नई दिल्‍ली। स्ट्रोक का सामना कर चुके मरीजों में इसके तुरंत बाद डिमेंशिया का खतरा उन लोगों की तुलना में लगभग दोगुना हो जाता है जो कभी स्ट्रोक से पीड़ित नहीं हुए। डिमेंशिया के कारण व्यक्ति की याददाश्त चली जाती है जिससे वह रोजमर्रा के अपने काम भी नहीं कर पाता। स्ट्रोक के कारण होने वाले डिमेंशिया को वेस्कुलर डिमेंशिया कहते हैं। यह दूसरा सबसे आम और खतरनाक प्रकार का डिमेंशिया है। स्ट्रोक के अलावा अन्य कारणों से भी व्यक्ति में इस मानसिक बीमारी के लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। पहले के शोधों में स्ट्रोक और उससे होने वाले डिमेंशिया के खतरे का अनुमान लगाया जा चुका है। लेकिन प्रत्येक शोध में लगाया गया अनुमान भिन्न रहा है। ऐसा पहली बार है जब वैज्ञानिकों ने स्ट्रोक के तुरंत बाद डिमेंशिया का खतरा बढ़ने का सटीक पता लगाया है। इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने पहले होचुके 48 अध्ययनों का विश्लेषण किया। ये अध्ययन दुनियाभर के करीब 32 लाख लोगों पर किए गए।

खतरे का पूर्वानुमान लगाना संभव

डिमेंशिया के खतरे का पूर्वानुमान लगाना संभव हो सकेगा। शोधकर्ताओं ने एक ऐसे जीन की पहचान की है, जिससे इस रोग का 10 साल पहले ही अनुमान लगाया जा सकता है। डेनमार्क की कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार, एपोलिपोप्रोटीन ई (एपीओई) जीन से डिमेंशिया के खतरे का अनुमान लगाया जा सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि एक तिहाई डिमेंशिया मामलों की रोकथाम हो सकती है। उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, मोटापा, अवसाद और सुनने की समस्या का प्रारंभिक अवस्था में ही इलाज करने से इस खतरे से बचाव हो सकता है।

क्या है डिमेंशिया

डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की याददाशत कमजोर हो जाती है। वे अपने दैनिक कार्य ठीक से नहीं कर पाते। कभी-कभी वे यह भी भूल जाते हैं कि वे किस शहर में हैं, या कौन सा साल या महीना चल रहा है। साल दर साल डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की स्थिति अधिक खराब होती जाती है, और बाद की अवस्था में उन्हें साधारण से साधारण काम में भी परेशानी होने लगती है। जैसे कि चल पाना, बात करना या खाना ठीक से चबाना और निगलना। उपचार से मरीज को लाभ हो सकता है, लेकिन उसे पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता।

डिमेंशिया बीमारी दिमाग के कुछ खास सेल्स नष्ट होने से होती है। इन सेल्स के नष्ट होने से दिमाग के भीतर के अन्य सेल्स आपस में संचार नहीं कर पाते, जिससे सोचने की शक्ति कम होती है, व्यवहार और अनुभूतियों में दिक्कत आती है। ऐसे लोग अक्सर काम करने के बीच में ही भूल जाते हैं कि वे क्या कर रहे थे। चीजों को रखकर भूल जाते हैं, लोगों के नाम भूल जाते हैं, समय-तारीख और कहां जा रहे हैं, ये तक भूलने लगते हैं।

मेल-जोल बढ़ाने से कम होता है खतरा

सामाजिक मेल-जोल बढ़ाने के लिए मात्र 10 मिनट देने से डिमेंशिया के मरीज को राहत मिल सकती है। यह बात एक नवीन में सामने आई है। इसमें बताया गया है कि इन मरीजों को केयर होम स्टाफ रोजाना औसतन दो मिनट ही दे पाता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, न केवल इस समय में बल्कि स्टाफ के व्यवहार में सुधार के लिए उनके दबाव को भी कम करने की जरूरत है, जिससे वे कार्य को बेहतर ढंग से अंजाम दे सकें।

इनके खाने से भी कम होता है खतरा

अपने भोजन में गेंहूं का खासतौर पर समावेश करें। यह न सिर्फ कोशिकाओं के निर्माण में सहायक है, बल्कि सेहत के लिए भी काफी अच्छा होता है। इसके आलावा बादाम, काजू और अखरोट एंटीऑक्सीडेंट और जरूरी फैटी एसिड से भरपूर होते है। मछली प्रोटीन और कैल्सियम से भरपूर होती है, जिससे मस्तिष्क का विकास होता है। खासकर सैमन और ट्यूना मछली खाना ज्यादा फायदेमंद रहता है। बिना चर्बी वाला बीफ आइरन, विटामिन बी12 और जिंक का अच्छा स्रोत होता है। यह याददास्त बढ़ाने के साथ-साथ मस्तिष्क का भी विकास करता है।

ब्लूबेरी में बड़ी मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो फ्री रेडिकल्स से कोशिकाओं को होने वाले नुकसान से बचाते हैं। साथ ही यह फल शरीर की कोशिकाओं और उम्र के बीच संतुलन भी बनाता है। ये फल हृदय रोग और मानसिक रोग के खतरे को कम करने में अहम भूमिका निभाता है। माटर लाइकोपेन से भरपूर होता है। ये न सिर्फ शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने से बचाता है, बल्कि अल्जाइमर के खतरे को भी कम करता है। ब्रोकली में विटामिन के सहित ढेरों पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो मस्तिष्क की शक्ति बढ़ाने में मददगार होते हैं। अंडे में विटामिन बी12 और कोलाइन प्रचूर मात्रा में पाए जाते हैं। यह मस्तिष्क की कोशिकाओं का निर्माण करता है, जिससे याददास्त बढ़ती है।  

Posted By: Kamal Verma