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हाउस वाइफ हो सकती हैं तो 'हाउस हसबैंड' क्यों नहीं? घर संभालने वाले पुरुषों के लिए मद्रास HC की बड़ी टिप्पणी

Published: Fri, 25 Sep 2026 06:22 PM (IST)

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने एक डॉक्टर दंपति के तलाक मामले में 'हाउस हसबैंड' की अवधारणा को सामान्य ...और पढ़ें

तलाक मंजूर करते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने की बड़ी टिप्पणी

तलाक मंजूर करते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने की बड़ी टिप्पणी

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डिजिटल डेस्क, चेन्नई। मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने एक डॉक्टर दंपति के विवाह को आपसी सहमति से समाप्त करते हुए समाज में लैंगिक भूमिकाओं पर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि 'हाउस हसबैंड' की अवधारणा को अब एक सामान्य बात माना जाना चाहिए।

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि घर और परिवार की देखभाल करने वाले व्यक्ति, चाहे वह महिला हो या पुरुष, के काम का एक बड़ा आर्थिक मूल्य होता है।

क्या था मामला?

जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन और जस्टिस एम. डी. सुमति की पीठ ने यह फैसला सुनाया। यह मामला पुडुचेरी में कार्यरत दो डॉक्टरों से जुड़ा था, जिनकी शादी 2011 में हुई था। शादी के बाद जब पति अपनी उच्च चिकित्सा शिक्षा (MD और DM कार्डियोलॉजी) पूरी कर रहा था, तब पत्नी ने अपने करियर को पीछे छोड़कर बच्चों और परिवार की पूरी जिम्मेदारी उठाई।

हालांकि, पति के पेशेवर रूप से सफल होने के बाद दोनों के बीच मतभेद गहरा गए और वे बीते पांच वर्षों से अधिक समय से अलग रह रहे थे।

'होममेकर' शब्द जेंडर-न्यूट्रल है

मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने पुरुष अहम् और परिवार में घरेलू जिम्मेदारियों के महत्व पर गंभीर चर्चा की। कोर्ट ने पाया कि पति अपनी पढ़ाई के दौरान पारिवारिक व्यवस्था से पूरी तरह सहज था, लेकिन सफल पेशेवर बनते ही उसमें पुरुष अहंकार हावी हो गया। जो व्यवस्था एक दशक तक सही चली, उसे बाद में अस्वीकार कर दिया गया।

पीठ ने कहा, अगर 'हाउस वाइफ' (घर संभालने वाली महिला) हो सकती हैं, तो हाउस हसबैंड भी हो सकते हैं। इसे एक नई सामान्य बात बनने दें। इससे शादी और परिवार की संस्था को बचाए रखने में मदद मिलेगी।

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि होममेकर (घर संभालने वाला) शब्द किसी एक जेंडर तक सीमित नहीं है। परिवार की देखभाल में बिताया गया समय और त्याग बेहद मूल्यवान होता है।

जब पति अपने करियर को बनाने में ध्यान दे रहा था, तब पत्नी की पेशेवर क्षमताएं परिवार की खातिर सीमित रह गईं।

हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला

अदालत ने माना कि शादी इस हद तक टूट चुकी है कि इसे बहाल करना संभव नहीं है। फैमिली कोर्ट के पुराने आदेश को रद करते हुए हाई कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B के तहत आपसी सहमति से तलाक की मंजूरी दी और मुकदमे के लंबे समय से लंबित होने के कारण 6 महीने की कूलिंग-ऑफ अवधि को माफ कर दिया।

अदालत ने पति द्वारा पत्नी और बच्चों को कुल 2.5 करोड़ रुपये का वित्तीय मुआवजा देने की शर्त पर तलाक का आदेश जारी किया है।

पत्नी के लिए मुआवजा: पति को आदेश मिलने के तीन महीने के भीतर पत्नी के बैंक खाते में 1.5 करोड़ रुपये जमा कराने होंगे।

बच्चों के नाम फिक्स्ड डिपॉजिट: अगले एक वर्ष के भीतर दोनों नाबालिग बच्चों के नाम 50-50 लाख रुपये सावधि जमा (FD) के रूप में जमा करने होंगे।

ब्याज और निकासी का अधिकार: पत्नी को बच्चों की जमा राशि पर मिलने वाला ब्याज हर छह महीने में निकालने का अधिकार होगा, ताकि उनका पालन-पोषण हो सके। बच्चे बालिग होने पर अपनी मूल राशि निकाल सकेंगे।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक की डिक्री तभी लागू मानी जाएगी जब पति इन सभी आर्थिक शर्तों और वित्तीय जिम्मेदारियों को पूरी तरह से निभा देगा।