नई दिल्‍ली (जेएनएन)। हालिया घटनाक्रम में गलवन में चीनी धोखेबाजी के चलते हमारे सैनिकों के शहीद होने और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की चालबाजी के चलते पूरे देश में इस पड़ोसी देश के प्रति आक्रोश की लहर है। चीनी उत्पादों का बहिष्कार उन्माद के स्तर पर है। जाहिर है, राष्ट्र के सच्चे नागरिक होने के चलते यह भाव हम सबमें आना बहुत स्वाभाविक है। लेकिन क्या एक झटके में चीन से सभी तरह के आर्थिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंध तोड़ना अक्लमंदी होगी। नहीं, बिल्कुल नहीं। चीन को तो करारा जवाब देना है, लेकिन चरणबद्ध तरीके से।

अभी हमारी छोटी-बड़ी अनगिनत कंपनियों में चीन का पैसा लगा हुआ जिसके बूते वे कारोबार कर रही हैं। हमारे छोटे-छोटे उद्योग अपने कच्चे माल के लिए चीन पर आश्रित हैं। ऐसे में यकायक पूर्ण बहिष्कार आत्मघाती साबित हो सकता है। ऐसे में हमें रणनीति के तहत यह देखना होगा कि हम समय के साथ किन उत्पादों में आत्मनिर्भर हो सकते हैं। जैसे-जैसे हम खुद को मजबूत करते जाएं, चीनी मदद की रस्सी को काटते जाएं। इससे ही चीन की आर्थिक कमर टूटेगी। पड़ोसी देश चीन से इसी चरणबद्ध आत्मनिर्भरता की पड़ताल आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।

भारतीय कंपनियों में निवेश करके उनके स्वामित्व को चुनौती देने वाली चीनी तरकीब को काटने के लिए ही हाल ही में केंद्र सरकार ने पड़ोसी देशों से होने वाले निवेश को लेकर नीतियों में बदलाव किया। इस बदलाव से सबसे ज्यादा मिर्ची चीन को लगी है। भारत की कई तकनीकी कंपनियों और स्टार्टअप्स में चीन ने दबाकर पैसा लगाया है। एक अनुमान के मुताबिक एक अरब डालर से अधिक मूल्य वाली 30 में से 18 स्टार्टअप्स कंपनियों में चीन की प्रमुख हिस्सेदारी है।

तकनीकी स्टार्टअप निशाने पर

विदेश नीति से जुड़े थिंक टैंक गेटवे हाउस: इंडियन काउंसिल आन ग्लोबल रिलेशंस के एक अनुमान के मुताबिक चीन का भारतीय तकनीकी स्टार्टअप्स कंपनियों में ही निवेश सिर्फ 4 अरब डॉलर है। भले ही यह निवेश छोटा हो लेकिन इन कंपनियों के माध्यम से वह भारतीय समाज में अपनी छाप छोड़ने की मंशा रखता है। बड़ी कंपनिया बड़ी हिस्सेदारी: भारत की कई प्रमुख और लोकप्रिय कंपनियों में चीन की हिस्सेदारी है। इनमें बिग बास्केट, बायजू, डेलहीवेरी, ड्रीम 11, फ्लिपकार्ट, हाइक, मेकमायट्रिप, ओला, ओयो, पेटीएम, पेटीएम माल, पालिसी बाजार, क्विकर, रिविगो, स्नैपडील, स्विगी, उड़ान, जोमैटो आदि प्रमुख हैं।

चीनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश

चीन का भारत में निवेश करीब 6.2 अरब डॉलर है, लेकिन इसने जहां निवेश किया है, उसकी लोकप्रियता और ज्यादा से ज्यादा पहुंच इस कम निवेश को व्यापकता देते हैं। चीनी एप टिक टाक भारत में यूट्यूब को पीछे छोड़ चुका है। शाओमी के मोबाइल फोन का लगभग एकाधिकार सा होता जा रहा है। दक्षिण कोरियाई कंपनी सैमसंग पीछे छूट चुकी है। हुआवेई के राउटर्स खूब इस्तेमाल किए जाते हैं। चीन की बड़ी कंपनियां जैसे अलीबाबा, बाइट डांस और टेनसेंट भारतीय कंपनियों में पैसा उड़ेल रही हैं।

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