जेब पर भारी इलाज... कंज्यूमेबल्स के नाम पर 2841 प्रतिशत तक ज्यादा वसूल रहे अस्पताल
अस्पतालों द्वारा थोक मूल्य से कई गुना अधिक कीमत पर मेडिकल डिवाइस और कंज्यूमेबल्स बेचे जाने से मरीजों की जेब पर भारी बोझ बढ़ रहा है।

अस्पताल के बिलों का सबसे बड़ा सच (एआई से बनाई गई सांकतिक तस्वीर)
HighLights
अस्पताल मेडिकल उपकरणों पर थोक दाम से कई गुना ज्यादा वसूल रहे।
महाराष्ट्र एफडीए रिपोर्ट ने मेडिकल डिवाइस मूल्य नियंत्रण की मांग की।
आईवी सेट, सिरिंज, पेसमेकर पर भारी मुनाफाखोरी उजागर हुई।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। जब हम अस्पताल में इलाज कराते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान डॉक्टर की फीस, बेड चार्ज और महंगी दवाइयों पर जाता है। लेकिन अस्पताल के बिल का एक ऐसा हिस्सा भी होता है, जिस पर आमतौर पर किसी की नजर नहीं जाती और वह है इलाज के दौरान इस्तेमाल होने वाले कन्वेएबल्स और मेडिकल डिवाइसेज यानी सिरिंज, आईवी सेट और दिल के ऑपरेशन में लगने वाले उपकरण।
कुल मिलाकर अस्पताल के भारी-भरकम बिलों का एक ऐसा छिपा हुआ और चौंकाने वाला सच सामने आया है, जो सीधे तौर पर आम मरीजों की जेब पर भारी पड़ रहा है।
कमाया जा रहा भारी मुनाफा
इस बात को ऐसे समझिए कि थोक बाजार में महज 11 रुपये में मिलने वाला आईवी (IV) इन्फ्यूजन सेट अस्पतालों में 325 रुपये की भारी-भरकम एमआरपी पर बेचा जा रहा है, जबकि 7 रुपये से कम की डिस्पोजेबल सिरिंज का दाम करीब 60 रुपये वसूला जाता है। यही नहीं, पेसमेकर और हार्ट वाल्व जैसे जीवनरक्षक हाई-एंड मेडिकल उपकरणों पर तो यह मुनाफा आयात मूल्य से 10 से 30 गुना तक अधिक होता है।
बता दें कि ये पूरा मामला चर्चा में तब आया, जब हाल ही में महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) की एक रिपोर्ट ने इस छिपे हुए सच से पर्दा उठाया और केंद्र सरकार से इस मामले में दखल की मांग की।
थोक दाम और MRP में आसमान-जमीन का फर्क
इस बात में अब कोई दोहराई नहीं है कि आंकड़े चौंकाने वाले हैं कि कैसे आम मरीजों की जेब पर मेडिकल उपकरणों के नाम पर डाका डाला जा रहा है। इस बात को ऐसे समझिए कि जो आईवी सेट थोक बाजार में महज 11 रुपये में मिलता है, उस पर अस्पताल की पर्ची या बिल में 325 रुपये तक की एमआरपी वसूल ली जाती है।
जो सिरिंज 7 रुपये से भी कम कीमत में उपलब्ध होती है, उसका बिल मरीजों से करीब 60 रुपये तक वसूला जाता है। इतना ही नहीं यह खाई और भी ज्यादा गहरी तब हो जाती है जब बात पेसमेकर, हार्ट वाल्व और आंखों के लेंस जैसे महंगे उपकरणों की आती है। इनका अंतिम एमआरपी आयात मूल्य से 10 से 30 गुना तक ज्यादा होता है।
अब समझिए विवाद की असली जड़ क्या है?
पहले इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि ये सवाल आज का नहीं है। यह सवाल पिछले 15 सालों से बार-बार उठ रहा है कि आखिर मेडिकल डिवाइस की कीमत तय कौन करता है, निर्माता, अस्पताल या सरकार?
ऐसे में हाल ही में महाराष्ट्र एफडीए कमिश्नर तुकाराम मुंडे ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को उठाते हुए बताया कि यह समस्या एक 'संरचनात्मक नियामकीय कमी' है। 'ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013' के तहत तयशुदा दवाइयों की कीमतें सीमित हैं। लेकिन दूसरी ओर अधिकांश मेडिकल डिवाइस और कंज्यूमेबल्स इस दायरे से बाहर हैं। इसका मतलब है कि इनकी कीमत और इनसे जुड़ी जानकारी लगभग पूरी तरह से अनियंत्रित और अनमाॅनिटर्ड हैं।
इंडस्ट्री का क्या कहना है?
गौर करने वाली बात यह है कि इस मुद्दे पर घरेलू और बहुराष्ट्रीय कंपनियां दो अलग-अलग धड़ों में बंटी हुई हैं। घरेलू निर्माताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन AiMeD के राजीव नाथ का कहना है कि मौजूदा नियम मेडिकल डिवाइस की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए नाकाफी हैं।
उन्होंने सुझाव दिया है कि सिरिंज और आईवी सेट जैसे आम उपकरणों पर ट्रेड मार्जिन 75% और पेसमेकर जैसे महंगे उपकरणों पर 50% तक सीमित कर देना चाहिए। उनका आरोप है कि जो अस्पताल एमआरपी 10 से 30 गुना बढ़ाकर वसूलते हैं, वे बाजार में नैतिक रूप से काम करने वाली कंपनियों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनी का तर्क भी समझिए
दूसरी ओर, एमएनसी का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन ने महाराष्ट्र एफडीए कमिश्नर की इस मांग का समर्थन किया है कि ट्रेड मार्जिन का युक्ततीकरण किया जाना चाहिए और खरीद मूल्य व एमआरपी के बीच का अंतर तय करने के लिए स्पष्ट गाइडलाइन्स आनी चाहिए।
