ईंधन के दाम और बदलती वैश्विक सप्लाई चेन से प्रभावित होगी वैश्विक अर्थव्यवस्था, अमेरिका-यूरोप में महंगाई की मार
वैश्विक अर्थव्यवस्था रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण बदलती सप्लाई चेन से प्रभावित हो ...और पढ़ें

ईंधन के दाम और बदलती वैश्विक सप्लाई चेन
HighLights
रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट से ईंधन चुनौती।
बढ़ती महंगाई, ब्याज दरें वैश्विक खपत को कम कर रही हैं।
भारत जैसे विकासशील देशों में मजबूत आर्थिक वृद्धि की संभावना।
राजीव कुमार, नई दिल्ली। कोरोना काल के बाद रूस-यूक्रेन युद्ध और फिर ईरान अमेरिका युद्ध ने पूरे विश्व की सप्लाई चेन के प्रारूप में होने वाले बदलाव से दुनिया के आर्थिक परिदृश्य तेजी से बदल रहे है।
पश्चिम एशिया संकट से ईंधन चुनौती और इनकी वजह से बढ़ती महंगाई और खपत के कम होने के आसार से वैश्विक अर्थव्यवस्था के सुस्त होने का खतरा दिखने लगा है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक्स जैसे नए टक्नोलाजी भी कई अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती साबित होते दिख रहे है। यही वजह है कि पिछले एक साल से भारत के साथ कई विकासशील देशों के स्टाक मार्केट की स्थिति लगातार कमजोर दिख रही है।
जानकारों का कहना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया संकट के लंबा चलने पर ईंधन का बड़ा संकट सामने आने वाला है। इस संकट से अमेरिका से लेकर सभी प्रमुख देशों में महंगाई बढ़ने लगी है।
इसका असर यह होगा कि उसे नियंत्रित करने के लिए उन देशों के सेंट्रल बैंक ब्याज दर बढ़ाएंगे। फेडरल बैंक ने तो बैंक दर बढ़ा दिया है। इससे खपत पर असर होगा और प्रमुख अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ी जाएंगी।
31 लाख करोड़ डॉलर की दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका में महंगाई दर पिछले कई सालों में सबसे अधिक है। अमेरिका डीजल का निर्यात बंद करने जा रहा है जिसका असर दुनिया के कई देशों की ईंधन सप्लाई पर दिखेगा।
पहले से 40 लाख करोड़ डॉलर के कर्ज का दबाव झेल रहा अमेरिका ईरान के साथ युद्ध की वजह से और अधिक आर्थिक दबाव में आ गया है। अपने सोवरेन बांड पर अमेरिका पांच प्रतिशत से अधिक का रिटर्न दे रहा है जो पिछले कई सालों में सबसे अधिक है।
वित्तीय सेवा से जुड़ी कई प्रमुख कंपनियों के बोर्ड सदस्य रह चुके आशुतोष बिश्नोई कहते हैं, अमेरिका के सोवरेन बांड का सबसे अधिक खरीदार चीन और जापान है जो खुद भी बड़े कर्ज में है और अगर ये देश अमेरिका के सोवरेन बांड को बेचने लगे तो अमेरिका के लिए नया संकट आ सकता है जो वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को प्रभावित करेगा।
बिश्नोई का मानना है कि अभी जो हालात है उसमें कुछ देश विकास करेंगे तो कुछ देश पीछे छूट सकते है। क्योंकि वैश्विक सप्लाई चेन और मैन्यूफैक्चरिंग के सेटअप में तेजी से बदलाव हो रहा है।
पिछले कुछ सालों में सभी देश घरेलू स्तर पर सप्लाई चेन विकसित करने में लगे हैं और वैश्विक लाजिस्टिक रूट में भी बदलाव आ रहा है। पहले जिन रास्तों से माल आता-जाता था, वे बंद हो गए है और नए रास्ते खुल गए हैं।
ऐसे में उन रास्तों से जुड़े इलाके विकास करेंगे। वैसे ही जिन देशों में सप्लाई चेन के माध्यम विकसित होंगे, वहां भी तेजी से विकास होगा। ऐसोचैम के प्रमुख अर्थशास्त्री एस.पी. शर्मा कहते हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास दर तीन प्रतिशत रहने वाली है।
भारत व कुछ अन्य विकासशील देश में विकास दर मजबूत है। अमेरिका जैसे देशों पर महंगाई का दबाव जरूर है, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी जैसी कोई बात नहीं है।
जानकारों का कहना है कि इन सबके बीच अमेरिका में एआई में होने वाले भारी भरकम निवेश का रिटर्न नहीं मिलता है तो इसका असर उनकी अर्थव्यवस्था पर दिख सकता है। एआई में वैश्विक स्तर पर एख लाख करोड़ डालर का निवेश हो चुका है।
अकेले अमेरिका ने इस पर 580 अरब डालर खर्च किया है। लेकिन उस रफ्तार से निवेश पर रिटर्न मिलता नहीं दिख रहा है। इससे निवेशक दिवालिया हो सकते हैं या उन पर कर्ज का दबाव बढेगा।
