नई दिल्‍ली, विवेक ओझा। अमेरिका की प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैंसी पेलोसी (Nancy Pelosi) द्वारा ताइवान (Taiwan) की यात्र संपन्न होने के कुछ ही घंटों के भीतर चीन (China Taiwan Tension) ने अपने 27 युद्धक विमान ताइवान के ‘एयर डिफेंस जोन’ (Taiwan Air Defence) में भेज दिए हैं। इतना ही नहीं, नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा (Nancy Pelosi Taiwan Visit) के विरोध में चीन ने ताइवान से कई वस्तुओं और फलों समेत अनेक खाद्य पदार्थों के आयात पर प्रतिबंध भी लगा दिया है। नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्र आखिर क्यों सुर्खियों में है और ऐसी क्या आशंकाएं पैदा हुई हैं, जिससे चीन और अमेरिका (US on Taiwan) के बीच तनाव बढ़ता दिख रहा है, जिसके वैश्विक आर्थिकी (World Economy) के दुष्प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है।

हाल ही में ताइवान की यात्र पर पहुंचीं अमेरिका की प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैंसी पेलोसी चीनी साम्राज्यवादी और उसकी आक्रामक नीतियों के खिलाफ काफी मुखर रही हैं। दलाई लामा से उनके संपर्कों के चलते भी चीन उनकी गतिविधियों के प्रति सतर्क रहा है। वर्ष 2008 में नैंसी पेलोसी ने हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला की यात्र की थी जिस दौरान उन्होंने दलाई लामा से मुलाकात भी की थी। ऐसा माना जाता है कि नैंसी पेलोसी और दलाई लामा के बीच नजदीकी को चीन पसंद नहीं करता।

कानून निर्माता और हाउस स्पीकर के रूप में नैंसी ने कई बार तिब्बत के धर्मगुरु की प्रशंसा की है और एक्टर रिचर्ड गेर के साथ मिलकर तिब्बत के मुद्दे पर जागरूकता बढ़ाने के लिए भी काम किया है। वहीं यह सर्वविदित है कि चीन तिब्बत को भी अपना अभिन्न अंग मानता है और उसकी आजादी और अधिक स्वायत्तता से जुड़े प्रयासों को नापसंद करता है। तिब्बत में किसी भी प्रकार की जागरूकता, अधिकार आधारित आंदोलन बढ़ाने की बात को वह अलगाववादी मुद्दे के रूप में देखता है। इसलिए चीन यह चाहता रहा है कि अमेरिकी कानून निर्माता और राजनयिक तिब्बत की आजादी के मुद्दों को हवा देने से दूर रहें।

गौरतलब है कि नैंसी पेलोसी के विधायी जिले सैन फ्रांसिस्को में करीब 32 प्रतिशत आबादी एशियाई लोगों की है जिसमें ताइवान और तिब्बत मूल के भी लोग रहते हैं। नैंसी पेलोसी आत्म निर्धारण के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर भाषण देती रही हैं जिसे चीन संदेह की नजरों से देखता है। वर्ष 1991 में जब नैंसी पेलोसी अपने राजनीतिक करियर के शुरुआती दौर में थीं, तब उन्होंने एक कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल के साथ चीन की यात्र की थी। इस दौरान उन्होंने कुछ जगहों पर लोकतंत्र के समर्थन में बैनर्स लहराए थे और मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित मामलों पर चीन का विरोध किया था। इस प्रकार नैंसी की चीन विरोधी सक्रियता उसे खटकती रही है।

ताइवान पर अमेरिकी नीति

ताइवान मुद्दे पर अमेरिका ‘वन चाइना पालिसी’ का समर्थन करता रहा है। उसकी वन चाइना पालिसी ‘सामरिक दुविधा’ (स्ट्रेटेजिक एंबिग्युटी) के रूप में विश्व समुदाय में देखी गई है जिसका मतलब है कि एक तरफ अमेरिका ताइवान को चीन का हिस्सा मानता है, वहीं वह ताइवान की सुरक्षा और उसे समर्थन देने के लिए भी वचनबद्ध है। अमेरिका और ताइवान के बीच हो चुके ताइवान डिफेंस पैक्ट में कहा गया है कि यदि बीजिंग ताइवान को बलपूर्वक लेने की कोशिश करता है तो अमेरिका ताइवान को सुरक्षा सहयोग देगा।

इंडो पैसिफिक के लिए अहम

ताइवान पूर्वी एशिया में स्थित एक ऐसा देश है जिसकी सामरिक भौगोलिक स्थिति चीन और अमेरिका दोनों की ही महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए जरूरी है। चूंकि ताइवान दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर के संधि स्थल पर स्थित है, इस लिहाज से यह इंडो पैसिफिक की सुरक्षा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दरअसल दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों और ताइवान सहित अन्य सभी ऐसे देश इंडो पैसिफिक की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं जो अपने समुद्री क्षेत्रों में चीन के युद्धपोतों या उसके कृत्रिम द्वीपों के निर्माण के प्रयासों का विरोध करते हैं, जो इस बात का विरोध करते हैं कि उनके अनन्य आर्थिक क्षेत्र में हस्तक्षेप करके उनके अधिकार वाले प्राकृतिक गैस, तेल, खनिज संसाधन और मत्स्य संसाधन के भंडारों पर चीन निगाह नहीं रख सकता।

इंडो पैसिफिक की सुरक्षा के मद्देनजर ताइवान का जिक्र इसलिए आता है, क्योंकि वहां लोकतंत्र के प्रसार और मानवाधिकार के संरक्षण का समर्थन अमेरिका जैसे देश खुलकर करते हैं। ताइवान में चीन द्वारा अवैध एयर डिफेंस आइडेंटिफिकेशन जोन बनाना ‘फ्री एंड ओपन इंडो पैसिफिक स्ट्रेटजी’ का उल्लंघन है। यही कारण है कि नैंसी पेलोसी ने कहा, ‘आज विश्व डेमोक्रेसी और आटोक्रेसी के बीच किसी एक को चुनने की चुनौती का सामना कर रहा है।’ आटोक्रेसी से उनका आशय चीन जैसे अधिनायवादी सोच के राष्ट्रों से था।

नैंसी ने साफ तौर पर कहा है कि अमेरिका ताइवान सहित दुनिया के अन्य क्षेत्रों में लोकतंत्र के संरक्षण के लिए दृढ़ निश्चय कर चुका है। नैंसी का कहना था कि एक निरंकुश एकतंत्रीय शासन और सोच वाला चीन ‘वन चाइना पालिसी’ के तहत ताइवान के प्रतिनिधियों को संयुक्त राष्ट्र, विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों में सहभागिता करने से तो रोक रहा है, लेकिन वह विदेशी नेताओं को ताइवान भ्रमण से नहीं रोक सकता। संदेश साफ था कि भले ही चीन ताइवान को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता न दे और देशों को भी इस काम के लिए तैयार करे और ताइवान को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता न लेने दे, लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगी देश ताइवान की संप्रभुता और अखंडता को इंडो पैसिफिक की सुरक्षा और अखंडता के प्रश्न से जोड़कर चीन के मंसूबे पूरे नहीं होने देंगे।

अमेरिका ताइवान को एक लीडिंग डेमोक्रेसी और टेक्नोलाजिकल पावरहाउस मानता है। अमेरिका ने माना है कि ताइवान इंडो पेसिफिक में उसका एक पार्टनर है। वैसे अमेरिका का ताइवान के साथ कूटनीतिक संबंध नहीं है, लेकिन दोनों के बीच एक मजबूत अनौपचारिक संबंध है। अमेरिका का मानना है कि दोनों देश साझे मूल्यों और लाभप्रद वाणिज्यिक आर्थिक संबंधों को साझा करते हैं। वैसे अमेरिका ताइवान की स्वतंत्रता का समर्थन नहीं करता है, लेकिन वह चाहता है कि ताइवान से संबंधित विवादित मामलों का शांतिपूर्ण समाधान किया जाए। ताइवान रिलेशंस एक्ट के जरिए ही अमेरिका ताइवान को पर्याप्त आत्म सुरक्षा क्षमता देने के लिए प्रतिरक्षा उपकरणों की आपूर्ति करता है, उसे हथियार बेचता है। ‘अमेरिकन इंस्टीट्यूट इन ताइवान’ वैसे ही सिटीजन और कांस्युलर सेवाओं को प्रदान करता है जैसे डिप्लोमेटिक मिशन के जरिए प्रदान किया जाता है।

ताइवान-अमेरिका आर्थिक संबंध

ताइवान की आर्थिकी बहुत उन्नत है जिसने वर्ष 2021 में 786 अरब डालर मूल्य की वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन किया है। अमेरिका और ताइवान के बीच मजबूत व्यापारिक संबंध हैं। दोनों के बीच इकोनमिक प्रोस्पेरिटी पार्टनरशिप डायलाग होता है। ताइवान अमेरिका का आठवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और अमेरिका ताइवान का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। अमेरिका ने 2019 में ताइवान में जिन वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात किया था उसके चलते लगभग दो लाख अमेरिकी रोजगार का सृजन हुआ था। वर्ष 2020 में ताइवान का अमेरिका में कुल निवेश 137 अरब डालर था।

ताइवान अमेरिका में विनिर्माण, होलसेल ट्रेड और डिपाजिटरी इंस्टीट्यूशंस में प्रत्यक्ष निवेश करता है। ताइवान और अमेरिका दोनों ही कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सदस्य हैं जैसे वल्र्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन, एशिया पैसिफिक इकोनमिक फोरम और एडीबी। वर्ष 2015 में अमेरिकन इंस्टीट्यूट इन ताइवान और ताइपे इकोनामिक एंड कल्चरल रिप्रेजेंटेटिव आफिस ने ‘ग्लोबल कोआपरेशन एंड ट्रेनिंग फ्रेमवर्क’ का गठन किया था जो कि ताइवान के विश्व स्तर पर तकनीकी विशेषज्ञता का प्रदर्शन करने का एक प्लेटफार्म है। इस प्लेटफार्म के तहत ताइवान और उसके पार्टनर सार्वजनिक स्वास्थ्य, सप्लाइ चैन, ऊर्जा, महिला अधिकार और आपदा राहत के क्षेत्र में तकनीकी प्रशिक्षण उपलब्ध कराते हैं। वर्ष 2019 में जापान इस फ्रेमवर्क का वैश्विक साङोदार बना और 2021 में आस्ट्रेलिया को भी इसमें शामिल कर लिया गया है।

भविष्य में ताइवान पर यदि चीन का कब्जा हो जाता है तो सीधा खतरा अमेरिका के लिए होगा। गुआम और हवाई द्वीप की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि इससे वहां पर मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने सीधे चीन के निशाने पर आ जाएंगे। पश्चिमी प्रशांत महासागर में चीन को खुला रास्ता भी मिल सकता है, जो सीधे तौर पर अमेरिकी हितों को दुष्प्रभावित करेगा। इसीलिए अमेरिका ताइवान का समर्थन करता रहता है और उसे सैन्य सहायता से लेकर कूटनीतिक मदद तक करता है।

Edited By: Tilakraj