'उत्तर प्रदेश पुलिस को भंग कर सभी जांच CBI को दे दिया जाए', सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा ऐसा?
सुप्रीम कोर्ट ने छेड़छाड़ के एक मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जताई, जहां आरोपी को ...और पढ़ें
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सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की कार्यशैली पर कड़ी फटकार लगाई

समय कम है?
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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को घर में घुसकर मारपीट और छेड़छाड़ के एक मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते कड़ी फटकार लगाई। कहा पुलिस ने आरोपी को मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया था फिर भी अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ छेड़छाड़ का मामला दर्ज किया।
कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि बेहतर हो कि यूपी पुलिस को भंग कर दिया जाए और इसके सभी मामले सीबीआइ को जांच के लिए दे दिये जाएं।
ये तीखी टिप्पणियां न्यायमूर्ति संजय कुमार और संजीव सचदेवा की पीठ ने बुलंदशहर जिले में छेड़छाड़ के एक मामले में आरोपी की अग्रिम जमानत रद करने की याचिका पर सुनवाई के दौरान कीं।
UP पुलिस को भंग कर सभी जांच CBI को दे दिया जाए: SC
कोर्ट ने थाना अध्यक्ष को अगली सुनवाई पर मौजूद रहने का निर्देश दिया है। पीठ ने कहा आप इसी तरह काम करते हैं। हमने कई मामलों में कमियां देखी हैं। आपका कोई न कोई एजेंडा होता है।
अगर आप मामलों को इस तरह संभालेंगे तो लोग आप पर कैसे भरोसा करेंगे। बेहतर होगा कि हम सीबीआई से कहें कि वह यूपी पुलिस की सभी जांचें अपने हाथ में ले ले। इससे तो अच्छा है कि हम यूपी पुलिस को भी भंग कर दें।
याचिकाकर्ता का दावा था कि पुलिस ने अज्ञात मोटरसाइकिल सवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की, जबकि संदिग्ध को मौके पर ही पकड़ कर स्थानीय पुलिस को सौंप दिया गया था।
यह भी कहा कि जिस मोटरसाइकिल की बात हो रही है, जब्त किये जाने के समय उस पर कोई नंबर प्लेट नहीं थी, लेकिन जांच के दौरान उसे रहस्यमय तरीके से रजिस्ट्रेशन नंबर दे दिया गया। आरोप लगाया कि उन्होंने सुबह शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन रिकार्ड में समय रात नौ बजे का दिखाया गया है।
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस का पक्ष रख रहे वकील से सवाल किया कि अगर व्यक्ति को मौके पर ही पकड़ लिया गया था, तो आपने अज्ञात क्यों लिखा? लोग पुलिस पर भरोसा कैसे करेंगे?
FIR में क्यों नहीं लिखते आरोपी का नाम: सुप्रीम कोर्ट
बेंच ने पूछा कि आप आरोपी को मौके पर ही पकड़ लेते हैं लेकिन एफआईआर में उसका नाम नहीं लिखना चाहते। शायद, अगर बात बन जाए, तो आप नाम बदल सकते हैं, आपने अलग अलग एफआईआर में आरोपियों की लिस्ट रखी होगी, और जिस पर कम एफआईआर दर्ज हों, उसका नाम शामिल कर सकते हैं। क्या ऐसा ही होता है?
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यूपी पुलिस का हलफनामा बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं है। नया हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया, जिसमें यह बताया जाए कि एफआइआर में आरोपी का नाम क्यों शामिल नहीं किया गया था।
पीठ ने कहा कि अगली सुनवाई पर अधिकारी को पेश होना होगा और बेहतर हलफनामा देकर यह स्पष्ट करना होगा कि अज्ञात मोटरसाइकिल सवार के खिलाफ एफआइआर क्यों दर्ज की गई, जबकि यह सर्वविदित तथ्य है कि उक्त मोटरसाइकिल सवार को मौके पर ही पकड़ लिया गया था।
कोर्ट ने कहा कि हलफनामे में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि एफआईआर में शुरू में नाम क्यों नहीं लिखा गया और बाद में क्यों जोड़ा गया।
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