नई दिल्ली/मुंबई [जागरण ब्यूरो]। लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की ही तरह चौंकाने वाले महाराष्ट्र की राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा की जमीन बदलने लगी है। राज्य में पार्टी का चेहरा माने जा रहे गोपीनाथ मुंडे की असमय मौत ने पार्टी के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। नेतृत्व को लेकर चौतरफा शुरू हुई दावेदारी के बीच भाजपा के सामने अब सबसे पहले अंदर की राजनीति को ही पाटने का सवाल खड़ा हो गया है।

महाराष्ट्र में यूं तो मुंडे और नितिन गडकरी के बीच संघर्ष की खबरें आम रही हैं, लेकिन अब यह दिखने लगा था कि आखिरी बाजी मुंडे ने मार ली है। जातिगत समीकरण के तौर पर मुंडे को ही राज्य में पार्टी का चेहरा माना जा रहा था। पिछड़ों-मराठों की बहुलता वाले इस राज्य में गडकरी व प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र फणनवीस जैसे ब्राह्मण नेताओं ने अच्छे रणनीतिकार के रूप में अपनी पहचान भले ही बना ली थी, लेकिन सत्ता की बात आती तो जाहिर तौर पर राज्य में उप-मुख्यमंत्री रह चुके मुंडे मजबूत दावेदार थे। शुरुआत से ही माना जा रहा था कि मुंडे कुछ वक्त के लिए मोदी सरकार में मंत्री रहेंगे। राज्य में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी, तो मुख्यमंत्री वही बनेंगे। पिछले दिनों शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और मनसे के राज ठाकरे ने अपनी दावेदारी को हवा देना शुरू कर दिया था, लेकिन भाजपा नेता यह संकेत देने में पीछे नहीं थे कि जो बड़ी पार्टी होगी, राज्य की कमान उसके ही हाथ होगी।

गडकरी अब राज्य के सबसे शक्तिशाली व बड़े भाजपा नेता कहे जा सकते हैं। हालांकि, अब पार्टी में अंदरूनी खींचातान एक बार फिर शुरू हो सकती है, जो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में पार्टी को नुकसान भी पहुंचा सकती है। अब शिवसेना भी ज्यादा मजबूती से सीएम पद के लिए अपना दावा पेश करे, तो आश्चर्य नहीं। दरअसल, भाजपा के सामने फिलहाल ऐसा कोई निर्विवाद चेहरा नहीं है जिसे पेश किया जा सके। विश्लेषकों का मानना है कि मुंडे की कमी राज्य में गठबंधन पर भी असर डाल सकती है। शिवसेना से करीब तीन दशक पुराने रिश्ते के सूत्रधार मुंडे के साले प्रमोद महाजन थे। महाजन के बाद दोनों दलों में सामंजस्य बिठाने का काम मुंडे ही करते आ रहे थे। मुंडे का यूं जाना दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र तक भाजपा के लिए बहुत कुछ बदल सकता है।

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