चीन के वाणिज्य मंत्री के साथ पीयूष गोयल ने की बैठक, फिर शुरू हुई कारोबारी मुद्दों पर चर्चा
भारत और चीन ने लंबे समय बाद कारोबारी मुद्दों पर चर्चा शुरू की है, जिसमें भारत ने व्यापार घाटा कम ...और पढ़ें

भारत-चीन ने फिर शुरू की कारोबारी मुद्दों पर चर्चा (फोटो- ANI)

समय कम है?
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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। जब शीर्ष स्तर पर द्विपक्षीय संबंधों को सकारात्मक दिशा देने पर सहमति बन जाती है तो उसका संदेश चौतरफा होता है। 12 सितंबर को भारत के उद्योग व वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की चीन के वाणिज्य मंत्री वांग वेंताओ के साथ हुई बैठक में दोनों देशों ने लंबे अरसे बाद कारोबारी मुद्दों पर विस्तार से बात की है।
इनकी मुलाकात मोदी और चिनफिंग के बीच उच्चस्तीय वार्ता के ठीक बाद हुई है। वैसे दोनों वाणिज्य मंत्रियों के बीच मार्च, 2026 में भी एक मुलाकात हुई थी लेकिन इस बार की बैठक ज्यादा व्यापक व समस्याओं के समाधान के लिहाज से अहम रही है।
चीन की तरफ से भारतीय बाजार में चीनी प्रौद्योगिकी कंपनियों के प्रवेश का मुद्दा उठाया गया तो भारत ने भी बढ़ते व्यापार घाटे को काफी चिंताजनक बताया और चीनी बाजार को खोलने की पेशकश की। मोदी-शी वार्ता में भी कारोबार से जुड़ी समस्याएं काफी अहम रहीं।
चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, फिर भी दोनों देशों के वाणिज्य व उद्योग मंत्रालयों के बीच संवाद बहुत कम होता रहा है। 2019 की मामल्लापुरम बैठक में आर्थिक-व्यापार संबंधों पर उच्चस्तरीय समिति बनाने का फैसला हुआ था, लेकिन उसके कुछ महीनों बाद पूर्वी लद्दाख में चीनी सेना की घुसपैठ से विवाद पैदा हो गया।
वर्ष 2023 में दोनों देशों के वित्त मंत्रियों की बैठक जरूर हुई, लेकिन कारोबारी असंतुलन दूर करने का ठोस रास्ता नहीं निकला। अब संकेत है कि गोयल-वेंताओ मुलाकात के बाद स्थिति सुधर सकती है।
आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2020 में सीमा पर तनाव के बावजूद भारत व चीन के बीच द्विपक्षीय कारोबार लगातार बढ़ा है। समस्या यह है कि भारत ने चीन से आयात तो खूब बढ़ाया है लेकिन निर्यात बढ़ाने में खास सफलता हाथ नहीं लगी है।
दोनों देशों के बीच 2019-20 में व्यापार घाटा (चीन के पक्ष में) करीब 53.56 अरब डालर था। 2020-21 में इसमें कुछ गिरावट (48.64 अरब डालर) हुई थी लेकिन उसके बाद आयात तेजी से बढ़ा। 2025-26 में द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर 127.7 अरब डालर पहुंच गया।
भारत का चीन को निर्यात बढ़ा है। पिछले वित्त वर्ष यह 36.62 फीसद बढ़कर 19.47 अरब डालर हो गया लेकिन कुल आयात के मुकाबले काफी कम है। इस वजह से भारत इस असंतुलन को दूर करने को लेकर तत्पर है।
