'कूटनीति से सब कुछ संभव', ब्रिक्स के मंच से भारत का बड़ा संदेश
ब्रिक्स 2026 नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में 'नई दिल्ली घोषणापत्र' को अंगीकार किया गया, जो वैश्विक चुनौतियों के बीच सदस्य देशों की सहमति का प्रतीक है।
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भारत ने ब्रिक्स को ग्लोबल साउथ का मजबूत मंच बनाया (फोटो- PTI)
HighLights
ब्रिक्स 2026 नई दिल्ली घोषणापत्र वैश्विक सहमति का प्रतीक
भारत ने ब्रिक्स को ग्लोबल साउथ का मजबूत मंच बनाया
कूटनीति से पश्चिम एशिया संकट और यूक्रेन युद्ध पर चर्चा
आईएएनएस, नई दिल्ली। दुनिया आज कई गंभीर संकटों से घिरी है। पश्चिम एशिया में जारी घमासान, चौथे वर्ष में प्रवेश कर चुका रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका की लगातार बदलती टैरिफ नीतियों ने वैश्विक व्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
ऐसे समय में ब्रिक्स 2026 शिखर सम्मेलन में नई दिल्ली घोषणापत्र का अंगीकार किया जाना अपने आप में महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
यह इसलिए भी अहम है क्योंकि सम्मेलन से पहले यह सवाल उठ रहे थे कि जब सदस्य देशों के बीच कई मुद्दों पर गंभीर मतभेद हैं, तब क्या वे किसी साझा घोषणा पर सहमत हो पाएंगे। लेकिन नई दिल्ली में इन आशंकाओं को विराम मिला। मतभेदों के बावजूद सदस्य देशों ने बातचीत के रास्ते से सहमति बनाने का प्रयास किया।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने ब्रिक्स को ऐसा मंच बनाने का प्रयास किया, जहां परस्पर सम्मान, सहयोग और साझा विकास को प्राथमिकता मिले सम्मेलन ने यह भी दिखाया कि ब्रिक्स अब केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं की सालाना बैठक नहीं रह गया है। यह वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए अपनी आवाज को मजबूती से रखने का महत्वपूर्ण मंच बनता जा रहा है।
इस संदर्भ में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ब्रिक्स के प्रति रवैया भी ध्यान देने योग्य है। ट्रंप पहले समूह को खारिज करते हुए इसे मृतप्राय बता चुके हैं और इसके सदस्य देशों पर ऊंची दरों के टैरिफ लगाने की धमकियां भी देते रहे हैं।
इसके बावजूद नई दिल्ली शिखर सम्मेलन ने एक अलग तस्वीर पेश की। सदस्य देशों के बीच मतभेद जरूर रहे, लेकिन वे एक साझा घोषणा पर सहमत हुए और बहुपक्षवाद, बहुध्रुवीय व्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के महत्व को फिर रेखांकित किया।प्रधानमंत्री मोदी ने शिखर सम्मेलन के अपने शुरुआती संबोधन में मौजूदा वैश्विक व्यवस्था की इसी कमी को रेखांकित किया।
वैश्विक स्तर पर निर्णय लेने के मौजूदा ढांचे को उन्होंने विशेषाधिकारों के पिरामिड जैसा बताया।उन्होंने मौजूदा विशेषाधिकारों के पिरामिड के स्थान पर साझेदारी का मंच बनाने की बात कही, जहां हर देश की आवाज सुनी जाए, हर सदस्य की हिस्सेदारी हो और मानव विकास वैश्विक प्रयासों के केंद्र में रहे।नई दिल्ली शिखर सम्मेलन के जरिये भारत ने दुनिया के सामने इसी सोच का एक उदाहरण रखने की कोशिश की।
प्रधानमंत्री ने कहा कि ब्रिक्स में ग्लोबल साउथ का भरोसा बढ़ा है, क्योंकि यहां उनकी बात सुनी जाती है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि ब्रिक्स की ताकत उसकी विविधता और सहयोग में है।नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में कूटनीति की महत्ता का पहलू भी दिखाई दिया।
सम्मेलन के दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूरोप को संदेश दिया कि रूस से यूरोपीय देशों को कोई खतरा नहीं है। ब्रिक्स का मंच रूस के लिए यूक्रेन संकट पर अपना रुख स्पष्ट करने का अवसर भी बना।इसी तरह ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच वार्ता को भी इस मंच की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है।
दोनों देश भले ही पश्चिम एशिया संकट का समाधान तुरंत न निकाल पाएं, लेकिन उनके नेताओं की आमने-सामने की मुलाकात ने यह जरूर दिखाया कि बातचीत के लिए मंच उपलब्ध हो तो कूटनीति अपना असर दिखा सकती है।
