रायपुर, हिमांशु शर्मा। छत्तीसगढ़ के गांवों और शहरों के बाहरी इलाकों में खुले मैदान में आपको रावण की पत्थर या फिर सीमेंट की बनी प्रतिमाएं नजर आएंगी। यहां अधिकतर गांवों के बाहरी इलाके में एक मैदान होता है जिसे लोग रावण भाठा के नाम से जानते हैं। स्थानीय भाषा में मैदान को भाठा कहा जाता है। यहां पुरानी परंपरा के अनुसार रावण की विशालकाय प्रतिमाएं स्थापित हैं। ये प्रतिमाएं मिट्टी या गत्ते की नहीं, बल्कि पत्थर आदि से बनी हुई पक्की प्रतिमाएं हैं। कुछ तो 400 साल पुरानी तक हैं। छत्तीसगढ़ में तो लगभग हर गांव में दशानन की विशाल प्रतिमाएं देखने को मिल जाएंगी।

जंजीरों में बंधा होता है बुराई रूपी रावण

दिलचस्प बात यह कि इन प्रतिमाओं को गांव के बाहर ही खुले आसमान तले खड़ा किया गया है। चलन यह भी कि प्रतिमा को लोहे की जंजीर से जकड़ कर रखा जाता है। जहां जंजीर नहीं, वहां पेंट से जंजीर बना दी जाती है, जो रावण के पैर में पड़ी दिखती है। संदेश यह कि न केवल गांव, बल्कि दैनिक आचरण में रावणरूपी बुराई के लिए कोई स्थान नहीं है। उसे जंजीर से जकड़ बाहर ही रखना चाहिए। गांव के बाहर जंजीर से जकड़ कर रखा गया रावण लोगों को हर समय बुराई से दूर रहने के लिए आगाह करता रहता है।

पांच से 25 फीट तक की प्रतिमाएं

सुदूर गांवों से लेकर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर तक रावण की प्रतिमाओं की ऊंचाई पांच से 25 फीट तक होती है। जिस स्थान पर रावण प्रतिमा खड़ी रहती है उसे रावण चौरा कहा जाता है। दशहरे के दिन रावण वध और उसके प्रतीक पुतले का दहन भी यहीं होता है। लेकिन पत्थर का बना रावण खड़ा रहता है, कहते हुए-बुराई से दूर रहो। किसी दौर में गांवों व बस्तियों के बाहर खड़ी रावण की ये प्रतिमाएं भी अब आबादी के बीच में आ गई हैं। रायपुर से लगे गांव जुलुम, टेकारी, सांकरा, रावणभाटा आदि में भी रावण की प्रतिमाएं दूसरे प्रदेशों से आने वालों के बीच जिज्ञासा का सबब होती है। राजधानी रायपुर के रावणभाठा क्षेत्र में स्थित रावण की प्रतिमा आसपास के इलाके में खड़ी रावण की सभी प्रतिमाओं की तुलना में सबसे बड़ी है। करीब 25 फीट की इस प्रतिमा का साल में एक बार विजयदशमी के पूर्व रंगरोगन किया जाता है। इस मूर्ति के पैरों में भी जंजीर है। इस प्रतिमा पर लिखा है- अंहकारी रावण।

प्रतिमा पर तीर मारकर होता है प्रतीकात्मक वध

छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले के बड़ेराजपुर ब्लॉक के ग्राम बांसकोट में दशहरा पर्व पर रावण का पुतला दहन रकने की सख्त मनाही है। मान्यता है कि यदि यहां पुतला दहन किया गया तो अनिष्ट की आशंका है। इसलिए यहां वर्षों पहले रावण का मूर्ति बनाया गया है जहां रामलीला के वक्त बाण चलाकर प्रतीकात्मक रूप से रावण का वध किया जाता है। यह परंपरा 70 वर्षों से चली आ रही है। सन 1948 में यहां लगभग 12 फीट ऊंची रावण की मूर्ति का निर्माण हुआ था। तब से यहां दशहरा का पर्व मनाया जाता है।

बताया जाता है कि यहां तत्कालीन बस्तर के महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की सलाह पर ही दशहरा पर्व मनाने की शुरुआत हुई थी। यही कारण है कि यहां जगदलपुर के तर्ज पर रावण का दहन नहीं किया जाता। गांव के पूर्व सरपंच डूडीराम मरकाम एवं पटेल आत्माराम सिन्हा ने बताया कि सन 1948 में यहां रावण की मूर्ति का निर्माण हुआ था। 10 सिर और 20 हाथ वाले इस मूर्ति को प्रतिवर्ष रंग पेंट किया जाता है। खुले मैदान में होने के बावजूद आज भी रावण की मूर्ति जस की तस है। दशहरा पर्व पर रामलीला का आयोजन होता है। जहां एक रथ पर भगवान राम लक्ष्मण एवं सीता पहुंचते हैं तथा श्रीराम एवं रावण की सेनाओं में युद्ध के पश्चात राम-रावण युद्ध होता है। अंत में भगवान श्रीराम के द्वारा तीर चलाकर रावण का वध किया जाता है तत्पश्चात पटाखे फोड़े जाते हैं पर रावण दहन नहीं होता है।

रावण की प्रतिमा के सामने फोड़ते हैं नारियल

रायपुर शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर धरसींवा ब्लॉक के मोहदी गांव में रावण को पूजने की भी परंपरा है। यहां रावणभाठा में लोग दशहरे के दिन जुटते हैं और रावण की प्रतिमा के सामने नारियल फोड़कर गांव को किसी विपदा से सुरक्षित रखने की प्रार्थना करते हैं। धमतरी जिले के सोनामगर में भी विजयादशमी के दिन रावण को जलाते नहीं बल्कि उसे पूजते हैं।

विजयादशमी के अगले दिन महिरावण का मिट्टी का पुतला बनाया जाता है। वहां विधि-विधान से उसकी पूजा की जाती है और लोग रावण के जयकारे लगाते हैं। फिर पुजारी महिरावण का लिंग और फिर उसका गला काट देते हैं। इसके बाद लोग उसकी प्रतिमा की गीली मिट्टी नोच-नोचकर घर ले जाते हैं। लोग महिरावण का पुतला बना वासना पर विजय के प्रतीक के रूप में ये त्यौहार मनाते हैं।

इस वजह से छत्तीसगढ़ में है यह परंपरा

छत्तीसगढ़ का बड़ा हिस्सा दण्कारण्य में आता है, यहां पहले अनार्यों का शासन था। इस वजह से यहां दक्षिण यानी रावण का प्रभाव रहा है। इसी वजह से छत्तीसगढ़ के ज्यादातर हिस्सों में रावण दहन की परंपरा नहीं रही है। यहां रावण की मूर्ति पूजा की जाती है और वध किया जाता है। पुरानी परंपरा पर अब नए दौर का असर भी दिखता है। पिछले कुछ वर्षों से रावणभाठा में अलग-अलग जगहों पर रावण का पुतला बनाकर दहन भी किया जाने लगा है।

इस अनोखे दशहरे में शामिल होते हैं देवी-देवता

छत्तीसगढ़ के बस्तर में 75 दिनों तक चलने वाले विश्व प्रसिद्ध इस दशहरे का संबंध राम-रावण संग्राम से नहीं है। दरअसल, यह आदिवासियों की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी और मावली माता से जुड़ा पर्व है। माना जाता है कि आदिवासी इस पर्व को बीते 600 साल से इसी रूप में मनाते आ रहे हैं। इसमें 600 से ज्यादा देवी-देवताओं को आमंत्रित किया जाता है। इसी लिए इसे देवी दशहरा भी कहा जाता है। रथ परिक्रमा के लिए रथ बनाने की प्रक्रिया 15 दिन पहले शुरू हो गई थी।

विजयदशमी के दिन बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी के छत्र को रथारूढ़ कर शहर में परिक्रमा लगाई जाती है। लगभग 30 फीट ऊंचे इस विशालकाय रथ को परिक्रमा कराने के लिए 400 से अधिक आदिवासियों की टीम जुटती है। पौराणिक मान्यता है कि आदिकाल में यहां असुरों का आधिपत्य था। महिषासुर और बाणासुर जैसे असुर यहीं हुए। कहते हैं मां दुर्गा ने बड़ेडोंगर की पहाड़ी पर महिषासुर का संहार किया था। आदिवासियों को राक्षसी हिडिंबा का वंशज भी माना जाता है। यही वजह है कि ज्यादातर आदिवासी अपना नाम हिड़मा-हिड़मो रखते हैं।

भगवान राम का ननिहाल है छत्तीसगढ़

इतिहासकारों के मुताबिक छत्तीसगढ़ को दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। यहां राजा भानुमंत का राज था। भगवान राम की माता कौशल्या राजा भानुमंत की पुत्री थीं। ऐसा माना जाता है कि प्रदेश के नाम कोसल की तर्ज पर ही उनका नाम कौशल्या रखा गया था। कोसल प्रदेश से अयोध्या गई छत्तीसगढ़ की बेटी ने भगवान राम को जन्म दिया।

छत्तीसगढ़ के गांव चंद्रखुरी और आरंग में कौशल्या माता का मंदिर भी है। रायपुर जिले के इन गांवों में लोग आज भी माता कौशल्या की पूजा करते हैं। कहा जाता है कि भगवान राम ने 14 वर्ष के वनवास का बड़ा वक्त छत्तीसगढ़ में गुजारा है। चित्रकूट से निकलकर भगवान राम दंडकारण्य के घने वन में पहुंचे। इतिहासकार रमेंद्र नाथ मिश्र ने बताया कि केदार नाथ ठाकुर ने 1908 में बस्तर भूषण किताब लिखी थी। इसमें दंडकारण्य का विस्तार से वर्णन किया गया है।

शिवरीनारायण में खाए थे शबरी के जूठे बेर

रमेंद्रनाथ मिश्र के अनुसार ऐसा माना जाता है कि भगवान राम शिवरी नारायण भी आए थे। यहां उनकी भक्त शबरी रहती थी। इसी जगह पर शबरी ने भगवान राम को अपने जूठे बेर खिलाए थे। कहा जाता है कि शिवरी नारायण के बाद भगवान राम खरौद, मल्हार होते हुए महानदी के तट पर चलते हुए आगे बढ़े और धमनी, नारायणपुर होते हुए तुरतुरिया स्थित वाल्मिकी आश्रम पहुंचे। यहां से सिरपुर पहुंचकर आरंग, फिंगेश्वर के मांडव्य आश्रम पहुंचे थे। 

Posted By: Arun Kumar Singh

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