नई दिल्‍ली [जेएनएन]। आधार योजना की जब से शुरुअात हुई है, तब से ही इसे कई तरह की आशंकाओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। शुरुआत में तो यह वितरण प्रणाली व दूसरे अन्‍य केंद्रीय सहायताओं तक ही सीमित थी, लेकिन बाद में इस योजना का दायरा बढ़ता गया। अब बैंक अकांउट, मोबाइल सिम और दूसरी अन्‍य चीजों के लिए इसकी जरूरत पड़ती है। इस विस्‍तार के साथ इसकी चुनौतियां भी बढ़ती गई।

हाल ही में इसमें निजता और डेटा सुरक्षा के सवाल पर भी एक नई बहस को जन्‍म दिया है। यही वजह है कि यूआईडीएआई को ऐसे तमाम कदम उठाने पड़े हैं, जिससे आधार की सुरक्षा पूरी तरह से सुनिश्चित हो सके। इसी कड़ी में एक ताजा कदम उठा है 'फेस रिकग्निशन सिस्‍टम' का। यूआईडीएआई ने ऐलान किया है 15 सितंबर से नए सिम कार्ड लेने पर फ‍िंगर प्रिंट या दूसरी बायोमेट्रिक पहचान के साथ ही चेहरे की पहचान भी जरूरी होगी। आखिर क्‍या यूआईडीएआई की नई कवायद। आइए जानते हैं इससे उपभोक्‍ताओं को कैसे मदद मिलेगी और क्‍या होगा इसका फायदा। इसके साथ ही यह भी जानेंगे कि हम अपने डाटा को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं।

केवल आधारकार्ड पर सिम लेने वालों के साथ यह प्रक्रिया लागू

जी हां, अगर आप नया सिम कार्ड लेने की सोच रहे हैं तो डीलर के पास आपको अपने बाकी डाक्‍यूमेंट के साथ अपने चेहरे की भी पहचान करानी होगी। यूआईडीएआई ने इस नए कदम की घोषणा की है। यूआईडीएआई के मुताबिक आधार कार्ड की सुरक्षा के लिए ये नई प्रक्रिया और कड़ी है। अब फ‍िंगर प्र‍िंट या उसकी फोटो के मिलान एक अहम और जरूरी प्रक्रिया होगी। इसके तहत चेहरे का फोटो के साथ मिलान होगा। एक खासबात यह है कि अगर सिम आधार कार्ड के जरिए जारी नहीं किया जा रहा है तो ये नियम लागू नहीं होंगे। यह नियम उसी सिम के लिए जारी होगा, जिसमें सिम आधार कार्ड के जरिए लागू किया जा रहा है। हालांकि, इस प्रक्रिया की शुरुआत एक जुलाई से होनी थी। लेकिन, तकनीकी कारणाें से यह संभव नहीं हो सकी। इस प्रक्रिया से क्‍लोंनिंग रोकने में मदद मिलेगी। अगर कंपनियां इसे सख्‍ती से नहीं लागू करती तो उन्‍हें जुर्माना देना होगा।

यूआईडीएआई : डाटा सुरक्ष्‍ाा के दावे और हकीकत

यूआईडीएआई ने कई बार भरोसा दिलाया है कि अाधार सुरक्षा प्रणाली श्रेष्‍ठ अंतरराष्‍ट्रीय मानकों के अनुरूप है। और आधार डाटा पूरी तरह सुरक्षित है। इसके लिए संस्‍था ने हाल ही में कुछ अतिरिक्‍त कदम उठाए हैं।

1- हाल ही में यूआईडीएआई ने आधार बायोमेट्रिक लॉकिंग सिस्‍टम की सुविधा जारी की है, इससे आप आधार की डिटेल को लॉक और अनलॉक कर सकते हैं। यूआईडीएआई के इस कदम से आधार के दुरुपयोग को रोका जा सकता है। संस्‍था के मुताबिक बायोमेट्रिक लॉकिंग सिस्‍टम पूरी तरह से सुरक्षित है।

2- इसके अलावा संस्‍था ने आठ डिजिट के ओटीपी नंबर की सुविधा भी दी है, जिसकी मियाद केवल तीस सेंकड के लिए हाेती हे, और यूजर्स खुद अपने मोबाइल पर इसे जनरेट कर सकता है।

3- हाल ही में एक बड़ा कदम उठाते हुए यूआईडीएआई ने आधार डेटा की सुरक्षा के मद्देनजर एक साेलह अंकों वाली वर्चुअल आईडी जारी करने का फैसला किया। अाधारधारक को यह वर्चुअल आईडी आधार नंबर की जगह इस्‍तेमाल करना होगा। 

4- ये आईडी जरूरत के वक्‍त कंप्यूटर से जनरेट होगी। वर्चुअल आईडी की वजह से अपनी पहचान साबित करने के वक्‍त अधार नंबर शेयर करने की जरूरत खत्‍म हो जाएगी। यूआईडीएआई का दावा है कि इस तरह आधार आईडेंटिफिकेशन पहले से ज्‍यादा सुरक्षित हो जाएगा।

आधार का लंबा सफर

भारतीय विशिष्‍ट पहचान प्राधिकरण  (यूआईडीएआई)  एक सांविधिक प्राधिकरण है। इसे भारत सरकार की ओर से आधार वित्तीय और अन्‍य सब्सिडी लाभ और सेवाओं के लक्षित वितरण अधिनियम 2016 के तहत लाया गया, जिसे आधार अधिनियम 2016 के नाम से जाना जाता है। इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत इसकी स्‍थापना 12 जुलाई, 2016 को की गई। लेकिन इसका सफर काफी पुराना है। देश में सरकार कल्‍याण के कार्यक्रमाें पर हर साल अरबों रुपये खर्च करती है। लेकिन इसका लाभ सही शख्‍स तक पहुंचे इसके लिए आधार योजना की शुरुआत की गई।

सरकारी योजनाओं के लाभ और जनता के बीच की खाई को पाटने के लिए अाधार नंबर की कल्‍पना की गई। आधार के पीछे सुरक्षा और भ्रष्‍टाचार का मुद्दा भी जुड़ा है। इसके लिए सरकार अपने नागरिकों को पुख्‍ता पहचान सुनिश्चित करना चाहती थी। इसके लिए भारत के सभी निवासियों को अाधार नाम से एक विशिष्‍ट पहचान संख्‍या यूआईडी देने की शुरुआत हुई।

डुप्लीकेट और फर्जी पहचान समाप्‍त करना इसके बुनियादी मकसद में से एक है। सरकारी कल्‍याण योजना और सेवाओं के प्रभावी वितरण में पारदर्शिता और सुशासन को बढ़ावा देने में भी आधार प्राथ‍मिक और बेहतर विकल्‍प साबित हुआ है।

वर्ष 2006 में हुई पहल

यूपीए के शासनकाल में पहली बार विशिष्‍ठ पहचान योजना पर सबसे पहले पहल तत्‍कालीन योजना आयोग में विचार हुआ। पहली बार मार्च 2006 में संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने गरीबी रेखा के नीचे बसे परिवारों के लिए विशिष्‍ठ पहचान परियोजना को मंजूरी दी। यूआईडी पर जानीमानी आइटी कंपनी विप्रो ने  पायलट प्रोजेक्‍ट तैयार किया।

लेकिन इस दौरान सरकार राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या रजिस्‍टर और बहुउद्देशीय राष्‍ट्रीय पहचान कार्ड बनाने पर भी काम कर रही थी। लिहाजा सरकार ने दिसंबर 2006 में एक अधिकार प्राप्‍त मंत्रियों का समूह बनाया, जिसने राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या रजिस्‍टर और विशिष्‍ठ पहचान संख्‍या परियोजना की तुलना करने का काम सौंपा गया।

28 जनवरी 2008 को अधिकार प्राप्‍त म‍ंत्रियों के समूह ने एनपीआर और यूआईडीएआई के मिलान की रणनीति पर चर्चा की। आखिरकार योजना आयोग के अधीन यूआईडीएआई को स्‍थापित करने के प्रस्‍ताव को मंजूर किया । इसके बाद 4 नवंबर, 2008 को मंत्रियों के समूह ने सचिवों की सिफारिशों के आधार पर यूआईडीएआई के गठन को अंतिम मंजूरी दी। इसके लिए 28 जनवरी 2006 को योजना आयोग के संरक्षण में 115 अधिकारियों की कोर टीम के साथ एक अलग कार्यालय को अधिसुचित किया गया।

2 जुलाई 2009 को केंद्रीय मंत्री परिषद की अनुशंसा के बाद भारत सरकार ने नंदन नीलेकणी को पांच सालों के लिए यूआईडीएआई के अध्‍यक्ष के रूप में नियुक्ति का फैसला किया। इसके बाद से यूआईडीएआई भूमिका लगातार बढ़ती गई।

122 करोड़ से ज्‍यादा लोगों को आधारकार्ड जारी

यूआईडीएआई ने कई स्‍तरों पर आकंड़े एकत्र किए, लोगों के हाथों के अंगुलियों के निशान और आंख की पु‍तली जैसी बायोमेट्रीक पहचान संबंधी की जानकारी एकत्र की गई। इसके लिए देशभर में बड़ा अभियान चलाया गया। यूआइडीआई ने 29 सितंबर 2010 को महाराष्‍ट्र के नंदूरबार जिले के टेंभली गांव को आधार प्रोजेक्ट के लांच के लिए चुना। यहां के निवासी नंदूरबार को पहला आधार नंबर जारी किया। यूआईडीएआई ने हर महीने औसतन करीब एक करोड़ की दर से दिसंबर 2012 तक 25 करोड़ आधारकार्ड जारी किए।

साल 2013 के दौरान यूआईडीएआई ने हर महीने ढाई करोड़ के हिसाब से 29 करोड़ दस लाख अधार कार्ड जारी किए। 2014 से इसमें और तेजी आई। देश में फ‍िलहाल 122 करोड़ से ज्‍यादा लोगों को आधारकार्ड जारी किया जा चुका है। आधार अधिनियम 2016 के तहत यूआईडीएआई को सांविधिक दर्जा मिल चुका है। ये संस्‍था वैधानिक हो चुकी है।

 

Posted By: Ramesh Mishra