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औरंगाबाद, मनीष कुमार। यह कहानी है दिव्यांग पिता की मेहनत और नवयुवा पुत्र की मेधा की। स्वतंत्रता के सारथी-2 पिता ने जिद पाली, बेटे ने जुनून, दे दी गरीबी को मात और अब कामयाबी की राह निकल चली है। औरंगाबाद के एक छोटे से गांव में दूध बेचकर परिजनों का भरण-पोषण करने वाले वेंकटेश पांडेय का होनहार पुत्र अंकित आइआइटी दिल्ली तक पहुंच चुका है। पिता के संघर्ष और पुत्र की सफलता की यह कहानी अब दूसरों को भी कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरणा दे रही। 

पिता वेंकटेश ने पाली थी जिद
औरंगाबाद जिला में नक्सल प्रभावित खुदवां थाना अंतर्गत एक गांव कलेन है। उसी में वेंकटेश पांडेय का घरौंदा। बीत्ता भर जमीन पर खेती-किसानी और घर में रंभाती हुई गायें। आजीविका का यही साधन है। खेत से कुछ धान-गेहूं मिल जाता है और बाकी के खर्च के लिए गायों का दूध। वेंकटेश घर-घर दूध बेचते हैं, फिर भी कमाई इतनी नहीं कि बच्चों की सारी हसरतें पूरी कर सकें। प्राय: ऐसे ही मोड़ पर लोग हार मान जाते हैं, लेकिन वेंकटेश ने एक जिद पाली थी। जिद यह कि बेटे को अपनी जैसी जिंदगी के लिए अभिशप्त नहीं होने देंगे। बदहाली के इस दौर से निकालकर उसे समाज की अगली पंक्ति में लाएंगे। यही से संघर्ष सफलता का रुख अख्तियार करने लगी। 

एक-एक सीढ़ी चढ़ने का अहसास
कलेन में पढ़ने की सुविधा बेहतर नहीं। दूर पर विद्यालय है, लेकिन उसके बीच पुनपुन नदी। गहरी नदी को पार कर बच्चों के लिए विद्यालय जाना जोखिम मोल लेना है। इसी कारण कलेन के अधिसंख्य बच्चे उच्च शिक्षा से वंचित हो जा रहे। अंकित के भविष्य के लिए लिए वेंकटेश व्याकुल थे। अब निर्णय की बारी थी। जिला मुख्यालय (औरंगाबाद) स्थित एक निजी विद्यालय में अंकित का नामांकन कराए। इसके लिए उन्हें अपनी थाली तक में कटौती करनी पड़ी। सुख तो पहले भी नहीं था, लिहाजा सूखी रोटियां भी मीठी लगती रहीं। एक-एक कक्षा उत्तीर्ण करता अंकित भविष्य की एक-एक सीढ़ी चढ़ने का अहसास कराता रहा। वर्ष 2017 में वह CBSE से माध्यमिक (हाईस्कूल) परीक्षा उत्तीर्ण हुआ। उसके बाद पटना से इंटर की पढ़ाई पूरी की। प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। 

सुपर-थर्टी में की IIT की तैयारी
प्रतियोगी परीक्षा के लिए इंटर के बाद की पढ़ाई कुछ ज्यादा महंगी थी। एक क्षण तो वेंकटेश को कुछ सूझ ही नहीं रहा था, लेकिन अंकित की मेधा ने आगे की राह आसान कर दी। वह पूर्व डीजीपी अभयानंद द्वारा संचालित सुपर-थर्टी की परीक्षा उत्तीर्ण कर गया। IIT तक पहुंचने के लिए अंकित को एक मार्गदर्शक मिल गया और वेंकटेश को फिजूल के खर्च से मुक्ति मिल गई। वे बेटे को बस यही सिखाते रहे कि भविष्य में अच्छे अवसर बार-बार नहीं आते। समय का सदुपयोग होना चाहिए। सुपर-थर्टी में  बेशक मुफ्त पढ़ाई का मौका मिल रहा है, लेकिन यह समय दोबारा लौटकर नहीं आएगा। अंकित ने प्रतिज्ञा की और कर दिखाया। आज वह दिल्ली स्थित IIT (भारतीय  प्रौद्योगिकी संस्थान) में सिविल इंजीनियरिंग का छात्र है। एक दक्ष इंजीनियर के बाद भविष्य में IAS अफसर बनने की हसरत है। 

IIT के छात्र अंकित पांडेय ने कहा कि गरीबी तो महज एक अवरोध है अगर पार पाने की जिद है तो आप निकल जाएंगे। मेहनत करने की क्षमता हो और मेधा को सही दिशा देने वाला मार्गदर्शक तो कामयाबी जरूर मिलेगी। अभयानंद सर मेरे लिए गुरु ही नहीं, जीवन के सबसे बड़ा सहारा हैं।

अंकित के पिता वेंकटेश पांडेय ने कहा कि अंकित की कामयाबी से मेरे जीवन का तूफान भी पस्त हो गया। वह कुलदीपक है। अब मैं आश्वस्त हूं कि मेरी लड़खड़ाती गृहस्थी भविष्य में सम्मानजक पायदान पर पहुंचेगी। एक छोटा बेटा है, जो अभी कक्षा चार का छात्र है। उसकी जिम्मेदारी अब अंकित की। 

पूर्व डीजीपी अभयानंद ने कहा कि समाज की एक छोटी सी पहल और मदर गरीबों के घर में खुशहाली ला सकती है। उनके बुझे अरमानों को रोशन कर सकती है। संघर्ष और हौसला की बदौलत अंकित को जीवन की मंजिल मिली है। उसमें गजब की मेधा है। वह अभी और उड़ान भरेगा। 

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Posted By: Dhyanendra Singh

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