कर्नल शिवदान सिंह। आठवीं कोर कमांडर स्तर की मीटिंग में भारत और चीन के बीच लद्दाख सीमा पर चले आ रहे तनाव को कम करने और शांति स्थापित करने के लिए चीन तैयार हो गया है। हालांकि उसका हृदय परिवर्तन अचानक मानवता के आधार पर नहीं हुआ है, बल्कि यह भारतीय सेनाओं के असली स्वरूप तथा इसके सैनिकों की इच्छाशक्ति, शारीरिक मजबूती तथा समर्पण की भावना को मई से लेकर अब तक देखने के बाद हुआ है। गलवन घाटी विवाद में भारतीय सैनिकों ने निहत्थे ही सादी वर्दी में चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार कर इसका प्रदर्शन कर दिया है। चीन को संदेश साफ शब्दों में दिया जा चुका है कि अब भारत वर्ष 1962 का पिछड़ा तथा गरीब भारत नहीं है, बल्कि अब वह 2020 का आíथक एवं सैन्य महाशक्ति है।

उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों की लंबी गुलामी के बाद भारत वर्ष 1947 में आजाद हुआ। अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में केवल इसे लूटा, जिस कारण देश में चारों तरफ पिछड़ापन, गरीबी तथा अव्यवस्था का माहौल था। सुरक्षा क्षेत्र में हमारी सेना के पास नाममात्र के हथियार जैसे 303 वोल्ट एक्शन राइफल जैसे ही हथियार थे। इसके अतिरिक्त, सीमाओं की सुरक्षा के लिए परम आवश्यक सीमाओं तक पहुंचने के लिए सड़कों तथा अन्य आधारभूत ढांचे का नामोनिशान तक नहीं था। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों जैसे लेह लद्दाख इत्यादि में स्थिति और भी खराब थी। इस स्थिति का फायदा उठाकर चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति के द्वारा वर्ष 1950 के आसपास तिब्बत पर कब्जे के बाद पूर्वी लद्दाख तथा अरुणाचल प्रदेश के 48,000 वर्ग किमी क्षेत्र, जिसे अक्साई चिन के नाम से पुकारा जाता है, पर चुपचाप वर्ष 1959 के आसपास कब्जा कर लिया। संसाधनों की कमी तथा दुर्गम क्षेत्र होने के कारण इसकी सूचना भारत को काफी देर से लगी, जिस कारण वह इन क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करके अभी तक जमा हुआ है।

दुर्गम सीमाओं तक आसान पहुंच : पाकिस्तान के साथ चार बार तथा चीन के साथ 1962 में युद्ध के बाद भारतीय सरकारों ने अपनी रक्षा तैयारियों को समयानुसार आधुनिक तथा मजबूत करने की दिशा में जोर शोर से प्रयास शुरू कर दिए थे। इसके द्वारा सेनाओं को आधुनिक शस्त्र तथा गोला बारूद के साथ साथ सैन्य दुष्टि से जरूरी सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क तथा सुरंगों का व्यापक स्तर पर निर्माण किया गया। असंभव माने जाने वाली लेह से लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी तक 16,000 फुट की ऊंचाई पर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में 243 किमी लंबी सड़क का 20 वर्ष मे निर्माण संभव हो पाया। इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश से लेह को अटल सुरंग द्वारा सीधे जोड़ने से हर मौसम में लेह लद्दाख की सीमाएं देश के मुख्य भाग से हर समय जुड़ी रहेंगी और सड़क तथा वायु मार्ग से सैनिक सहायता कहीं पर भी आसानी से पहुंचाई जा सकती है।

हमारे देश की जरूरतों के अनुरूप थल सेना में इंटीग्रेटेड वैटल ग्रुप नाम के सैनिक दलों का गठन किया गया है। इसमें एक इंफेंट्री ब्रिगेड तथा इसके सहायक अंग जैसे तोपखाना, टैंक तथा दुश्मन की निगरानी के लिए आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक संसाधन व ड्रोन आदि होंगे। यह वैटल ग्रुप सेना की डिवीजन के मुकाबले में एक तिहाई होने के कारण आसानी से प्रभावी क्षेत्र में पहुंचकर दुश्मन को पूर्ण रूप से जवाब देने में सक्षम होंगे। इसके साथ-साथ इनकी रचना से अग्रेंजी समय से चली आ रही भारी भरकम डिवीजनों के स्थान पर इन दलों के आने के बाद अगले पांच वर्षो में भारतीय थल सेना में लगभग डेढ़ लाख सैनिकों की कटौती भी संभव हो सकती है। इससे देश के रक्षा बजट में भी बचत होगी।

संरचना विस्तार के साथ थल सेना में सात लाख नई आधुनिक राइफल और 55,000 लाइट मशीन गन (एलएमजी) तथा 44,600 कारबाइन खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसी के अंतर्गत रक्षा मंत्रलय ने अमेरिका की हथियार बनाने वाली कंपनी शिगशोर से 72,500 असाल्ट राइफल खरीदने का अनुबंध किया है। इसमें से 66,500 थल सेना को मिलेगी तथा बाकी वायु सेना तथा नौ सेना को दी जाएगी। इनकी 716 राइफलों की पहली खेप दिसंबर 2019 में देश में पहुंच चुकी है, जिनकी गुणवत्ता सैनिक मापदंडों पर खरी उतरी है।

स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने के लिए सेना के आर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड ने रूस के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में 203 क्लासीनोबो राइफलों के निर्माण की योजना बनाई है। अपनी सशस्त्र सेना की मारक क्षमता को बढ़ाने के लिए भारत ने अमेरिका से 777 विशेष किस्म की तोपों को खरीदने का आदेश भी दे दिया है, जिन्हें शक्तिशाली ईंधनयुक्त टैंकों पर लगाया जाएगा। इस प्रकार टैंकों के साथ में मध्यम श्रेणी की तोपें दुश्मन के ठिकानों तक पहुंचकर बहुत ही शीघ्रता से उसका विध्वंस करेगी। सेना के रक्षा अनुसंधान विभाग में थल सेना को पिनाका मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर प्रदान किया है। यह केवल 44 सेकेंड में 12 उच्च श्रेणी के रॉकेट 90 किमी की दूरी तक फायर कर सकता है। ये रॉकेट लॉन्चर सेना के विशेष प्रकार के टाट्रा ट्रक पर रखे गए हैं। इससे इन्हें कहीं पर भी आसानी से ले जाकर दुश्मन के खिलाफ इनका प्रभावी ढंग से प्रयोग किया जा सकता है। इस प्रकार अतिरिक्त और बहुत से संसाधन थल सेना के लिए उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

थल सेना के साथ ही देश की नौ सेना को भी आज की चुनौतियों के अनुसार तैयार किया जा रहा है। नौ सेना के युद्धपोतों को दुश्मन की पनडुब्बियों से ज्यादा खतरा रहता है। जैसे कि वर्ष 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान की एक पनडुब्बी ने भारत के एक युद्धपोत को डुबो दिया था, जिस पर जलसेना के बहादुर अफसर कैप्टन मुल्ला ने इसी के साथ जल समाधि लेकर नौसेना के आदर्श और नैतिक मूल्यों का उदाहरण प्रस्तुत किया था। इस खतरे से निपटने के लिए जल सेना के लिए पी8 नैपचून नामक पनडुब्बी मारक जहाजों को अमेरिका से खरीदा गया है। भारतीय नौ सेना की मारक क्षमता बढ़ाने के लिए रूस से चक्र नाम की पनडुब्बी ली गई है। इसके साथ ही भारतीय नौ सेना के तलवार तथा शिवालिक श्रेणी के युद्धपोतों को भी ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलों से सुसज्जित करने से नौ सेना की मारक क्षमता कई गुना बढ़ गई है। इस प्रकार पूरे दक्षिण एशिया के देशों के चारों तरफ फैले हिंद महासागर का अब वास्तव में हिंदुस्‍तान संरक्षक बन गया है।

लद्दाख में 16,000 फुट की ऊंचाई पर दौलत बेग ओल्डी में वायु सेना का हवाई अड्डा सेना के भारी टैंक को भी दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचा रहा है। इसलिए आजकल इस क्षेत्र में भारतीय टैंक चीन को युद्ध की चेतावनी दे रहे हैं और शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। दौलत बेग ओल्डी से भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान उड़कर दुश्मन को डरा रहे हैं। भारतीय सेना के तीनों अंगों ने क्रमवार आधुनिक शस्त्र तथा गोला बारूद के साथ समय की मांग के अनुसार परिवर्तन करके अपनी गतिशीलता तथा मारक क्षमता को कई गुना बढ़ा लिया है

(लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं)

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