गोवा में विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन की राह में सीटों के बंटवारे ने फंसाया पेंच, सत्ता पक्ष से विपक्ष तक बढ़ी मुश्किलें
गोवा में 2027 विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन की राह में सीटों का बंटवारा सबसे बड़ी बाधा बन गया है।

गोवा विधानसभा चुनाव 2027 गठबंधन सीटों के बंटवारे पर फंसा पेंच

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, पणजी। गोवा में 2027 के होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। राज्य के राजनीतिक दल अभी से तैयारियों में जुट गए हैं, लेकिन चुनाव से पहले गठबंधन बनाने की राह से ज्यादा सीटें हासिल करने की होड़ सबसे बड़ी रुकावट बन गई है।
हालांकि सभी दलों के नेता सार्वजनिक रूप से साथ आने की इच्छा जता रहे हैं, लेकिन फिलहाल बाचतीत केवल बयानों तक ही सीमित है। नेताओं की व्यक्तिगत चुनावी महत्वाकांक्षाओं के कारण गठबंधन की यह पूरी प्रक्रिया उलझती नजर आ रही है।
बीजेपी के सामने भी चुनौतियां
सत्ता पक्ष की बात करें तो, बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टी एमजीपी (MGP) चुनाव से पहले गठबंधन करने की इच्छुक जरूर हैं, लेकिन इसके साथ कई बड़ी चुनौतियां भी जुड़ी हैं। दोनों ही पार्टियां अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती हैं, जिससे सीटों के बंटवारे की खींचतान उनके रिश्तों की परीक्षा ले रही है।
साल 2022 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी और एमजीपी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था, जिसमें बीजेपी को बहुमत मिला था, जबकि एमजीपी केवल दो सीटों पर सिमट गई थी।
दोनों पार्टियों में खींचतान की स्थिति
वर्तमान राजनीतिक हालात और सत्ता विरोधी लहर को देखते हुए बीजेपी के लिए अपने पुराने सहयोगी एमजीपी के साथ जाना जरूरी है। लेकिन दूसरी तरफ, एमजीपी ने घोषणा की है कि वे 13 विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं और वहीं से चुनाव लड़ना चाहते हैं। एमजीपी के वरिष्ठ नेता और मंत्री रामकृष्ण 'सुदिन' धवलीकर पोंडा सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं, जो हाल ही में पूर्व विधायक रवि नाइक के निधन के बाद खाली हुई है।
बीजेपी अपने राज्य के दबदबे को बनाए रखना चाहती है, जबकि एमजीपी अपना राजनीतिक दायरा फैलाने के लिए सीटों के बंटवारे में बेहतर समझौता चाहती है। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत का कहना है कि शुरुआती बातचीत शुरू हो चुकी है, लेकिन इस पर अंतिम फैसला पार्टी के केंद्रीय नेता ही लेंगे।
विपक्ष की भी उलझी स्थिति
दूसरी ओर, विपक्ष की स्थिति और भी ज्यादा उलझी हुई है। बीजेपी-विरोधी वोटों को एकजुट करने की सख्त जरूरत होने के बाद भी कांग्रेस, जीएफपी, आरजीपी और आप अभी तक गठबंधन की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए हैं।
उदाहरण के लिए, जीएफपी और आप ने पहले गठबंधन किया था, लेकिन आपसी मतभेदों के कारण यह सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहा और जीएफपी ने आप से नाता तोड़ लिया। इसी तरह कांग्रेस और आरजीपी के बीच भी बातचीत का दौर चला है, लेकिन सीटों के बंटवारे पर अब तक कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
हर पार्टी ज्यादा से ज्यादा सीटों पर अपना दावा ठोक रही है, जिससे औपचारिक बातचीत शुरू होने से पहले ही सीटों का मुद्दा संवेदनशील बन गया है। जीएफपी अध्यक्ष सरदेसाई की अध्यक्षता में हुई बैठक में विपक्ष के वोटों को बंटने से रोकने के लिए एकजुट होने की बात कही गई है।
विश्लेषकों का मानना है कि एक एकजुट विपक्ष बीजेपी के खिलाफ फायदेमंद हो सकता है, लेकिन नेताओं की अपनी महत्वाकांक्षाएं इसमें बाधा बन रही हैं।
कांग्रेस मांग सकती है बड़ा हिस्सा
कांग्रेस पारंपरिक रूप से बड़ी पार्टी होने के नाते सीटों का एक बड़ा हिस्सा मांग सकती है, जबकि छोटी पार्टियां नाममात्र की हिस्सेदारी पर राजी होने को तैयार नहीं हैं। जीएफपी, आरजीपी और आप के लिए यह बड़ी चुनौती है कि वे अपनी राजनीतिक अहमियत भी बचाएं और वोटों का बंटवारा भी न होने दें।
जैसे-जैसे समय बीत रहा है, बातचीत में हो रही देरी ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या विपक्षी दल चुनावों से पहले अपने मतभेद भुला पाएंगे। गोवा की राजनीति में फिलहाल सीटों की इस खींचतान और टकराती महत्वाकांक्षाओं के बीच अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।
