प्रकाश भारद्वाज (शिमला)। जिन्हें देखने सुनने में समस्या हो, बोलने में दिक्कत हो। या अन्य शारीरिक अक्षमताओं के कारण जिन्हें शिक्षा हासिल करने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा हो, ऐसी बेटियों को शिक्षा की राह दिखाने का काम हिमाचल प्रदेश के प्रोफेसर अजय श्रीवास्तव कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के इस प्रोफेसर ने इस काम के लिए अनेक कानूनी लड़ाइयां भी लड़ी और असंभव को संभव कर दिखाया। दृष्टिबाधित, मूक-बधिर एवं शारीरिक तौर पर अक्षम दिव्यांग बेटियां उनके प्रयासों की बदौलत अब उच्च शिक्षा पा रही हैं। प्रोफेसर अजय श्रीवास्तव की संस्था उमंग फाउंडेशन इसी काम में लगी हुई है। इसके जरिये अनेक दिव्यांग बच्चियों को शिक्षित मुहैया कराने में सहयोग किया जा रहा है।

इन्हीं में से एक मुस्कान नामक बच्ची चुनाव आयोग की युवा दूत बनी है। वहीं निशा कुमारी राज्य की पहली दृष्टिबाधित महिला रक्तदाता बनी है। लेकिन यह जंग छोटी नहीं थी। 2011 में शिमला के एक सरकारी स्कूल ने तीन दृष्टिबाधित बेटियों को 11वीं कक्षा में प्रवेश देने से मना कर दिया। अजय ने उन बेटियों के हक की लड़ाई लड़ी। और तभी से वह इस मुहिम में जुट गए। हाईकोर्ट ने दृष्टिहीन व अन्य दिव्यांग बेटियों को उक्त स्कूल में निशुल्क शिक्षा, हॉस्टल और भोजन की सुविधा मुहैया कराने का आदेश दिया। इस स्कूल से अब तक निर्धन परिवारों की 50 से ऐसी बेटियां 12वीं पास कर चुकी हैं। अजय की संस्था दिव्यांग बेटियों को शिक्षण संस्थानों में प्रवेश दिलाने में सहयोग तो करती ही है, साथ ही उन्हें अन्य शैक्षणिक सहयोग, पुस्तकें इत्यादि भी मुहैया कराती है।

स्कूल ही नहीं, राजकीय कन्या महाविद्यालय के 70 वर्ष के इतिहास में पहली बार अजय के प्रयासों से 2014 में दृष्टिबाधित पांच छात्राओं को प्रवेश मिला। अच्छे अंकों से बीए पास कर इस वर्ष उन्होंने एक बार फिर इतिहास रचा, जब वे हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने वाली पहली दृष्टिबाधित छात्राएं बनीं। मंडी जिले के सुंदरनगर में आइटीआइ में भी दृष्टिबाधित बेटियों को उन्होंने कंप्यूटर के डिप्लोमा कोर्स में प्रवेश दिलाया। 2016 में ऐसी 10 बेटियों ने यहां दाखिला लिया।

दो वर्ष पूर्व एक दृष्टिबाधित छात्रा बनिता राणा ने अजय के सहयोग से हाईकोर्ट में जनहित याचिका लगा मांग की कि पुस्कालयों में टॉकिंग सॉफ्टवेयर वाले कंप्यूटर लगाए जाने चाहिए। नए दिव्यांगता कानून के अंतर्गत इस वर्ष प्रदेश विश्वविद्यालय द्वारा प्रतिशत आरक्षण न दिए जाने के कारण इंदु कुमारी को एमए (राजनीति विज्ञान) में दाखिला नहीं मिला। विश्वविद्यालय के विकलांगता मामलों के नोडल अधिकारी होने के बावजूद जब वह उसे प्रवेश न दिला सके तो उन्होंने इंदू को न्यायालय में गुहार लगाने की सलाह दी। जिसके बाद उसे तो प्रवेश दिया ही गया, दाखिलों और हॉस्टलों में पांच प्रतिशत आरक्षण के आदेश भी कोर्ट ने दिए।

प्रोफेसर की याचिका पर ही हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दिव्यांग विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय स्तर तक मुफ्त शिक्षा का अधिकार दिया। कोर्ट ने हॉस्टल में रहकर पढऩे वाले दिव्यांग विद्यार्थियों को 3000 रुपए प्रतिमाह वजीफा भी दिलाया। अजय कहते हैं कि दिव्यांग और खासतौर पर दिव्यांग बेटियों को किसी भी अड़चन के कारण शिक्षा हासिल करने में कठिनाई न आए, यही मेरा प्रयास है। उन्हें इसका पूरा हक है। मैं इसमें सिर्फ उनकी मदद कर रहा हूं।

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Posted By: Srishti Verma