट को इम्प्रोवाइज्ड बॉम्ब रैक के साथ मॉडिफाई करने में भी मदद की थी।
