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किसानों को बड़ी राहत, आठ नए यूरिया प्लांट को मजूरी; कहां-कहां लगाए जाएंगे?

By Arvind SharmaEdited By: Narender Sanwariya
Published: Tue, 22 Sep 2026 06:02 PM (IST)

देश में आठ नए यूरिया संयंत्र लगाने की तैयारी है, जिसमें लगभग 80 हजार करोड़ रुपये का निवेश होगा, जिससे सालाना एक करोड़ टन अतिरिक्त यूरिया का उत्पादन होगा।

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HighLights

  1. आठ नए यूरिया संयंत्रों पर 80 हजार करोड़ रुपये का निवेश

  2. देश में सालाना एक करोड़ टन अतिरिक्त यूरिया का उत्पादन

  3. यूरिया आयात पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य

अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। उर्वरकों की जरूरत पूरी करने के लिए आठ नए यूरिया संयंत्र लगाने की तैयारी है। इनपर करीब 80 हजार करोड़ रुपये निवेश होगा। संयंत्रों के चालू होने पर देश में सालाना करीब एक करोड़ टन अतिरिक्त यूरिया का उत्पादन होने लगेगा। इसका बड़ा फायदा यह होगा कि यूरिया का बड़ा हिस्सा देश में ही तैयार होने लगेगा।

जुलाई में राष्ट्रीय यूरिया निवेश नीति-2026 को मंजूरी मिलने के बाद सरकार के पास नए संयंत्र लगाने के लिए 14 प्रस्ताव मिले हैं। इनमें से आठ को अगले एक-दो महीने में मंजूरी मिल सकती है। हालांकि उत्पादन तुरंत शुरू नहीं होगा। प्लांट लगाने एवं चालू करने की प्रक्रिया में चार से पांच वर्ष लग सकते हैं।

मांग की तुलना में उत्पादन कम

अभी देश में प्रत्येक वर्ष करीब सात सौ लाख टन उर्वरकों की जरूरत होती है। इनमें चार सौ लाख टन सिर्फ यूरिया है। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अनुसार 2025-26 में देश में 293.26 लाख टन यूरिया का उत्पादन हुआ था एवं 103.50 लाख टन आयात करना पड़ा। जाहिर है, मांग की तुलना में उत्पादन कम होने के कारण आयात का सहारा लिया जा रहा है।

यूरिया की मांग बढ़ जाएगी

नए संयंत्र से इस अंतर को कम किया जा सकता है, क्योंकि सभी नए संयंत्रों से लगभग एक करोड़ टन अतिरिक्त यूरिया का उत्पादन होगा, जो पिछले वर्ष के आयात के लगभग बराबर है। हालांकि ऐसा नहीं कि यूरिया का आयात पूरी तरह बंद हो जाएगा। नए प्लांटों से जब तक उत्पादन शुरू होगा तब तक यूरिया की मांग बढ़ जाएगी।

आयात खत्म नहीं हो सका

यूरिया का घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए देश में एक दशक में छह संयंत्र लगाए जा चुके हैं। इनमें रामागुंडम, गोरखपुर, सिंदरी और बरौनी के संयंत्र तथा निजी क्षेत्र के दो संयंत्र शामिल हैं। इनसे कुल 76.2 लाख टन सालाना उत्पादन हो रहा है। फिर भी आयात खत्म नहीं हो सका है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भरता के कारण

यूरिया के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भरता के कारण किसी देश में संकट पैदा होने पर भारत में यूरिया महंगा हो जाता है। हाल के दिनों में ऐसा होता रहा है। मई में भारत को 947 डालर प्रति टन की दर से यूरिया आयात करना पड़ा है। बाद में कीमत घटकर करीब 406 डॉलर प्रति टन रह गई।

यूरिया के साथ गैस भी जरूरी

यूरिया बनाने के लिए गैस जरूरी है जो भारत के लिए बड़ी चुनौती है। इसलिए यूरिया के अत्यधिक उत्पादन के साथ गैस की जरूरत भी बढ़ेगी। यदि गैस महंगी हुई तो लागत भी बढ़ सकती है। यूरिया में आत्मनिर्भरता केवल नए प्लांट लगाकर नहीं प्राप्त हो सकती है। कारखानों को चलाने के लिए उचित मूल्य पर गैस मिलना भी जरूरी है।

इन कंपनियों के प्रस्ताव पर विचार

रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के मुताबिक जिन कंपनियों के प्रस्तावों पर विचार किया जा रहा है, उनमें दो उत्तर प्रदेश से हैं। गोरखपुर में हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड (एचयूआरएल) की दूसरी इकाई और शाहजहांपुर में कृभको फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (केएफएल) का प्रस्ताव है। गेल के दो प्रस्तावों में एक महाराष्ट्र और दूसरा छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में है।

चंबल फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड, मैटिक्स फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड और मद्रास फर्टिलाइजर्स लिमिटेड के भी एक-एक प्रस्ताव हैं। गेल और राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स ने विदर्भ में 12.7 लाख टन सालाना क्षमता का एक नया गैस आधारित यूरिया संयंत्र लगाने के लिए हाल में ही समझौता किया है।