कर्ज में डूबे चीन-अमेरिका, भारत क्यों है बेफिक्र? IMF की रिपोर्ट ने बताई बड़ी वजह
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में भारत की कर्ज प्रबंधन स्थिति को अपवाद बताया है, जबकि अमेरिका ...और पढ़ें

आईएमएफ ने भारत के कर्ज प्रबंधन को वैश्विक अपवाद बताया

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में अमेरिका और चीन जैसे बड़े देशों के लिए बढ़ते सार्वजनिक कर्ज को गंभीर खतरा बताया है, वहीं भारत की स्थिति को स्पष्ट रूप से अपवाद के तौर पर चिह्नित किया है।
आईएमएफ के अनुसार ज्यादातर बड़े उन्नत और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में कर्ज-से-जीडीपी अनुपात को 2025 के स्तर पर स्थिर रखने के लिए मौजूदा योजनाओं से कहीं ज्यादा अतिरिक्त राजकोषीय प्रबंधन की जरूरत है, लेकिन भारत को इसकी जरूरत नहीं है।
IMF ने भारत के कर्ज प्रबंधन को वैश्विक अपवाद बताया
भारत के राजकोषीय संतुलन करने की कोशिशों की एक तरह से तारीफ करते हुए कारण यह बताया है कि भारत की वृद्धि दर 2026-27 और 2027-28 में अनुमानित 7 प्रतिशत है, जो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज में से एक है।
घरेलू मांग और सेवा क्षेत्र मजबूत बने हुए हैं। कर्ज का बड़ा हिस्सा रुपए में है और बाहरी कर्ज अपेक्षाकृत कम (लगभग 19 प्रतिशत जीडीपी) है, जिससे मुद्रा जोखिम और अल्पकालिक कर्ज के चुकाने का जोखिम, दोनों कम है।
आईएमएफ की अक्टूबर 2026 की विश्व आर्थिक परिदृश्य और फिस्कल मानिटर रिपोर्ट में वैश्विक सार्वजनिक कर्ज को ऐतिहासिक ऊंचाई पर बताया गया है। औसत कर्ज लगभग 100 फीसद जीडीपी के करीब पहुंच रहा है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है और 2030 से पहले 100 फीसद पार करने का अनुमान है।
हाल के समय में अमेरिका व अन्य विकसित देशों (जी-7) में सरकारी बांड्स पर ब्याज दरों के बढ़ने की वजह से इन देशों की चुनौतियां और बढ़ने की बात कही गई है। अमेरिका और चीन जैसे देश बड़े घाटों के साथ कर्ज बढ़ा रहे हैं, जिससे वैश्विक वित्तीय स्थिरता पर दबाव पड़ रहा है। आईएमएफ ने तत्काल खर्च में कटौती, घाटा कम करने और कर्ज नियंत्रित करने की अपील की है।
भारत की तेज वृद्धि दर कर्ज घटाने में सहायक
भारत के मामले में तस्वीर अलग है। आईएमएफ के आंकड़ों के अनुसार भारत पर कर्ज की समग्र स्थिति 2026 में लगभग 83.1 फीसद (जीडीपी का) है, लेकिन यह वर्ष 2031 तक इसके घटकर करीब 75.1 फीसद होने का अनुमान है।
भारत की तेज आर्थिक विकास दर एक बड़ा कारण है कि कर्ज की स्थिति का बेहतर तरीके से प्रबंधन हो पा रहा है। सरकार का राजस्व बढ़ने की वजह से कर्ज चुकाने की क्षमता भी बढ़ रही है। यहां बताते चलें कि पिछले साल आईएमएफ ने एक आलेख के जरिए भारत पर बढ़ते कर्ज को लेकर काफी चिंता जताई थी।
इस पर वित्त मंत्रालय की तरफ से सफाई आई थी कि भारत कर्ज प्रबंधन को लेकर प्रतिबद्ध है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी कई बार सार्वजनिक तौर पर कहा है कि केंद्र सरकार राजकोषीय संतुलन स्थापित करने पर काफी दृढ़ है और राजकोषीय घाटा के लक्ष्य को तकरीबन हर साल पूरा किया जा रहा है।
राजकोषीय घाटा कम करने पर जोर
इस वजह से ही कर्ज-से-जीडीपी अनुपात को 2030 तक लगभग 50 फीसद पर ले जाने की तैयारी है। अभी यह अनुपात 55-56 फीसद का है। जबकि राजकोषीय घाटा 4.3-4.4 फीसद के करीब चल रहा है, जिसे सरकार नीचे लाने की कोशिश में है।
वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने हाल ही में मीडिया को बताया था कि आईएमएफ के अनुमान सबसे खराब परिदृश्य को ध्यान में रख कर बनाये जाते हैं। साथ ही यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत पर कर्ज मुख्य रूप से घरेलू मुद्रा में है।
इसके बावजूद ब्याज भुगतान राजस्व का बड़ा हिस्सा ले लेता है। खास तौर पर राज्य सरकारों की तरफ से खजाना प्रबंधन और लोकलुभावन योजनाओं पर खर्च करने की प्रवृत्ति पर ध्यान देने की जरूरत है।
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