नई दिल्‍ली (जेएनएन)। हिंद महासागर के बीच चीन ने मालदीव में 2.1 किमी लंबे चीन-मालदीव मैत्री पुल का निर्माण किया है। चीन द्वारा वित्त पोषित पुल का निर्माण 20 करोड़ डॉलर (14.79 अरब रुपये) से हुआ है और यह मालदीव की राजधानी माले को अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट से जोड़ता है। भारत हमेशा मालदीव को अपना सहयोगी मानता रहा है। ऐसे में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत ने अगस्त में 50 करोड़ डॉलर (36.98 अरब रुपये) के पैकेज की घोषणा की है। 6.7 किमी लंबा पुल माले को तीन द्वीपों से जोड़ेगा। यह मालदीव में सबसे बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजना होगी, जो चीन के बढ़ते प्रभुत्व की काट है। चीन से परेशान मालदीव अब भारत की ओर देख रहा है।

चीन की कठपुतली बना तो सुरक्षा को संकट

2013 में सत्ता संभालने वाले मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन नई दिल्ली को छोड़कर र्बींजग के करीब होते गए। जिसके बदले में चीन से उन्हें करोड़ों डॉलर दिए। 2018 के चुनाव में यामीन की हार ने भारत को रिश्ते सुधारने का मौका दिया। चीन की मालदीव के साथ बढ़ती नजदीकी देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन रही थी।

प्रमुख समुद्री मार्ग

करीब 1200 कोरल द्वीपों और पांच लाख की आबादी वाला मालदीव एशिया का सबसे छोटा देश भले हो लेकिन हिंद महासागर में रणनीतिक रूप से यह बेहद महत्वपूर्ण है। भारत का करीब आधा बाहरी व्यापार और 80 फीसद ऊर्जा का आयात मालदीव के समुद्री गलियारों से होता है।

भारत के साथ अच्छे रहे हैं संबंध

भौगोलिक निकटता और मजबूत ऐतिहासिक व आर्थिक संबंधों को देखते हुए मालदीव भारत का निकटतम सहयोगी रहा है। 1965 में अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद माले को मान्यता देने वाले पहले देशों में से भारत एक था। 1988 में मौमून अब्दुल गयूम के खिलाफ तख्तापलट के प्रयास को भारत ने पैराट्रूपर्स की मदद से विफल कर दिया था। हिंद महासागर में 2004 में आई सुनामी के बाद भारत ने मालदीव में सहायता के लिए नौसेना के तीन जहाज भेजे थे। लेकिन यामीन के बाद रिश्तों में खटास आ गई।

संबंध सुधारने की कवायद

मालदीव अब द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने के लिए प्रयासरत है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, सोलिह के सत्ता में आने के बाद मालदीव को दी जाने वाली वित्तीय सहायता 2 बिलियन डॉलर (147.92 अरब रुपये) से अधिक हो गई है। यह मालदीव के महत्व व दिल्ली के दृष्टिकोण की ओर इशारा करता है। पीएम नरेंद्र मोदी ने मालदीव को 1.4 बिलियन डॉलर (103.54 अरब रुपये)  की वित्तीय सहायता और इस साल अगस्त में भारत ने ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट के लिए 50 करोड़ डॉलर (36.98 अरब रुपये) के पैकेज की घोषणा की। मालदीव में भारत द्वारा वित्त पोषित कई बुनियादी ढांचा परियोजनाएं पहले से ही चल रही हैं।

मालदीव पर बढ़ता कर्ज

राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह की सरकार को नवंबर 2018 में शपथ ग्रहण के बाद यह पता लगाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी कि चीन की कितनी राशि मालदीव पर बकाया है। केंद्रीय बैंक गवर्नर का मानना था कि सीधे तौर पर 60 करोड़ डॉलर (44.37 अरब रुपये) बकाया है, लेकिन मालदीव की कंपनियों को सरकारी गारंटी के तहत जारी ऋणों में 90 करोड़ डॉलर (66.56 अरब रुपये) भी थे। पूर्व राष्ट्रपति और अब सोलिह की सत्तारूढ़ मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता मोहम्मद नशीद ने कहा है कि चीन का मालदीव पर ऋण 3 अरब डॉलर (221.88 अरब रुपये) या जीडीपी का आधे से अधिक हो सकता है। हालांकि चीन ने इस आंकड़े को अतिरंजित कहा है।

संतुलन रखने की कोशिश

विश्लेषकों का कहना है कि कर्ज की बड़ी राशि और चीन की आय पर निर्भरता के कारण मालदीव चीन से अलग नहीं हो सकता है। लेकिन मालदीव अमेरिका और जापान जैसे देशों तक पहुंच बना रहा है। वे देश भारत की स्थिति का समर्थन करते हैं और चाहते हैं कि मालदीव सरकार

बीजिंग के अनुचित प्रभाव में नहीं आए।

चीन के साथ बेहतर हुए थे रिश्ते

2011 से पहले चीन का माले में दूतावास भी नहीं था, लेकिन बीआरआइ परियोजना और 2014 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मालदीव की पहली यात्रा ने तस्वीर बदली। निवेश का नया दौर शुरू हुआ। जिसमें 59.16 अरब रुपये से हवाई अड्डे का विस्तार, हुलहुमेले द्वीप पर 7 हजार अपार्टमेंट वाली आवासीय परियोजना और चीन-मालदीव मैत्री पुल भी शामिल है।

शॉर्ट मे जानें सभी बड़ी खबरें और पायें ई-पेपर,ऑडियो न्यूज़,और अन्य सर्विस, डाउनलोड जागरण ऐप

budget2021