नई दिल्ली (जेएनएन)। सर्च इंजन गूगल आज पृथ्‍वी दिवस के अवसर पर पूरी दुनिया को पर्यावरण नियंत्रण को लेकर अपने डूडल के जरिए चेतावनी दे रहा है। पूरी दुनिया में पिछले 47 वर्षों से धरती के पर्यावरण को बचाने के लिए पृथ्वी दिवस मनाया जा रहा है लेकिन प्रदूषण घटने की बजाए बढ़ता ही जा रहा है और जलवायु परिवर्तन के खतरे से यह संकट और गहरा होता जा रहा है। आलम यह है कि अब खुद को बचाने की जंग का नाम ही पृथ्‍वी दिवस हो गया है। अगर अब भी हम नहीं चेते तो आने वाला समय सभी के लिए बर्बादी का समय होगा जिसके कर्ता-धर्ता भी हम ही होंगे।

1970 में पहली बार मनाया गया दुनिया में पृथ्वी दिवस

दरअसल, 1969 में सांता बार्बरा, कैलिफोर्निया में बड़े पैमाने पर तेल फैल गया था जिससे काफी क्षति हुई थी। आपदा से व्यथित नेल्सन के दिमाग में कौंधा कि क्यों न लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने की गरज से राष्ट्रीय स्तर पर ‘टीच-इन’ कार्यक्रम का आयोजन किया जाए। अमेरिका के सीनेटर गेलोर्ड नेल्सन के प्रयासों से 1970 में पहली बार पूरी दुनिया में पृथ्वी दिवस मनाया गया और तब से लेकर आज तक यह लगातार जारी है। पर्यावरण की रक्षा के लिए भारत समेत कई देशों में कानून भी बनाये गए लेकिन प्रदूषण पर काबू नहीं पाया जा सका जिससे पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया है।

1.5 डिग्री बढ़ गया है विश्व का औसत तामपान

आज विश्व का औसत तामपान भी 1.5 डिग्री बढ़ गया है। देश की राजधानी दिल्ली में अप्रैल में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ गया है। उन्होंने बताया कि औद्योगिक उत्पादन के बढऩे और अंधाधुंध विकास कार्यों और पेट्रोल, डीजल तथा गैसों के अधिक इस्तेमाल से भारत कॉर्बन उत्सर्जन के मामले में विश्व में चौथे स्थान पर पहुंच गया है और हिमालय के ग्लेशियर भी पिघलने लगे हैं इससे भयंकर बाढ़ और प्राकृतिक आपदा की घटनाएं भी बढऩे लगी हैं।

कॉर्बन उत्सर्जन के मामले में अमेरिका पहले नंबर पर

कॉर्बन उत्सर्जन के मामले में अमेरिका और चीन पहले तथा दूसरे स्थान पर हैं। अगर यही रफ़्तार रही तो जिस तरह आबादी और वाहनों की संख्या बढ़ रही है,भारत कॉर्बन उत्सर्जन के मामले में और आगे न बढ़ जाये। इसलिए नीति निर्धारकों के साथ -साथ हर नागरिक को सचेत होने की जरुरत है क्योंकि पर्यावरण असंतुलन से जलवायु परिवर्तन तो हो ही रहा है कृषि उत्पादन और स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है।

यूएन ने पहली बार 1972 में आयोजित किया सम्‍मेलन

पृथ्वी दिवस मनाने की परंपरा शुरू होने के बाद ही 1972 में संयुक्त राष्ट्र ने मानवीय पर्यावरण पर पहला सम्मलेन आयोजित किया। इस से पहले 1967 में क्लब ऑफ रोम नामक एक गैर सरकारी संगठन ने पर्यावरण की तरफ ध्यान खींच था और 1972 में एमआईटी के शोधार्थियों ने प्रगति की सीमा तय करने की बात कही थी।आखिर दुनिया में इस तरह अंधाधुंध प्रगति कब तक होती रहेगी।

भारत कर चुका है जलवायु परिवर्तन पर हस्‍ताक्षर

भारत में नयी आर्थिक नीति के बाद पिछले 25 साल में आर्थिक गतिविधियों में काफी तेजी आयी और औद्योगिक विकास भी हुआ जिसका असर पर्यावरण पर भी हुआ। उन्होंने कहा कि भारत गत वर्ष दो अक्टूबर को जलवायु परिवर्तन पर हस्ताक्षर करने वाला 62वां देश बन गया इसलिए उसकी जिम्मेदारी बढ़ गयी है और जनता को भी अधिक संवेदनशील होने की जरूरत हैं। स्वच्छता आंदोलन तो एक हिस्सा है। पर्यावरण की रक्षा के लिए जन आंदोलन की जरुरत है। अन्यथा पृथ्वी दिवस मानाने का कोई औचित्य नहीं है।

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Posted By: Kamal Verma

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