जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र में यरुशलम को इजरायल की राजधानी बनाने के प्रस्ताव के खिलाफ वोटिंग के फैसले का फिलहाल भारत और इजरायल के बीच रिश्तों पर असर पड़ता नहीं दिख रहा है। इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतान्यहू जनवरी, 2018 के मध्य में भारत आने वाले हैं और दोनों देश इसको सफल बनाने को लेकर जिस तरह की तैयारियों में जुटे है उसे देख कर नहीं लगता कि भारत का फैसला कोई मुद्दा है।

दोनो देश एक दूसरे को रणनीतिक व आर्थिक तौर पर कितनी अहमियत दे रहे हैं, इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि इनके बीच शीर्ष नेताओं की सालाना बैठक करने की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है। जुलाई में तेल अवीव में पीएम नरेंद्र मोदी और नेतान्यहू के बीच शीर्ष स्तरीय बैठक हुई थी और अब तकरीबन सात महीने बाद इनके बीच फिर द्विपक्षीय संबंधों के तमाम आयामों पर चर्चा होगी।

इजरायल के विदेश मंत्रालय में महानिदेशक युवल रोटेम ने पिछले मंगलवार को नेतान्यहू की यात्रा और इस दौरान होने वाली बातचीत के बारे में विदेश मंत्रालय के आला अधिकारियों के साथ विस्तार से बातचीत की। विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी से दैनिक जागरण ने यह पूछा कि क्या भारत की तरफ से यूएन में इजरायल की मंशा के खिलाफ जा कर वोटिंग करने का असर भविष्य के रिश्तों पर पड़ेगा तो उसका जवाब था कि, ''इजरायल के साथ रिश्ते पर भारत को गर्व है और भारत यह बात खाड़ी के अपने मित्र देशों को भी खुल कर बताता है। इजरायल के साथ हमारे रिश्ते हर क्षेत्र में सुदृढ़ हो रहे हैं और हम इस बात को किसी से छिपाते नहीं है। इजरायल को भी यह मालूम है कि फिलिस्तीन के साथ उनकी समस्या का हम शांतिपूर्ण तरीके से और इन दोनों देशों के बीच बातचीत से ही हल किये जाने के पक्षधर हैं। इसका जिक्र जुलाई, 2017 में मोदी की यात्रा के दौरान जारी संयुक्त घोषणा पत्र में भी था।''

जानकारों के मुताबिक मोदी और नेतान्यहू के बीच होने वाली द्विपक्षीय बातचीत में तकनीकी और आतंकवाद (दो 'टी' टेक्नोलोजी व टेरोरिज्म) के अलावा रक्षा व कृषि क्षेत्र में सहयोग सबसे अहम होगा। भारत हाल के वर्षो में इजरायल के हथियारों व रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा आयातक देश बन गया है। लेकिन हाल के दिनों में कुछ बड़े रक्षा सौदों में कीमत को लेकर अड़चनें खड़ी हुई है। खास तौर पर दुश्मन देशों की सैन्य गतिविधियों की हवाई निरीक्षण करने और सटीक सूचना देने वाली तकनीकी अवाक्स (एयरबोर्न वार्निग एंड कंट्रोल सिस्टम) के हस्तांतरण का मुद्दा लटक गया है। इजरायल ने इसकी कीमत बढ़ा दी है और भारत की तरफ से लगातार कीमत घटाने का दवाब बनाया जा रहा है। माना जा रहा है कि जिस तरह से मोदी सरकार ने फ्रांस से युद्धक विमान राफेल खरीदने की प्रक्रिया को ज्यादा दिनों तक नहीं लटकाया वैसे ही अवाक्स की जरुरत को देखते हुए अब इस पर भी दो टूक फैसला जल्द ही किया जाएगा।

मोदी की यात्रा के दौरान भारत और इजरायल ने जल व कृषि क्षेत्र में एक दूसरे को रणनीतिक साझेदार देश घोषित किया था। दोनो देशों के बीच इसके लिए 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' बनाने की सहमति बनी थी। नेतान्यहू की यात्रा के दौरान इस सहमति को जमीनी तौर पर लागू करने की बात होगी।

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Posted By: Gunateet Ojha

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