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2014 में रखी गई AI और डेटा विजन की नींव को अब पूरा करने का समय, सरकार को विशेषज्ञों पर करना होगा भरोसा: डॉ राजेंद्र प्रताप गुप्ता

Published: Tue, 07 Jul 2026 08:27 PM (IST)

डॉ. राजेंद्र प्रताप गुप्ता ने कहा कि 2014 में रखी गई AI और डिजिटल गवर्नेंस की नींव को अब पूरी तरह लागू करने का समय है।

डॉ. राजेंद्र प्रताप गुप्ता।

डॉ. राजेंद्र प्रताप गुप्ता।

HighLights

  1. 2014 के घोषणापत्र में AI, बिग डेटा की नींव रखी गई थी।

  2. भारत AI रेडीनेस इंडेक्स में वैश्विक स्तर पर 27वें स्थान पर है।

  3. विशेषज्ञ-आधारित प्रशासन से राष्ट्रीय AI क्षमता का निर्माण होगा।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), बिग डेटा और डिजिटल गवर्नेंस के क्षेत्र में भारत की मौजूदा चुनौतियों और संभावनाओं पर वरिष्ठ नीति विशेषज्ञ एवं भाजपा के 2014 के चुनावी घोषणा पत्र के प्रमुख ड्राफ्टर डॉ. राजेंद्र प्रताप गुप्ता ने कहा है कि भारत को अब उस विजन को पूरी तरह लागू करना चाहिए, जिसकी नींव वर्ष 2014 में रखी गई थी।

उनके अनुसार, उस समय जब "सॉवरेन AI" (Sovereign AI) जैसी अवधारणा वैश्विक मंचों पर चर्चा का विषय भी नहीं बनी थी, तब भाजपा के घोषणा पत्र में बिग डेटा और एनालिटिक्स के लिए संस्थान स्थापित करने तथा "प्रिडिक्टिव साइंस" को बढ़ावा देने का स्पष्ट संकल्प लिया गया था।

उन्होंने कहा कि 42 पृष्ठों वाले 2014 के घोषणा पत्र में यह स्वीकार किया गया था कि भारत दुनिया की आईटी राजधानी होने के बावजूद अपने नागरिकों तक तकनीक के लाभ पूरी तरह नहीं पहुंचा सका है। उनके अनुसार यह केवल चुनावी घोषणा नहीं थी, बल्कि भविष्य की AI और डेटा आधारित अर्थव्यवस्था के लिए एक दीर्घकालिक रणनीतिक रोडमैप था।

दृष्टि स्पष्ट थी, लेकिन क्रियान्वयन पीछे रह गया

डॉ. गुप्ता के अनुसार, जून 2014 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के संसद के संयुक्त सत्र को संबोधन में भी डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस, कौशल विकास और तकनीक आधारित प्रशासनिक व्यवस्था पर विशेष जोर दिया गया था। उनका मानना है कि यही वह समय था, जब भारत को प्रिडिक्टिव साइंस, डेटा एनालिटिक्स और तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए मिशन मोड में संस्थागत ढांचा विकसित करना चाहिए था।

उन्होंने कहा कि राजनीतिक नेतृत्व ने दिशा तय कर दी थी, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था उस गति और प्रतिबद्धता के साथ आगे नहीं बढ़ सकी। परिणामस्वरूप, विभिन्न विभागों में जिम्मेदारियां बंटती रहीं, लेकिन किसी एक संस्था ने इस मिशन की समग्र जिम्मेदारी नहीं संभाली।

AI रेडीनेस में भारत की स्थिति

डॉ. गुप्ता ने स्वीकार किया कि भारत ने डिजिटल क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। उन्होंने ऑक्सफोर्ड गवर्नमेंट AI रेडीनेस इंडेक्स-2025 का हवाला देते हुए कहा कि भारत वर्तमान में वैश्विक स्तर पर 27वें स्थान पर है।

उनका कहना है कि चुनौती यह नहीं है कि भारत AI की दौड़ से बाहर हो गया है, बल्कि यह है कि वर्ष 2014 में जिस राष्ट्रीय स्तर की डेटा और AI संस्था की कल्पना की गई थी, वह अभी तक पूरी तरह विकसित नहीं हो सकी है। उनके अनुसार, भारत फिलहाल कंपनियों के स्तर पर AI क्षमता विकसित कर रहा है, जबकि आवश्यकता राष्ट्रीय स्तर पर साझा डेटा, कंप्यूटिंग, मॉडल गवर्नेंस और प्रिडिक्टिव एनालिटिक्स की मजबूत सार्वजनिक व्यवस्था बनाने की है।

विशेषज्ञता आधारित प्रशासन की आवश्यकता

डॉ. गुप्ता का मानना है कि पारंपरिक सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था (Generalist Bureaucracy) का ढांचा मूल रूप से प्रशासन चलाने के लिए बनाया गया था, न कि अत्याधुनिक तकनीकी नवाचारों के नेतृत्व के लिए। AI, डेटा आर्किटेक्चर, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग और प्रिडिक्टिव साइंस जैसे क्षेत्रों में दीर्घकालिक विशेषज्ञता और विषय-विशेष ज्ञान की आवश्यकता होती है।

उन्होंने कहा कि भाजपा के 2014 के घोषणा पत्र में भी उद्योग, शिक्षाविदों और विशेषज्ञों को शासन व्यवस्था में शामिल करने तथा लैटरल एंट्री को बढ़ावा देने की बात कही गई थी। उनके अनुसार, यह किसी नौकरशाही के विरोध का नहीं, बल्कि बेहतर परिणामों और राष्ट्रीय क्षमता निर्माण का विषय है।

उद्योग संगठनों, कंसल्टिंग कंपनियों और नीति संस्थानों पर सवाल

डॉ. गुप्ता ने दावा किया कि वर्ष 2014 में घोषणा पत्र तैयार करने के दौरान उद्योग संगठनों के पास भारत के आयात बिल को कम करने या घरेलू सेमीकंडक्टर निर्माण क्षमता विकसित करने का स्पष्ट रोडमैप नहीं था। उनका कहना है कि यही कमी आज भी भारत की तकनीकी संप्रभुता के सामने चुनौती बनी हुई है।

उन्होंने उद्योग संगठनों, बड़ी कंसल्टिंग कंपनियों और नीति आयोग (NITI Aayog) की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले एक दशक में अनेक रणनीतिक प्रस्तुतियां, कार्यशालाएं और परामर्श तो दिए गए, लेकिन स्थायी राष्ट्रीय संस्थान, घरेलू विशेषज्ञता और दीर्घकालिक सार्वजनिक क्षमता का अपेक्षित निर्माण नहीं हो सका।

कैबिनेट और संस्थागत बदलाव परिणाम आधारित हों

डॉ. गुप्ता के अनुसार, आज यह स्पष्ट हो चुका है कि डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर और सार्वजनिक डिजिटल अवसंरचना जैसी पहलें वर्ष 2014 के विजन की प्रासंगिकता को साबित करती हैं। हालांकि उनका कहना है कि सबसे बड़ी चुनौती अभी भी प्रभावी क्रियान्वयन की है।

उन्होंने सुझाव दिया कि यदि भविष्य में मंत्रालयों, सचिवालयों, नीति आयोग या तकनीकी संस्थानों में कोई पुनर्गठन या फेरबदल किया जाता है, तो उसका उद्देश्य केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि विषय विशेषज्ञों को दीर्घकालिक जिम्मेदारी देकर भारत की सॉवरेन AI क्षमता, आर्थिक मजबूती, मध्यम वर्ग के विस्तार और "ईज ऑफ लिविंग" को गति देना होना चाहिए।

लेख के अंत में डॉ. गुप्ता ने कहा कि भारत को अब केवल नीतिगत घोषणाओं या प्रतीकात्मक बदलावों की नहीं, बल्कि वर्ष 2014 में निर्धारित राष्ट्रीय तकनीकी मिशन को तेज गति से पूरा करने की आवश्यकता है।