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बिहार का अनुभव और नियमों में बदलाव... SIR के तहत वोटरों को बड़ी संख्या में क्यों भेजे गए नोटिस? सामने आई वजह

Published: Mon, 21 Sep 2026 08:49 AM (IST)

चुनाव आयोग द्वारा स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के तहत वोटरों को बड़ी संख्या में भेजे गए नोटिसों की मुख्य वजह नियमों में किया गया बदलाव है।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (एआई द्वारा निर्मित फोटो।)

तस्वीर का इस्तेमाल प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (एआई द्वारा निर्मित फोटो।)

HighLights

  1. चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) नियमों में किया बदलाव।

  2. दस्तावेज़ जमा करने की अनिवार्यता हटाकर एल्गोरिथम मैपिंग शुरू की।

  3. त्रुटियों पर स्वतः नोटिस जारी, प्रणाली निष्पक्ष और पारदर्शी।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के तहत वोटरों को बड़ी संख्या में जो नोटिस भेजे गए हैं, इसकी मुख्य वजह चुनाव आयोग की ओर से एसआईआर के नियमों में किया गया एक अहम बदलाव है। यह बदलाव बिहार में एसआईआर के पहले चरण के अनुभव के आधार पर किया गया था।

बिहार में एसआईआर के दौरान नियमों के तहत वोटर्स को एन्यूमरेशन (गिनती) के चरण में ही वोटर लिस्ट में शामिल होने की अपनी योग्यता साबित करने वाले दस्तावेज लगाने होते थे। जन्म, नागरिकता और निवास के सबूत के तौर पर एक दर्जन से ज्यादा दस्तावेजों को मंजूरी दी गई थी।

चुनाव आयोग ने किया नियमों में बदलाव

हालांकि, उन वोटरों को हुई परेशानी पर हुए हंगामे के बाद (जिनके पास ये डॉक्यूमेंट्स नहीं थे और इस वजह से उन्हें लिस्ट से बाहर किए जाने का खतरा था) चुनाव आयोग ने 12 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में होने वाले दूसरे चरण के लिए नियमों में बदलाव किया। उन्होंने एन्यूमरेशन फॉर्म (EF) के साथ डॉक्यूमेंट्स जमा करने की जरूरत को खत्म कर दिया और इसके बजाय पिछले एसआईआर की वोटर लिस्ट के साथ वोटरों की मैपिंग करने का फैसला किया।

मैपिंग में इनबिल्ट एल्गोरिदम का इस्तेमाल होता है जो पिछली वोटर लिस्ट और एन्यूमरेशन फॉर्म के बीच लॉजिकल अंतर का पता लगाते हैं और उसी के आधार पर अपने-आप नोटिस जारी किए जाते हैं।

चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने बताया, “गड़बड़ी का पता लगाने वाला सॉफ्टवेयर निष्पक्ष है और वीआईपी और आम आदमी के बीच कोई फर्क नहीं करता। चुनाव आयुक्त एसएस संधू को भी गड़बड़ी के कारण नोटिस मिला क्योंकि एक जगह उनका नाम S S Sandhu और दूसरी जगह Sukhbir Singh Sandhu लिखा था। यह बात साबित करती है कि सिस्टम निष्पक्ष है।”

और क्या वजह सामने आई?

उन्होंने आगे कहा, "इतनी बड़ी संख्या में नोटिस मिलना दिल्ली जैसे शहरी इलाकों में ही ज्यादा देखा गया है, जहां शायद वोटरों ने ईएफ भरते समय थोड़ी लापरवाही बरती हो। साथ ही बीएलओ अगर गिनती के चरण में ही फॉर्म की जांच ज्यादा सावधानी से करते तो उन कमियों को कम किया जा सकता था जिनकी वजह से ये नोटिस जारी करने पड़े।"

अगर कोई व्यक्ति बूथ लेवल ऑफिसर के तीन बार घर आने और राजनीतिक पार्टियों के बूथ लेवल एजेंट की जांच के बावजूद इलेक्टोरल फॉर्म जमा नहीं करता है तो माना जाता है कि वह वहां नहीं रहता, कहीं और चला गया है, उसकी मौत हो गई है या वह डुप्लीकेट वोटर है। ऐसे में उसका नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में शामिल नहीं किया जाता। अगर मिले हुए ईएफ अधूरे होते हैं या उनमें गलत जानकारी होती है तो नोटिस जारी किए जाते हैं।

कैसे हटता है वोटर लिस्ट से नाम?

अधिकारी ने बताया कि नोटिस की वजह से शायद ही कभी किसी वोटर का नाम लिस्ट से हटाया जाता है। जैसे ही वोटर गड़बड़ी को ठीक करने वाला सबूत पेश करता है, मामला सुलझा लिया जाता है।

एक अधिकारी ने कहा, “बिना सुनवाई के किसी भी वोटर का नाम नहीं हटाया जाता। सुनवाई के बाद एक लिखित आदेश (स्पीकिंग ऑर्डर) जारी किया जाता है। फाइनल वोटर लिस्ट पब्लिश होने के बाद इस आदेश को पहले डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर और फिर चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर के सामने चुनौती दी जा सकती है।”

अधिकारी ने आगे कहा, “इसके अलावा वोटर लिस्ट में दोबारा नाम जुड़वाने का विकल्प हमेशा खुला रहता है। जिस किसी का नाम छूट गया है वह कभी भी अपने मोबाइल पर डिक्लेरेशन के साथ फॉर्म 6 भरकर वोटर लिस्ट में अपना नाम वापस जुड़वा सकता है।”

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