नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्‍तान के बीच संबंधों की खाई काफी गहरी हो गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह पाकिस्‍तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्‍मद और उसके प्रमुख सरगना मसूद अजहर है। इस मुद्दे पर संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत चीन की बदौलत हमेशा मात खाता आ रहा है। चीन मसूद अजहर पर अपने निजी हितों की वजह से शिकंजा कसने नहीं देना चाहता है। आपको यहां पर बता दें कि पुलवामा के बाद कई देशों ने इस बात की आशंका जाहिर की है कि भारत और पाकिस्‍तान में जंग छिड़ सकती है।

पाक को किया आगाह
खुद पाकिस्‍तान के पूर्व राष्‍ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ समेत देश के तीन पूर्व विदेश सचिवों ने भी इमरान खान को आगाह किया है। इन सभी के बीच इमरान खान ने एक बार फिर से भारत को पुलवामा हमले में पाकिस्‍तान का हाथ होने का सुबूत देने की बात कही है। इन सभी के बीच इमरान खानी की पार्टी के सांसद ने भी पिछले दिनो पीएम मोदी से इस बारे में बात की है और इमरान खान का पैगाम उन्‍हें दिया है। बहरहाल, इन सभी के अलग-अलग सियासी मायने हैं। लेकिन इस पूरी कहानी के केंद्र में मसूद अजहर ही है जिसका नाम भारत के अलावा कोई दूसरा नहीं ले रहा है।

प्रतिबंध के पीछे दे रहा सुरक्षा
वहीं पाकिस्‍तान ने शांति का मुखौटा पहनकर जैश के हैडक्‍वार्टर पर सुरक्षाबल के जवानों को तैनात कर दिया है। इसकी आड़ में वह जैश के मुखिया की सुरक्षा और कड़ी करने में लगा हुआ है। मसूद अजहर के मुद्दे पर चीन ने अपनी स्थिति को बेहद हास्‍यास्‍पद बनाकर रख दिया है। चीन का कहना है कि पुलवामा हमले का उन्‍हें दुख है और इस तरह के हमलों की चीन निंदा करता है। चीन ने अपने बयान में उम्‍मीद भी जताई है कि भारत और पाकिस्‍तान इस मामले में संयम बनाए रखेंगे। लेकिन अजहर के मुद्दे पर उसके रवैये में कोई बदलाव नहीं दिखाई दिया। वहीं जब हाल ही में आतंकवाद के उस मसौदे पर उसने हस्‍ताक्षर किए जिसमें मसूद अजहर का नाम था तो उसकी स्थिति बेहद हास्‍यास्‍पद हो गई। लेकिन हकीकत ये है कि चीन आज भी अजहर के मुद्दे पर वीटो पावर रखता है। यही भारत की राह में वर्षों से सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है।

क्‍या कहते हैं जानकार
चीन के इस रुख को जानकार अलग तरीके से देखते हैं। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रोफेसर हर्ष वी पंत का मानना है कि भारत के तमाम कूटनीतिक प्रयासों के बाद भी अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने की भारत की मांग को यूएन, चीन के अड़ंगे पर टालता रहा है। इस वर्ष तो ऐसा दो बार हो चुका है और हर बार बीजिंग का स्पष्टीकरण अनोखा होता है। इस बार तो चीन के उप-विदेश मंत्री ली बाओदोंग ने अपने देश के रुख को सही ठहराते हुए कहा कि चीन आतंकवाद के सभी रूपों का विरोध करता है। आतंकवाद से निपटने का कोई दोहरा मापदंड नहीं होना चाहिए और न ही आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर कोई राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश होनी चाहिए।

वुहान भूल गया चीन
हालांकि, बयानों से उलट सुरक्षा परिषद के स्‍थाई सदस्‍य होने और वीटो पावर के चलते चीन हर बार अड़ंगा लगाता रहा है। भारत की मांग पर उसने हर बार तकनीकी अड़ंगा लगाया है, लेकिन इसकी वजह हर बार अलग होती हैं। बता दें कि पिछले वर्ष जब चीन के वुहान शहर में पीएम मोदी ने चीन के राष्‍ट्रपति शी चिनफिंग से मुलाकात की थी, उसमें भी आतंकवाद का मुद्दा शीर्ष पर था। लेकिन उसका असर भी चीन के रवैये पर दिखाई नहीं दिया। यह वो वक्‍त था, जब अमेरिका और चीन के रिश्‍ते लगातार खराब हो रहे थे और भारत एक सकारात्‍मक रुख के साथ आगे बढ़ रहा था।

चीन को भी देना होगा कड़ा जवाब
प्रोफेसर पंत का कहना है कि चीन मसूद अजहर के मामले में सबसे बड़ा रोड़ा है। लिहाजा चीन आतंकवाद पर कोई भी राग अलापता रहे, लेकिन यदि वह अपने वीटो पावर का इस्‍तेमाल अजहर को बचाने के लिए करता है तो भारत की मुहिम कभी सफल नहीं हो सकेगी। वुहान बैठक से जो भावना निकलकर बाहर आई थी, यदि वह अब भी अस्तित्व में है, तो अपनी आखिरी सांसें ही गिन रही है। इसीलिए चीन को कड़ा जवाब देने का वक्त आ गया है। उनके मुताबिक, यदि चीन अपनी पुरानी पाकिस्तान-नीति जारी रखता है, तो भारत को भी इसकी पड़ताल करनी होगी।

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Posted By: Kamal Verma