विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

'तलाक-ए-हसन तलाक का वैध तरीका', गुवाहाटी हाई कोर्ट का अहम फैसला

Published: Fri, 11 Sep 2026 11:04 PM (IST)

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने 'तलाक-ए-हसन' को तलाक का वैध तरीका बताया है और कहा कि देश में इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

तलाक-ए-हसन तलाक का वैध तरीका।

तलाक-ए-हसन तलाक का वैध तरीका।

HighLights

  1. तलाक-ए-हसन तलाक का वैध तरीका है।

  2. गुवाहाटी हाई कोर्ट ने इस पर अहम फैसला सुनाया।

  3. 2024 अधिनियम के तहत तलाक पंजीकरण का निर्देश।

डिजिटल डेस्क, गुवाहाटी। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने तलाक से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। उसने कहा है कि 'तलाक-ए-हसन' तलाक का वैध तरीका है और देश में इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

हाई कोर्ट ने तलाक से संबंधित एक याचिका का निपटारा करने के दौरान यह बात कही है। 'तलाक-ए-हसन' तलाक का यह ऐसा तरीका होता है, जिसके तहत पति को अपनी पत्नी को तीन महीने की अवधि के भीतर तीन अलग-अलग बार तलाक बोलना होता है।

हाई कोर्ट ने एक याचिकाकर्ता को अपने तलाक का पंजीकरण कराने के लिए असम मुस्लिम विवाह और तलाक अनिवार्य पंजीकरण अधिनियम, 2024 के तहत बारपेटा क्षेत्र के विवाह व तलाक पंजीयक से संपर्क करने का निर्देश दिया। जस्टिस अरुण देव चौधरी ने तलाक-ए-हसन के जरिये दिए गए तलाक के पंजीकरण से संबंधित एक रिट याचिका पर सुनवाई के बाद मंगलवार को यह आदेश पारित किया।

याचिकाकर्ता के अनुसार, उसकी शादी 2016 में हुई थी और बाद में दोनों के बीच मतभेद पैदा हो गए। उसकी पत्नी कथित रूप से 2018 में अपना ससुराल छोड़ दिया। दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिशें भी सफल नहीं हुईं।

इसके बाद उसने इस वर्ष 22 मार्च, 26 अप्रैल और 27 मई को तीन अलग-अलग तारीखों पर तलाक-ए-हसन दिया और फिर कानून के तहत तलाक के पंजीकरण के लिए संबंधित प्राधिकारी से संपर्क किया।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि तलाक-ए-हसन पर कोई प्रतिबंध नहीं है और उसने इसकी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार तलाक दिया है। हालांकि, राज्य सरकार ने हाई कोर्ट से कहा कि 1935 के कानून को निरस्त किया जा चुका है और उसके तहत नियुक्त प्राधिकारी का पद भी समाप्त कर दिया गया है। इसलिए उस व्यवस्था के तहत अब तलाक का पंजीकरण नहीं किया जा सकता है।

जस्टिस चौधरी ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा दिया गया तलाक-ए-हसन तलाक का वैध तरीका है और मौजूदा समय में देश में इस पर प्रतिबंध नहीं है। हालांकि उन्होंने 1935 के कानून के तहत बारपेटा में नियुक्त प्राधिकारी को तलाकनामा पंजीकृत करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया, क्योंकि वह कानून निरस्त किया जा चुका है और उसके तहत सृजित पद भी खत्म कर दिया गया है।

जस्टिस चौधरी ने याचिकाकर्ता को 2024 के कानून के तहत संबंधित क्षेत्र के विवाह और तलाक पंजीयक से संपर्क करने का निर्देश दिया है।

(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)