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हाईवे निर्माण में बीओटी मॉडल से कतरा रहीं निजी कंपनियां, सरकार पर बढ़ा बोझ; अब क्या तैयारी?

By jitendra sharmaEdited By: Harsh Katare
Published: Sat, 17 Oct 2026 07:23 PM (IST)

सरकार हाईवे निर्माण में बढ़ते वित्तीय बोझ और निजी कंपनियों की बीओटी मॉडल से दूरी के कारण एक नया मॉडल ...और पढ़ें

सरकार लाएगी हाईवे निर्माण का नया मॉडल

सरकार लाएगी हाईवे निर्माण का नया मॉडल

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जितेंद्र शर्मा, नई दिल्ली। देश में हाईवे निर्माण की गति को बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार समय-समय पर जो मॉडल लाई, अब उनमें भी तरह-तरह की चुनौतियां सामने आ रही हैं। बिल्ड, आपरेट, ट्रांसफर (बीओटी) मॉडल जो कभी सबसे अधिक पसंद किया गया, उससे धीरे-धीरे निजी कंपनियां किनारे करने लगीं।

निजी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सरकार ने इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट एंड कंस्ट्रक्शन (ईपीसी) और बीओटी का मिश्रित रूप हाइब्रिड एन्युटी मॉडल लॉन्च किया।

इसके प्रति निजी कंपनियां तेजी से आकर्षित हुईं और हाईवे निर्माण की गति भी बढ़ी, लेकिन अब चूंकि कंपनियां मुख्यत: इसी मॉडल में काम करना चाहती हैं, तो सरकार पर वित्तीय बोझ बढ़ता जा रहा है। ऐसे में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने बीओटी और एचएएम के मिश्रण के रूप में नया मॉडल लाने की तैयारी कर ली है।

दरअसल, बीओटी मॉडल में निजी कंपनी को परियोजना निर्माण का पूरा पैसा लगाना होता है। कंपनी निर्माण के साथ ही निश्चित अवधि तक रखरखाव भी संभालती है। इसके लिए ठेकेदार फर्म को टोल संग्रह का अधिकार मिलता है। कुछ समय में कई कंपनियों के सामने ऐसी चुनौती आई कि यदि किसी हाईवे पर उसने पैसा लगाया और उस पर यातायात कम होने के वजह से टोल संग्रह काफी कम रहा।

इसके अलावा रखरखाव का भी दायित्व उसी पर रहता है। ऐसे में कंपनियों का इस मॉडल से मोहभंग होने लगा। चूंकि, सरकार तेजी से देशभर में हाईवे नेटवर्क को मजबूत करने के लिए काम कर रही थी, इसलिए एचएएम मॉडल लगाया गया। इसमें निर्माण के दौरान 40 प्रतिशत लागत खर्च सरकार किश्तों के रूप में देती है, जबकि 60 प्रतिशत हिस्सा ठेकेदार फर्म खुद के फंड से या निवेशकों के माध्यम से जुटाती है।

निर्माण पूरा होने के बाद कंपनी पर रखरखाव का दायित्व होता है, जबकि सरकार टोल संग्रह कर 15 वर्ष तक किश्तों में वह 60 प्रतिशत लागत और रखरखाव का खर्च कंपनी को देती है। इसमें यातायात का कोई जोखिम कंपनी के पास नहीं होता। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बीओटी मॉडल पर अब न के बराबर निविदाएं आती हैं।

ज्यादातर प्रोजेक्ट एचएएम में शामिल करने से सरकार पर वित्तीय बोझ भी बढ़ता जा रहा है। वहीं, चौथा मॉडल टोल-आपरेट-ट्रांसफर यानी टीओटी का है, जो कि ब्राउनफील्ड परियोजनाओं के लिए है। जो हाईवे पहले से बने हैं, उनका नवीनीकरण या चौड़ीकरण कर सरकार निजी कंपनी को टोल संग्रह, संचालन और रखरखाव एक तय अवधि के लिए सौंपती है। इसके बदले सरकार को एकमुश्त राशि एडवांस में मिलती है, जिसका उपयोग अन्य परियोजनाओं में किया जाता है।

वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि काफी समय से नए मॉडल को लेकर बातचीत चल रही थी। अब तय हुआ है कि बीओटी और एचएएम के मिश्रण के रूप में ऐसा मॉडल लाया जाए, जिसमें न तो निजी निवशेकों के लिए अधिक जोखिम रहे और न ही सरकार के ऊपर सारा वित्तीय बोझ पड़े। नए मॉडल का प्रारूप प्रस्ताव के रूप में कैबिनेट सचिवालय भेजा गया है। अभी इसके सभी बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा और चिंतन के बाद अंतिम रूप दिया जाएगा।