रांची (सलोनी)। ये लड़कियां धाकड़ हैं। इनका अंदाज भीधांसू है। बाइक पर यूं फर्राटेदार उड़ान भरतीहैं कि देखने वाला देखता रह जाए। स्टंटभी जबर्दस्त करती हैं। ये इनका शौक नहींसरोकार है।गांवों में शिक्षा,स्वास्थ, नारीसशक्तीकरणका संदेश देनेके लिए ही इनबेटियों ने रांची वूमन बाइकर्स ग्रुप बनाया है।

रुख गांव की ओर : हर शनिवार औररविवार ये ग्रुप गांवों का रुख करता है। बाइकपर सवार हो ये लड़कियां रांची से लगे गांवों में पहुंचती हैं। ग्रामीण समाज को अहसास दिलाती हैं कि बेटियां महज चूल्हा-चौके के लिए नहीं होती हैं। सपने देखने और साकार करने का मौका उन्हें भी दिया जाना चाहिए। ग्रुप की ये लड़कियां गांव के सरकारी स्कूल में दिनभर क्लास भी लगाती हैं। बच्चों को पढ़ाती हैं। ग्रामीण महिलाओं और बेटियों को शिक्षा और स्वास्थ्य का महत्व बताती हैं। फिलहाल इस ग्रुप में चार लड़कियां शामिल हैं।

बेटियां भी बेटों से कम नहीं : लड़कियों को लड़कों के मुकाबले आगे लाने की पैरोकारी कर रहीं ये लड़कियां अपनी कमाल की बाइकिंग और हैरतअंगेज स्टंट से इस बात का पुरजोर अहसास भी करा देती हैं। पिछले पांच वर्षों से यह अभियान चला रहीं सोमोदती दत्ता, जसरीन चीमा, कंचन व सोनाली कहती हैं कि उनका प्रयास रंग लाने लगा है। धीरे-धीरे लोग उनकी बात समझने लगे हैं। इससे बेटियों का हौसला भी बढ़ रहा है।

ऐसे हुई शुरुआत : ग्रुप की शुरुआत वर्ष 2012 में सोमोदती दत्ता ने की थी। सोमोदती पेशे से डॉक्टर हैं। कोलकाता से एमबीबीएस की पढ़ाई करने वाली सोमोदती को बाइक चलानी नहीं आती थी। शादी के बाद उन्होंने बाइक चलाने की ठानी। अब वह बुलेट और ह्योसंग अकीला बाइक चलाती हैं। बाइक पर हाथ जमे तो इस महारथ को उन्होंने एक मकसद देने की ठानी। तीन और सहेलियों का साथ उन्हें मिल गया। और बन गया रांची वूमन बाइकर्स ग्रुप।

बाइक चलाना लड़कों का काम: सोमोदती कहती हैं, लड़कियों का बाइक चलाना हमारे समाज में आज भी सामान्य नहीं है। इसे अलग नजरिये से देखा जाता है। शुरुआत में काफी दिक्कतें हुईं। फिर सब सामान्य हो गया। धीरे-धीरे मेरे साथ मेरी दोस्त भी जुड़ गईं। जसरीन, कंचन और सोनाली साथ आईं। जसरीन बीआइटी की छात्रा हैं, सोनाली एमसीए की पढ़ाई कर रही हैं। हम सभी ने बेहतर बाइक खरीदीं। हमारा प्रयास था कि हम अपनी बाइक राइडिंग से लोगों को कुछ खास संदेश दे सकें। जिसमें अब हम सफल हो रही हैं।

रंग ला रही मुहिम : सोनाली कहती है, हम अब तक 30 गांवों तक पहुंच बना चुकी हैं। इन सभी गांवों में अब 80 फीसद लड़कियां स्कूल जाने लग गई हैं। पहले यहां सरकारी स्कूलों में लड़कियों की संख्या दो-चार ही रहती थी। हमने महिलाओं-पुरुषों को समझाना शुरू किया। धीरे-धीरे सरकारी स्कूलों में छात्राओं की संख्या में इजाफा हुआ। यही हमारे लिए एक बड़ी उपलब्धि है।

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Posted By: Srishti Verma

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