बक्सर (कंचन किशोर)। बक्सर जिले के किसान बिचौलिया-मुक्त कृषि का एक बेहतर उदाहरण पेश कर रहे हैं। जिले के नया भोजपुर गांव की बात करें तो यहां किसानों की नई सोच, सामूहिक प्रयास और प्रयोगधर्मिता ने विकास की नई कहानी लिखी है। पिछले तीन साल में गांव की तस्वीर बदल गई है। यहां संपन्नता की रौनक स्पष्ट देखी जा सकती है। 

इस तरह हुई शुरुआत : 

नया भोजपुर के किसान तीन साल पहले तक आम किसानों की तरह ही पारंपरिक शैली में खेती करते थे। सीजनल फसलों के अलावा गोभी, मक्का भी उगाते थे। सबकी प्राथमिकताएं, सुखदुख और तौर-तरीके अलग-अलग थे। लेकिन एक बात सबके बीच समान थी। सभी किसान बिचौलियों के चंगुल में फंसे हुए थे। लिहाजा सभी की माली हालत खस्ता थी। ऐसे में प्रकाश राय, कमलेश प्रसाद और मनोज सिंह जैसे कुछ किसानों ने मिलकर सामूहिक प्रयास शुरू किया। शुरुआत गोभी की खेती से की। इन्होंने बिचौलियों के बजाय उपज को खुद ही मंडी भेजना शुरू किया। इस कोशिश ने चमत्कार कर दिखाया। कमलेश प्रसाद बताते हैं कि बाजार में 20 रुपये में बिकने वाले गोभी के फूल पर पहले उन्हें छह-सात रुपये मिलते थे, अब पन्द्रह रुपये मिल जाते हैं।

दोगुना हुआ मुनाफा : 

इस उपलब्धि ने गांव के किसानों को जागरूक कर एकजुट कर दिया। नया भोजपुर अब बिचौलिया-मुक्त खेती का रोल मॉडल बन गया है। बिचौलियों की छुट्टी होते ही यहां के किसानों की आमदनी दोगुना हो गई। गोभी के सीजन में किसानों का प्रति बीघा मुनाफा 30-35 हजार रुपये से बढ़कर लगभग 70-75 हजार रुपये हो गया है। नया भोजपुर से प्रतिदिन 50 हजार रुपये मूल्य की गोभी मंडी पहुंच रही है। इस क्षेत्र में ऐसे कई गांव मिल जाएंगे, जो सामूहिक प्रयास से बिचौलिया-मुक्त खेती की राह पर चल पड़े हैं। किसान भुवनेश्वर राय बताते हैं कि नहर नहीं होने के कारण उनके पास गैर परंपरागत फसलों का ही विकल्प है। इस सीजन में गोभी और इसके बाद मक्का उगाते हैं।

किसान भरत चौधरी बताते हैं कि गोभी की खेती में प्रति बीघा लागत करीब 30 हजार रुपये आती है। जब बिचौलियों के माध्यम से उपज बेचते थे तो लागत काटकर किसानों को मुश्किल से प्रति बीघा दस हजार रुपये ही बचते थे। सामूहिक व्यवस्था में प्रति बीघा पच्चीस-तीस हजार रुपये बचते हैं। गोभी एक सीजन में चार बार कटती है। 15 अक्टूबर से शुरू होकर 25 जनवरी तक चार बार उत्पादन से किसानों की बेहतर कमाई होती है। फसल तैयार होने के बाद इसे दो दिन से ज्यादा रख नहीं सकते, इसलिए सामूहिक खेती काम आई।

ऐसे काम करता है समूह 

किसान मनोज सिंह बताते हैं कि तीन-चार साल पहले गोभी का लाभकारी मूल्य नहीं मिलने से हौसला टूट रहा था। बाजार मूल्य के मुकाबले किसानों को आधी कीमत भी नहीं मिलती थी। अंतत: किसानों ने सामूहिक प्रयास कर सीधे बाजार तक उपज पहुंचाने का फैसला लिया। किराए पर पिकअप वैन लेकर उपज को सीधे मंडी में भेजने लगे। युवा किसान प्रकाश राय ने बताया कि समूह के किसान खेती में भी एकदूसरे की जरूरतों को पूरा करते हैं। एक के पास सिंचाई की अच्छी व्यवस्था है तो पड़ोसी खेतों के भी किसान इसका उपयोग करते हैं। इसके बदले किसान को डीजल और पंपसेट के रखरखाव का मामूली शुल्क देना पड़ता है। जिला कृषि अधिकारी रणवीर सिंह इस क्षेत्र के किसानों द्वारा अपनाई गई सामूहिक खेती की युक्ति को एक बेहतर प्रयोग करार दे रहे हैं।

 

Posted By: Sanjay Pokhriyal