नेपाल त्रासदी से भी बड़ी तबाही का डर... पूरे हिमालय पर मंडरा रहा आपदा का खतरा, वैज्ञानिकों ने चेताया
तिब्बत में ग्लेशियर ढहने और नेपाल में आई बाढ़ के बाद वैज्ञानिकों ने पूरे हिमालय क्षेत्र में बड़ी आपदा की ...और पढ़ें

हिमालय पर मंडरा रहा आपदा का खतरा
HighLights
हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे, पर्माफ्रोस्ट अस्थिर हो रहा है।
भूस्खलन, ग्लेशियल झील फटने और विनाशकारी बाढ़ का खतरा बढ़ा।
आपदाओं से निपटने को निगरानी, डेटा साझाकरण और सहयोग जरूरी।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। तिब्बत में ग्लेशियर ढहने और उसके बाद नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे हिमालय क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। विज्ञानियों का कहना है कि यह किसी एक देश तक सीमित समस्या नहीं है। हिंदुकुश हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और लंबे समय से जमी जमीन यानी पर्माफ्रोस्ट भी अस्थिर हो रही है।
इससे भूस्खलन, ग्लेशियल झीलों के फटने और अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है। इस पूरे क्षेत्र में करीब 200 करोड़ लोग रहते हैं।
26 अगस्त की नेपाल और तिब्बत की आपदा के तीन सप्ताह बाद तक करीब 8,000 लोगों के मारे जाने या लापता होने की बात सामने आई है। विशेषज्ञों ने हिमालयी देशों से साझा पहाड़ों और नदियों की निगरानी बढ़ाने, डाटा साझा करने तथा समय रहते चेतावनी और सुरक्षित स्थानों पर लोगों को पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत करने की अपील की है।
नार्वे सरकार की शोध विज्ञानी मिरियम जैक्सन के अनुसार, क्रायोस्फीयर यानी धरती के जमे हुए हिस्से में बहुत तेजी से बदलाव हो रहा है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सीमाओं से परे आंकड़ों और सूचनाओं का आदान-प्रदान बढ़ाना जरूरी है, क्योंकि आने वाले समय में ऐसी आपदाएं और देखने को मिल सकती हैं।
40 हजार ग्लेशियर, निगरानी सिर्फ 21 की
पर्यावरण सलाहकार संस्था ‘सिस्टेमिक’ की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र में करीब 40,000 ग्लेशियर हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ 21 की ही पर्याप्त निगरानी हो रही है। यह विशाल पर्वतीय क्षेत्र अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, म्यांमार, नेपाल और पाकिस्तान तक फैला है।
विज्ञानियों के अनुसार जलवायु परिवर्तन इस पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। 2023 की एक रिपोर्ट में पाया गया था कि 2010-19 के दौरान हिंदुकुश हिमालय के ग्लेशियर पिछले दशक की तुलना में 65 प्रतिशत ज्यादा तेजी से पिघले। इससे भी चिंताजनक बात यह है कि अगर वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित भी रखा जाए, तब भी इस सदी के अंत तक हिंदुकुश हिमालय के करीब एक-तिहाई ग्लेशियर खत्म हो सकते हैं।
भारत की 200 ग्लेशियल झीलों पर खतरा‘सिस्टेमिक’ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 200 ग्लेशियल झीलों के किनारों के टूटने का खतरा अधिक है। इनमें 56 झीलें बेहद संवेदनशील श्रेणी में हैं। उत्तराखंड में 2021 में और सिक्किम में 2023 में ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं।
विज्ञानियों का कहना है कि हर ग्लेशियर की निगरानी करना संभव नहीं है। इसलिए उन क्षेत्रों को प्राथमिकता देनी होगी, जहां ग्लेशियरों के नीचे बड़े बांध, कस्बे या गांव हैं। उपग्रहों, जमीन पर लगाए गए सेंसर और रडार इंटरफेरोमेट्री जैसी तकनीकों से पहाड़ों की हलचल, हिमस्खलन और ग्लेशियल झीलों के फटने के संकेत पहले ही मिल सकते हैं।
माउंटेन हाइड्रोलाजिस्ट वाल्टर इमर्जील के मुताबिक निगरानी को ऐसे ‘हाट स्पाट’ पर केंद्रित करना ज्यादा व्यावहारिक होगा। हालांकि दुर्गम भूभाग और निगरानी की ऊंची लागत बड़ी चुनौती है।
काठमांडू स्थित रेड क्रास रेड क्रिसेंट क्लाइमेट सेंटर के सलाहकार माधव उप्रेती के मुताबिक 26 अगस्त की आपदा इतनी बड़ी थी कि मौजूदा निगरानी और चेतावनी व्यवस्था उसका समय रहते पता लगाने में सक्षम नहीं थी।
इंटरनेशनल कमीशन आन लार्ज डैम्स के अध्यक्ष देवेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि हिमालयी देशों के बीच तत्काल बेहतर सहयोग की जरूरत है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं मानता।
मिरियम जैक्सन ने कहा कि विज्ञानी वर्षों से ऐसी आपदा की संभावना की चेतावनी देते रहे हैं। समस्या यह है कि यह पता नहीं होता कि अगली बड़ी घटना कब होगी।
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